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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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अनमोल जीवन और यमराज

अनमोल जीवन और यमराज

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अनमोल जीवन और यमराज  *********** जीवन अनमोल है, इसमें नया क्या है  सवाल जटिल था, जिसे आकर मित्र यमराज ने उठाया, उत्तर देना भी जरूरी था,  उसके कोप भाजन से बचना उससे भी ज्यादा जरूरी था। अपने मन की पीड़ा भला मैं उसे कैसे बताता? मगर कुछ न कुछ तो कहना ही था।  मैंने कहा - मित्र! नया तो कुछ भी नहीं है  बस कलयुग का थोड़ा रंग चढ़ गया है,   कहने भर के लिए अब जीवन अनमोल रह गया है। क्योंकि कब कौन, कहाँ और कब तक सुरक्षित है  उसकी आने वाली, सुबह, शाम या रात बहुप्रतीक्षित है  प्रतीक्षा खत्म होगी या हमेशा बनी रहेगी  यह कह पाना भी आज बहुत मुश्किल है। अपने ही अब अपनों को मार रहे हैं, एक दूजे के सबसे बड़े दुश्मन बन रहे हैं, दुर्घटनाओं का दौर लगातार बढ़ रहा है,  आत्महत्या भी अब साँप-सीढ़ी के खेल जैसा हो गया है  फिर भी जीवन अनमोल है, बस ये ही नया है। अपराध ऊँचाइयों का हिमालय बन रही हैं, किसी की जान ले लेना आसान हो गया है, रिश्तों में नित नया जहर घुलता जा रहा है  हर आँख़ में संदेह का बादल गहराता जा रहा है, आए दिन पाक रिश्ते भी नापाक हो रहे हैं  मातृशक्तियाँ खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं, डर के साए में एक-एक दिन काट रही हैं, बस यही हमारा नया जीवन अनमोल है। यमराज ने मुझे रोका - बस प्रभु! अब रहने दो जीवन कितना अनमोल है, यह बात बहुत अच्छे से जान गया हूँ, आपके लोक के इस अनमोल जीवन का  अद्भुत रहस्य अंतर्मन में उतार चुका हूँ। बस! अब आप मेरी सलाह मानो और मेरे साथ चलकर यमलोक का आनंद लो, क्योंकि अब मुझे आपके मुखारबिंद से  इस अनमोल जीवन के बखान से डर लगने लगा है। वैसे भी मुझे तो बस आपकी चिंता है  क्योंकि यहाँ तो और कोई मेरा सगा नहीं है, दोनों मिलकर वहाँ जीवन का आनंद उठाएंगे, अनमोल जीवन वास्तव में क्या होता है सोशल मीडिया के माध्यम से धरावासियों को बताएंगे,  अनमोल जीवन का भाव अपने हिसाब से लगाएंगे। अपनी शर्तों पर समय-समय पर इसका भाव बढ़ाएँगे, अनमोल जीवन का असली सूत्रधार बन सबसे पहले हम दोनों ही नाम कमाएँगे, फिर सदा के लिए इतिहास बन अमर हो जाएँगे। सुधीर श्रीवास्तव  


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