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AJAY AMITABH SUMAN

Abstract

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AJAY AMITABH SUMAN

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दुर्योधन कब मिट पाया: भाग:26

दुर्योधन कब मिट पाया: भाग:26

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विपरीत परिस्थितियों में एक पुरुष का किंकर्तव्यविमूढ़ होना एक समान्य बात है । मानव यदि चित्तोन्मुख होकर समाधान की ओर अग्रसर हो तो राह दिखाई पड़ हीं जाती है। जब अश्वत्थामा को इस बात की प्रतीति हुई कि शिव जी अपराजेय है, तब हताश तो वो भी हुए थे। परंतु इन भीषण परिस्थितियों में उन्होंने हार नहीं मानी और अंतर मन में झाँका तो निज चित्त द्वारा सुझाए गए मार्ग पर समाधान दृष्टि गोचित होने लगा । प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का छब्बीसवां भाग।


शिव शम्भू का दर्शन जब हम तीनों को साक्षात हुआ ?

आगे कहने  लगे द्रोण के पुत्र हमें तब ज्ञात हुआ,

महा देव ना  ऐसे थे जो रुक जाएं हम तीनों से,

वो सूरज क्या छुप सकते थे हम तीन मात्र नगीनों से ?


ज्ञात हमें जो कुछ भी था हो सकता था उपाय भला,

चला लिए थे सब शिव पर पर मसला निरुपाय फला।

ज्ञात हुआ जो कर्म किये थे उसमें बस अभिमान रहा,

नर की शक्ति के बाहर हैं महा देव तब भान रहा।


अग्नि रूप देदिव्यमान दृष्टित पशुपति से थी ज्वाला,

मैं कृतवर्मा कृपाचार्य के सन्मुख था यम का प्याला।

हिमपति से लड़ना क्या था कीट दृश जल मरना था,

नहीं राह कोई दृष्टि गोचित क्या लड़ना अड़ना था ?


मुझे कदापि क्षोभ नहीं था शिव के हाथों मरने का,

पर एक चिंता सता रही थी प्रण पूर्ण ना करने का।

जो भी वचन दिया था मैंने उसको पूर्ण कराऊँ कैसे ?

महादेव प्रति पक्ष अड़े थे उनसे प्राण बचाऊँ कैसे ?


विचलित मन कम्पित बाहर से ध्यान हटा न पाता था,

हताशा का बादल छलिया प्रकट कभी छुप जाता था।

निज का भान रहा ना मुझको कि सोचूं कुछ अंदर भी,

उत्तर भीतर छुपा हुआ है झांकूँ  चित्त समंदर भी।


कृपाचार्य ने पर  रुक कर जो थोड़ा ज्ञान कराया,

निजचित्त का अवबोध हुआ दुविधा का भान कराया।  

युद्ध छिड़े थे जो मन में निज चित्त ने मुक्ति दिलाई, 

विकट विघ्न था पर निस्तारण हेतु युक्ति सुझाई।


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