चौपाई छंद
चौपाई छंद
चौपाई छंद मूर्ति विसर्जन परंपरा है। पर श्रद्धा का भाव कहाँ है।। कल तक जिसका पूजन करते। आज उसे अपमानित करते।। कुछ पल धैर्य और रख लेते। भीगी आँख विदाई देते।। सफल आपकी होती पूजा। देख-देख सीखा क्या दूजा।। कुर्सी जाने क्या करवाए। प्रभुवर राम बिल्कुल न भाए।। राम कहाँ है जानें वाले। अभी हमारे मुँह हैं काले।। इतना दंभ नहीं है अच्छा। मत कहिए ये ईश्वर इच्छा।। व्यर्थ तमाशा नहीं बनाओ। जीवन अपना सरल बनाओ।। कोई नहीं जगत में अपना। व्यर्थ देखते रहते सपना।। सभी स्वार्थी संगी साथी। जैसे दाँत दिखावा हाथी।। राजनीति की देखो माया। जान बूझ उत्पात मचाया।। अपना उल्लू आँख दिखाए। बदले में वे सब खिसियाए।। रिश्तों में नित बढ़ती दूरी। सभी बताते हैं मजबूरी।। तोड़ रही दम नित मानवता। क्षीण सभी की होती क्षमता।। आओ हम तुम करें लड़ाई। तभी लगेगा भाई-भाई।। मातु-पिता का नाम डुबाएँ। मर्यादा को मार भगाएँ।। सुधीर श्रीवास्तव
