STORYMIRROR

प्रवीन शर्मा

Abstract

4  

प्रवीन शर्मा

Abstract

ढीठ

ढीठ

1 min
219

हाजिर जवावी में सानी नही कोई

वो बोलती है तो मैं सुनता हूं

वो बताती जाती है कब क्या कैसे

एक मैं हूं जो बैसे वैसे बुनता हूँ

मेरी हंसी मेरी खुशी का कोई मोल नही

उसे फर्क नही, मैं किसे चुनता हूँ

इतने वक़्त में तो बच्चे भी सीख जाते है

पता नही क्यूँ मैं गलत गिनता हूँ

जिंदगी कब से सिखाती है बताती है समझाती है

ढीठ हूँ मैं, ऐसा ही हूँ, कहाँ सुनता हूँ.


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract