STORYMIRROR

Sudhir Srivastava

Abstract

4  

Sudhir Srivastava

Abstract

दिनकर ने दे दिया सबेरा

दिनकर ने दे दिया सबेरा

1 min
1

दिनकर ने दे दिया सबेरा दिनकर ने दे दिया सबेरा, उम्मीदों का नया बसेरा, दुकानों के तख्ते जो बंद थे वह एक एक कर खुलने लगे हैं, चाय की पहली भाप उठने को उत्साहित हो रही है, और रात भर इधर भटकते, भौंतेक्षथ कुत्ते अब किसी कोने में सिमट गए हैं। रोशनी आ गई है, पर नींद अभी बाकी है आँखों में, जो कल रात भर हिसाब लगाती रहीं — कहाँ से शुरू हुए थे, कहाँ खत्म हुईं । दिनकर अपना काम कर गया, उजाला फैला गया फुटपाथ , सड़कों, खेतों, मकानों और खेती, खलिहानों सहित समूची धरा पर, अब हमारी आपकी बारी ही नहीं जिम्मेदारी है इस उजाले में कुछ बेहतर और बेहतर करने सच बोलने और सर्व हितार्थ की, दिनकर के हर्ष के साथ विदा लेने के साथ। सुधीर श्रीवास्तव 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract