मुक्तकंठा छंद
मुक्तकंठा छंद
मुक्तकंठा छंद ********* दुश्मन हैं जब हम सभी, मिले कहाँ आराम। ईश्वर का फिर दोष क्या, होते जब बदनाम।। लिखना चाहें हम सभी, एक नया इतिहास - केवल खुद का चाहते, व्यक्ति परक आयाम।। व्यक्ति परक आयाम, बने फिरते हैं सज्जन। लगता है अब आज, आप खुद अपने दुश्मन।।१ दीक्षा अब जब ले लिया, बिना किसी तकरार। नमन करूँ सौ बार क्यों, क्या हो रिश्तेदार। कारण आप बताइए, मुझको नहीं गुमान- या फिर मुझ पर आपका, कोई नया उधार।। कोई नया उधार, व्यर्थ देते क्यों शिक्षा। बड़े स्वार्थी आप, बहुत दूषित है दीक्षा।।२ विधि का अजब विधान है, जान रहे हैं लोग। जैसी इच्छा ईश की, उसे रहे हैं भोग। चाहे जितना दीजिए, आप किसी को दोष- या तो फिर संतोष कर, मानो सब संयोग।। मानो सब संयोग, खेल बस अपनी निधि का। देख रहे हम रोज, अजब माया है विधि का।।३ नफ़रत की दीवार का, नशा बढ़ रहा आज। आप सभी हैं जानते, क्या है इसका राज। राजनीति का इन दिनों, ये कैसा है खेल- भाईचारा एकता, पर गिरती नित गाज।। पर गिरती नित गाज, बदलनी होगी सूरत। करना होगा काम, दूर करने को नफरत।।४ देना हो तो दीजिए, बिना किए तकरार। करनी कुछ भी कीजिए, पीछे है सरकार। आप धुरंधर हो नहीं, डर जाएंगे लोग- हमको भी इतना पता, कितना चढ़ा उधार।। कितना चढ़ा उधार, नहीं कुछ हमको लेना। कहें मित्र यमराज, सोच लो कितना देना।।५ सच्चा मिला न मीत तो, इतना हुए अधीर। मानो मेरी बात अब, बनिए आप कबीर। बिना मीत के भी चले, दुनिया मेरे यार- निर्णय करना आपको, कृपा करें रघुवीर।। कृपा करें रघुवीर, अगर खाना है गच्चा। रहो ढ़ूँढ़ते आप, मीत जीवन भर सच्चा।।६ करिए नहीं कलेश अब, संकट हरो गणेश। सबसे प्यारा आपको, कहते प्रभो महेश। कहाँ मगन हो आप प्रभु, मोदक दो अब छोड़- भक्त चाहते हैं सभी, बन जाएँ मधुरेश।। बन जाएँ मधुरेश, आप मत इतना डरिए। जितना समझो सरकार, कसम से उतना करिए।।७ जीवन पानी बूँद है, समझो मेरे यार। समझो इतना आप भी, क्यों करना तकरार। छोटी -छोटी बात पर, उलझ रहे हैं लोग- नहीं सोचते क्यों भला, मानव मन का सार।। मानव मन का सार, रहे हर प्राणी नीमन। करें कृपा रघुनाथ, सुखद हो सबका जीवन।।८ करना क्यों विश्वास ही, जब धोखों का दंश। वैसे मिलता है सदा, सबको अपना अंश। जब इतना सब है पता, फिर किसका है दोष- यही हमारे आपके, जीवन का अपभ्रंश।। जीवन का अपभ्रंश, व्यर्थ क्यों हमको डरना। जो जिसका है काम, उसे देना है करना।।९ जन के हित में है यही, नहीं करें मन छेद। एक सूत्र अपनाइए, करिए कभी न भेद। जन-मानस खुशहाल हो, ऐसा करो प्रयास - भूल-चूक हो जाय तो, व्यक्त कीजिए खेद।। व्यक्त कीजिए खेद, गिनो मन माला मनके। खुशियों का बस राज, भावना समझो जन के।।१० मेरा अंर्तमन जला, सहते सहते पीर। आँखों में ही सूखते, बहने वाले नीर। भला बताओ आप ही, क्या मेरा अपराध - जो मेरे निज हृदय को, रहते निशदिन चीर।। रहते निशदिन चीर, काल का क्या है घेरा। या ईश्वर की चाह, परीक्षा लेना मेरा।।११ सुधीर श्रीवास्तव
