STORYMIRROR

Sudhir Srivastava

Abstract

4  

Sudhir Srivastava

Abstract

दर्द का रिश्ता

दर्द का रिश्ता

1 min
264


दर्द का कोई रिश्ता नहीं होता

रिश्ता जब दर्द देने लगता है

तब वो रिश्ता दर्द का बन जाता है।

जीवन का कड़वा सच

जब हमारे सामने आता है

तब दर्द उभर ही आता है,

कल तक का सबसे करीबी रिश्ता

नासूर बन टीसने लगता है।

भरोसे का जब कत्ल होता है

तब तड़प कर रह जाना पड़ता है

रिश्तों से मन उचट जाता है

हर अपना ही दर्द का सूत्रधार नजर आता है।

रिश्तों से विश्वास उठता जाता है

हर रिश्ते में दर्द का रिश्ता

साफ नजर आता है,

और हमें मुंह चिढ़ाता

हमें आइना दिखाता है

क्योंकि रिश्ता ही दर्द बन जाता है। 



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract