एक मिर्ची !
एक मिर्ची !
एक मिर्ची !
हरी हरी, छोटी पतली सी, मन-भावन इठलाती,
कली एक कोमल सी।
मन को ललचाती, मेरे आँगन के एक पौधे पर,
लटककर बलखाती,
पत्तों के एक झुरमुट पर, अकेले कभी नजर आती,
तो कभी हरे पत्तों के पीछे, पहेली सी छुप जाती।
झुरमुट के पीछे, कभी किसी पत्ते के नीचे।
हर सुबह सूरज की किरणें,
मिर्ची से चिपकी औंसगी पर गिरती,
यूँ चमक उठती वह हरित-स्वर्ण सी,
हो हरित परी मोती ले फिरती।
यूँ ही एक रोज़ वह नजर ना आयी,
लगा झुरमुट के पीछे हो शायद सरमाई ।
फिर सुबह वह मेरे लिए थी, खाने की थाली पर परोस कर सजाई।
पर मिर्ची और मेरा नाता, बचपन से ही छत्तीस का था,
फिर सोचा, क्या जाएगा? चखने में एक बार,
शायद रुतबा भी बढ़ जाएगा।
स्वाद चखा, कंठ खुल गये,
लगा ज्यों जिव्हा और मेरे, प्राण पंखेरू उड़ गए।
सी-सी करता रहा, टुकड़े पर टुकड़ा खाता रहा,
तब जो हर टुकड़े में रस आया,
तबसे पहले कभी ना पाया।
आंखें धुंधली थी, अब चमक गई।
शम्मा बुझी थी अब भड़क गई।
यूँ उसका जो स्वाद चखा,
हर एक खुशबू महक गई।
अब मंजर ऐसा है कि,
तू ना हो तो कोई स्वाद नहीं,
ऐसी तेरी आदत हुई कि तू ना हो तो कुछ पचे नहीं,
बस एक डर लगता है कभी किसी रोज मेरे खाने की थाली में तू ना परोसी गई,
तो, हर एक निवाला छिन जाएगा,
एक कण भी बिन तेरे, ना निकला जाएगा।
तेरी पल भर की सी-सी को,
तरस कर हृदय मर जाएगा।
न हंस पाएगा, ना रो पाएगा,
एक कोने में बैठकर, तेरी याद में,
भूखा ही सो जाएगा। भूखा ही सो जाएगा ।।
