STORYMIRROR

Pooja Kalsariya

Abstract

4  

Pooja Kalsariya

Abstract

चलो

चलो

1 min
207

चलो कहीं चले

घूमती हुई सड़क के किनारे 

किसी मोड़ पर

रोशनी के किसी

खम्भे के नीचे बैठ कर

बातें करें 

चलो कहीं चले 

अपने- अपने माजी के

नुचे घुटे घरौंदो से दूर 

किसी सूखे हुए नाले की

पुलिया पर बैठ कर 

बात करे


चलो कहीं चले

डरावने जंगल की

अंधेरी पगडडिण्यों पर

रतजगा मनायें 

जिन्दगी के हर मरहले

पर बहस करे

झगड़े

ढेर सारी बातें करे 


चलो कहीं चले

चलो कहीं चले

चलो !


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract