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Vijay Lakshmi Rai

Romance Others

3  

Vijay Lakshmi Rai

Romance Others

देखा है

देखा है

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201


शब शब भर शबनम को बिखरते देखा है

जब हुई सहर तो फूलों को खिलते देखा है

इश्क पिलाया मुझ को आँखों ही आँखों से

आँखों ही आँखों में ये रात गुजरते देखा है


जब जब बिखरी थी जुल्फें तेरी जानम

बिन मौसम मैंने बादल को बरसते देखा है

गर महसूस किया तुझ को एहसासों में

सर्द चांदनी में खुद को पिघलते देखा है


छुपा के दर्द की बदली ओट में पलकों के

हँसती आँखों में अश्कों को उतरते देखा है

नूर था आँखों मे जिसकी छांव थी महलों की

रेत पे सहरा की नंगे पाँव भी चलते देखा है

"विजय"गैरों की कहें क्या साया अपनों का छूटा

इन आँखों ने वक्त वक्त पे वक्त बदलते देखा है।



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