कहानी- रिश्ते
कहानी- रिश्ते
कहानी - रिश्ते ************** धूमधाम से शादी होने के बाद जेठानी और देवरानी दोनों की बहुएं एकसाथ रुनझुन करती अपने घर में आ गईं। करीब - करीब सभी मेहमान विदा ले चुके थे पर घर की सभी बहन बेटियां अभी यहीं थीं। आज बहुओं की पहली रसोई थी ।एक बहू सूजी का हलवा बना रही थी औऱ दूसरी चावल की खीर। भारी साड़ी ,उतने ही भारी जेवर ,साथ मे जेठ महीने की गर्मी । दोनों बहुएं हलवे और खीर के साथ संघर्ष कर रही थी ।हलवा सछखता जा रहा था और खीर पतली । तभी सभी चचेरी, ममेरी, मौसेरी, फुफेरी ननदें हँसती, खिलखिलाती रसोईघर में पहुँच गई। अरे वाह ! खीर , हलवा !एक ने कहा । दूसरी बोली चलो ,आज तो एक प्रतियोगिता हो जाए तुम दोनों के बीच।देखें, खीर स्वादिष्ट बनी है या हलवा । तीसरी बोली , हाँ भाई ,आज तो तुम दोनों की परीक्षा है । तभी ताईजी अंदर आईं।.....पसीने से तर दोनों बहुओं को देखा, और ननदों की तरफ देख कर बोलीं — "अरे ओ महारानियों, प्रतियोगिता करनी है तो आओ जरा।" सब चुप। ताई जी ने पल्लू कमर में खोंसा और बोलीं, "एक काम करो, तुम पाँचों पहले ये भारी लहंगे पहन के, जून की इस भट्टी जैसी रसोई में खड़ी हो के दिखाओ दस मिनट। फिर परीक्षा लेना।" और फिर दोनों बहुओं की तरफ मुड़ीं — "तुम दोनों जरा गैस बंद करो।" हलवे वाली बहू घबराई, "ताई जी, गाढ़ा हो गया..." ताई जी ने चम्मच लिया, चखा, "गाढ़ा कहाँ हुआ, बिल्कुल तुम्हारी बड़ी सास जैसा बना है, घी वाला, दानेदार।" खीर वाली से बोलीं, "और ये पतली? अरे ये तो तुम्हारी सास की तरह है, दिलदार। लाओ दो कटोरी।" उन्होंने दोनों को मिलाया — एक कटोरी में थोड़ा हलवा, ऊपर थोड़ी खीर। ननदों को पकड़ाया, "लो, ये है आज की नई डिश - सास-बहू स्पेशल। खा के बताओ कैसी है?" खीर-हलवे का वो संगम सच में स्वादिष्ट निकला। ननदें भी समझ गईं। एक बोली, "ताई जी, आप तो पूरा खेल ही पलट देती हो।" ताई जी हँसीं, "खेल पलटना नहीं है बेटा। पहली रसोई में स्वाद नहीं, साथ परखा जाता है। ये दोनों सुबह से भूखी हैं, और तुम परीक्षा ले रही हो?" फिर आवाज लगाई, "अरे बहुओ, कूलर वाली बैठक में आओ, सब वहीं खाएंगे। रिश्ते रसोई में नहीं, बराबरी में बनते हैं।" सभी ने ताई की हाँ में हाँ मिलाया और बैठक में आ गईँ, घर में खुशियों का नया माहौल अँगड़ाइयाँ लेने लगा। सुधीर श्रीवास्तव
