STORYMIRROR

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract Classics Inspirational

4  

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract Classics Inspirational

एकांत

एकांत

1 min
289

कभी घर भी भरा रहता था और मन भी 

आज तो घर और मन दोनों ही खाली हैं 


किसी के पास दो पल की फुरसत नहीं 

आज हर आदमी फिरता यहां सवाली है 


ममता का सागर उफनता था जहां कभी

उस मां का दिल रीती गागर सा खाली है 


मियां बीवी में बोलचाल अब न के बराबर है

मोबाइल में सबने अपनी दुनिया बसा ली है


भीड़ में भी खुद को अकेला पाता है आदमी 

दौलत से लबरेज पर दिल का कोना खाली है


कभी एकांत में दिल से साक्षात्कार करना "हरि"

जो मुस्कान चेहरे पे सजी है, वो कितनी जाली है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract