STORYMIRROR

Kavita Sharrma

Abstract

4  

Kavita Sharrma

Abstract

गांव का घर

गांव का घर

1 min
240

बंया कर रहा बीते कई किस्से

यहां खुशियां बरसती थीं कभी

घर में महमानों का आना जाना

लगा रहता हर रोज ही

रसोईघर से रोज सौंधी सुगंध उठती रहती थी

चुपके से जाकर मां की नजरों से बचकर

मुंह में लड्डू डाल निकल जाते थे बाहर आंगन में

कितनी सारी यादें को समेटे हुए है ये टूटा घर।

मेरे बचपन की पहचान है ये मेरा पुराना घर।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract