दोहा छंद
दोहा छंद
दोहा छंद ********** भरे पेट की बात का, चर्चा करना व्यर्थ। कुछ ऐसा जब तक नहीं,उसका कोई अर्थ।। करते जो आदान हैं, करना उचित प्रयोग। करते रहिए दान भी, उत्तम यह उपयोग।। यह तो इस संसार की, एक अदद है रीत। दान मान आदान बिन, झूठे सबके गीत॥ जो भी अपने पास हो, वो ही करो प्रदान। वरना रोना एक दिन, व्यर्थ लगे अनुदान।। बिना खोट के कीजिए, अपना प्रेम प्रदान। या फिर दूर से पकड़ लो, अपना दोनों कान।। एक साथ निभते नहीं, मन कटु भरे विचार। दोनों के निज तर्क है, और अलग आधार।। एक साथ कैसे निभे, जब मन में संदेह। राम नाम जपते रहे, नाहक बने विदेह।। नमन आप स्वीकारिए, मैं मूरख नादान। भूल क्षमा मम कीजिए, पकड़ूँ अपना कान।। गाँधी दर्शन आज के, जीवन का है मंत्र। सीधा सच्चा है सरल, पोषित सारे तंत्र।। लाठी थामी हाथ में, चले एकला राह। आजादी उद्देश्य था, बिना किसी परवाह।। धोती पहने साधु सम, दिल में करुणा धार। सत्य अहिंसा पाठ को, याद करे संसार॥ गोरों को बाहर किया, बिना उठाए शस्त्र। गाँधी ऐसे वीर थे, जो खुद में थे अस्त्र॥ जय जवान के साथ ही, जय किसान का मंत्र। सादा जीवन जो जिया, अमर शास्त्री तंत्र॥ धोती-कुर्ता धार के, रहा फकीर समान। जिया सदा जो देश हित , एक शास्त्री नाम॥ नारा उनका आज भी, भारत का अभिमान। खेत और सीमा जहाँ, बन जाते बलिदान॥ कद छोटा साहस बड़ा, थी जिनकी पहचान। लालबहादुर नाम था, बढ़ा देश की शान।। कोशिश हम करते मगर, होता नहीं सुधार। बिना किसी अवरोध के, मची रहे तकरार।। होता नहीं सुधार क्यों, इस पर करो विचार। इससे अच्छा कुछ नहीं, उत्तम है आधार।। अपना इक उद्देश्य है, मानवता से प्यार। इसके पीछे भावना, खुशियों का संसार॥ मानवता से प्यार का, बाँटे हम संदेश। जिससे सुंदर बन सके, भारत का परिवेश॥ आई जब-जब बाढ़ तो, डूबा सकल जहान। मानवता तब ही दिखे, जब हो मदद महान॥ चक्रवात-तूफान में, हिले धरा आकाश। मानव मन डिगता नहीं, रखता दृढ़ विश्वास।। चक्रवात के चक्र में, सभी हुए हलकान। ऊँच-नीच छोटे-बड़े, सबका मिटा गुमान।। पितर पक्ष में आ रहे, पुरखे सबको याद। बिना कर्म हम चाहते, आशीषों की खाद।। अश्विन में पितृपक्ष है, पितरों को दें भोग। श्रद्धा से तर्पण करें, यही सनातन योग॥ मानवता के मीत का जैसे पड़ा अकाल। दुविधा अपनी बढ़ रही, झूठे हैं सुर-ताल।। मुश्किल से अब मिल रहे, मानवता के मीत। फिर भी हमको लग रहा, यही हमारी जीत।। मानवता के मीत भी, देने लगे हैं घाव। दुनिया को सिखला रहे, अब नूतन सद्भाव।। लेते संत समाधि हैं, ईश्वर पर विश्वास। व्यर्थ कभी करते नही, और किसी से आस।। मन को बाँधो ध्यान से, करके सतगुरु प्यार। मिलती तभी समाधि है, करिए मत तकरार।। जो बोया सो काटिए, करना बाद विचार। वैसे भी तुम जानते, जो इसका आधार।। नहीं किसी का दोष है, जो बोया सो काट। भले नहीं तू मानता, उलट चुकी है खाट।। चाह जितना आज तू, बना घूमता लाट। जो बोया है आज मैं, कल लेना वो काट।। व्याधि-उपाधि जगत में, कर्मन के अनुसार। सहनशील जो सह गया, उसका बेड़ा पार।। व्याधि बड़ी दुखदायिनी, हर लेती मुस्कान। सेवा, करुणा, प्रेम से, लौटे फिर से प्रान॥ सबसे मुश्किल इन दिनों, दानव मानव भेद। लगता ईश्वर मौन हो, करते रहते खेद।। भेद बदल कर घूमते, दैत्य दिखें हर मोड़। जन मानस बेचैन है, मिले नहीं कुछ तोड़।। राक्षस मात्र स्वभाव है, बचकर रहिए आप। धर्म-कर्म करते रहें, दूर भगेगा पाप।। कलयुग के इस दौर में, असुर बड़े चालाक। ईश्वर अल्ला आड़ में, करे काम नापाक।। भूत-प्रेत के नाम पर, खेले जाता खेल। पढ़ें लिखे इस दौर में, बढ़ती है विषबेल।। खुद प्रसन्न रहिए सदा, औरों को दें सीख। रोने से तो आजकल, मिलती कब है भीख।। इतना भी बनिए नहीं, मित्रों आप कठोर। कोमल जैसे फूल सम, बनो सभी के नूर।। वक्त-वक्त की बात है, वक्त नहीं दे साथ। मगर वक्त ही आपका, कभी न छोड़े हाथ।। धरती भी शरमा गई, किया सुता का भोग। ईश्वर भी हैरान है, कैसे जन्मा रोग।। सोचे से भी डर लगे, किया सुता का भोग। यही राक्षसी विकृति है, मत कहिए संयोग।। बुरा लगे तो देखकर, लेते आँखें मूँद। सुनकर अनसुन हम करें, व्यर्थ लगे हर बूँद।। मत देखो, बोलो, सुनो, जो चर्चा हो व्यर्थ। जनहित में यदि कुछ नहीं, समझो बड़ा अनर्थ।। गुरु बिन मिलता है नहीं, कभी किसी को ज्ञान।। इनसे मिलता शिष्य को, जीवन दृष्टि विधान।। गुरु शब्दों में है बसा, ब्रह्मा विष्णु महेश। इनकी वाणी से सदा, मिटते सभी क्लेश।। खोकर माता या पिता, बच्चे जाते टूट। खुशियों के सौगात की, नहीं रहे तब छूट।। खोकर अपना हौसला, क्या पाओगे मित्र। कल का तो सोचो जरा, कैसा होगा चित्र।। नारद वीणा कर लिए, जपें विष्णु का नाम। जहाँ कलह बढ़ती दिखे, पहुँच बनाते काम।। नारद जी के ज्ञान का, कहाँ सभी को बोध। खड़े कलह के केंद्र में, बिना किसी अवरोध।। नारद चलते व्योम में, मुख नारायण नाम। श्री हरि की है शुभ कृपा, बनते सबके काम।। उत्पीड़न का आजकल, बदल गया है रंग। पुरखे भी यमलोक से, देख रहे हो दंग।। महिलाओं का हो रहा, उत्पीड़न भी आज। भले देश आगे बढ़ा, बदला नहीं समाज।। आज पुरुष भी झेलता, उत्पीड़न का दंश। नित्य निरर्थक हो रहा, जैसे उसका अंश।। दोनों कर को जोड़कर, सदा झुकाओ माथ। मात-पिता आशीष दें, मिलता ईश्वर साथ।। कर कुछ करने के लिए, इतना तो है ज्ञान। फिर क्यों ये मन आलसी, करता कर अपमान।। कर करनी के मेल से, होती नव पहचान। भले-बुरे का हम सभी, बस रख पाएँ ध्यान।। निर्बल का कोई नहीं, सब देते हैं टाल। जब तक सधता स्वार्थ है, पूछें तब तक हाल।। निर्बल के बल राम हैं, सुनते आए रोज। कलयुग में मिलते कहाँ, आप दीजिए खोज।। आप सहारा दे सके, वह है सच्चा वीर। वरना तो इस भीड़ में, चला रहे सब तीर।। वसुंधरा यह झेलती, नित नव संकट मित्र। लगता मानो चल रहा, विभीषिका चलचित्र।। हित अपना ही देखकर, मत बन तू मक्कार। वरना निश्चित एक दिन, होगा बँटाधार।। भले लोग मक्कार हैं, जान रहे हैं आप। फिर क्यों सूझे आपको, जो करते हो पाप।। देखा हमने मक्कार को, भरे आँख में कीच। लोग देखकर दूर से, कहते तू है नीच।। सुलभ यहाँ सबको मिले, पानी हवा प्रकाश। मानवता होती कठिन, करो उसी की आस।। दुर्लभ है सत्संग यह, और संग में देह। नहीं सँवारे जो इसे, बना रहे वो गेह।। अनगढ़ दोहा हम लिखें, यही हमारी धार। बिन कुर्सी के चल रही, है अपनी सरकार।। हम यमराज के मित्र हैं, क्या ये है अपराध। उससे मिलता है हमें, श्रद्धा भाव अगाध।। सुनने में अच्छा नहीं, खरी-खरी जो बात। लोगों को तो लग रहा, उनसे होता घात।। भले नहीं स्वीकारते, कड़ुवी सच्ची बात। मगर कटेगी भी नहीं, आने वाली रात।। दिन की तो हम क्या कहें, नहीं बीतती रात। मन में भरा गुबार जो, कुंठा की सौगात।। चाहे दिन या रात हो, नहीं रहा अब चैन। थोड़ी चाहत और की, लाचारी में नैन।। समाधान की आस में, बिखर रहा विश्वास। अब तो ऐसा लग रहा, आज खा रहे घास।। पिता नहीं तो क्या हुआ, हम उनकी पहचान। इसी बात का कर रहे, नित नूतन अभिमान।। दिन की तो हम क्या कहें, नहीं बीतती रात। मन में भरा गुबार जो, कुंठा की सौगात।। चाहे दिन या रात हो, नहीं रहा अब चैन। थोड़ी चाहत और की, लाचारी में नैन।। छोटा सा अवयव बड़ा, विविध छिपाए रंग। छोटी सी इक भूल से, बिगड़े सारा ढंग।। भाग-भाग का है बड़ा, समय-समय पर भाव। फिर भी मानव दे रहा, अपनों को ही घाव।। शिला खंड को पूजते, रखकर श्रद्धा भाव। करते जब विश्वास हैं, नहीं टीसता घाव।। भाई-भाई लड़ रहे, हिस्सा बनता बैर। रिश्तों में विष घुल रहा, बनते जाते गैर।। मैं तो बनकर रह गया, उलझा हुआ सवाल। फिर भी हम करते रहे, नाहक नित्य बवाल।। अच्छाई का हम सभी, चाहें अगर प्रतीक। इससे सुंदर कुछ नहीं, बाकी सब है फीक।। बन जाएं यदि हम सभी, संवेदना प्रतीक। फिर कोई भटके नहीं, बिन मंजिल की लीक।। बनना होगा सभी को, बिना कहे सब ठीक। तभी गर्व से हम कहें, वो है श्रेष्ठ प्रतीक।। चमक सदा हो कृत्तिका, जन-मानस के भाल। नित नव नूतन कर्म से, करते रहें धमाल।। शब्द-शब्द में ब्रह्म है, भाव-भाव में प्रीत। लिखें कृतिका बस वही, जो लेवे दिल जीत।। आशा जीवन के लिए, अमरित सदृश समान। टिम-टिम तारे दे रहे, सिर्फ लक्ष्य का ध्यान।। संबल मिलता है हमें, आशाओं के साथ। भले नहीं पतवार है, अभी हमारे हाथ।। मन के कोने में छिपा, अलग सभी का भाव। किसे पता होता भला, कब किसको दे घाव।। इतना भी अच्छा नहीं, नाहक होना रुष्ट। जान लीजिए आप भी, मैं हूँ बड़का दुष्ट।। जरा-जरा सी बात में, अर्थ बड़े गंभीर। बूँद-बूँद से ही बनें, सागर भरकर नीर।। जरा-जरा सी बात को, मत समझो तुम व्यर्थ। होते इसके भी बड़े, समय-समय पर अर्थ।। आज जरा सी बात पर, रूठ रहे हैं लोग। कल तक जो थे साथ में, आज बने हैं रोग।। जरा-जरा सी बात में, जो रखते हैं धीर। उनको ही इस जगत में, कहते लोग कबीर।। छोटी-छोटी बात को, जो देता है टाल। वही मनुज इस भीड़ में, कहलाता वाचाल।। ******* यश, अपयश ******* करना यश की कामना, होना व्यर्थ अधीर। रखें याद केवल सदा, तुलसी सूर कबीर।। करते यश की कामना, होते व्यर्थ अधीर। नहीं मिलेगा लाभ कुछ, बनो आप गंभीर।। कहा मित्र यमराज ने, यश है मायाजाल। इससे रहना दूर सब, क्यों बनते कंगाल।। अपयश की चिंता नहीं, सौंप दिया खुद ईश। नहीं व्यर्थ की वेदना, सहते कभी गिरीश।। जो करते सद्कर्म है, अपयश उससे दूर। नहीं समझते स्वयं को, वो खुद को मजबूर।। ******* दिग्गज ******* जितने भी दिग्गज यहाँ, सभी बड़े लाचार। बिखर गए सपने सभी, लीला है दातार।। कल के दिग्गज जो रहे, आज बड़े हैं दीन। नियम प्रकृति का है यही, जैसे जल बिन मीन।। वो खुद को दिग्गज कहे, जो मूरख नादान। खानदान की काटता, वही नाक अरु कान।। हमसे दिग्गज जगत में, भला और है कौन। कहें मित्र यमराज जी, सुनिए रहकर मौन।। कौन बड़ा दिग्गज यहाँ, कहें मित्र यमराज। वो आ जाए सामने, छिपे नहीं अब आज।। ******* यमराज उवाच ******* कहा मित्र यमराज से, मत कर मुझको तंग। नहीं पता तुझको अभी, मेरा असली रंग।। सुबह-सुबह यमराज से, व्यर्थ हुई तकरार। चाह रहा यमलोक में, हो अपनी सरकार।। पत्नी जी के साथ में, पहुँच गया यमलोक। आज हमें कोई नहीं, वहाँ रहा था रोक।। भौजी ने यमराज को, दिया आज था डाँट। तब से वो यमलोक में, रहा मिठाई बाँट।। उपहारों के साथ में, आया प्रिय यमराज। प्रभु जी मुझको अब नहीं,रहा आप पर नाज।। कहा मित्र यमराज ने, करो नेक प्रभु काम। कुछ लोगों को मुफ्त में, आप करो बदनाम।। ****** पितृपक्ष ******** जीते जी पूछा नहीं, व्यर्थ मृत्यु का शोक। आज जगत की रीति है, देख रहे हम थोक।। जीते जी पूछा नहीं, भूले से इक बार। फोटो पर अब फूल क्यों, झूठा है सत्कार।। ढूँढ़ रहे हैं काग को, श्राद्धों में हर बार। जीते जी भूखा रखा, कैसा है सत्कार॥ ढूँढ़ रहे हैं काग को, सब पितरों के नाम। जीते जी पूछा नहीं, अब क्या उनका काम।। ढूँढ़ रहे हैं काग को, पितर पक्ष में लोग। जिनको कल तक थे लगे, मात-पिता भी रोग।। ढूँढ़ रहे हैं काग को, हम होकर बेचैन। कल तक चुभते थे यही, कंटक बनकर नैन।। पितर देखते हैं सभी, निज तर्पण की राह। और नहीं कुछ वे करें, इससे ज्यादा चाह।। पितरों का तर्पण करो, रख श्रद्धा विश्वास। पूरे होंगे आपके, जो भी रखते आस।। पुरखों के आशीष से, कट जाते सब कष्ट। बिना किसी संदेह के, हो जाते सब नष्ट।। पितर पक्ष आया सखे, करें सभी अब याद। जिनके कारण हम सभी, धरती पर आबाद।। पुरखे बैठे द्वार पर, आशा लिए अपार। पितर पक्ष में दीजिए, पिंडदान कर तार।। पुरखों के हम अंश हैं, इसमें क्या संदेह। उसकी ही है सब तक कृपा, मिलता हमको नेह।। ********* नवरात्रि/आदिशक्ति/जय माता दी ********* माँ आई नवरात्रि में, करने जन उद्धार। पूजन करते हम सभी, विश्वासी आधार।। मातु भवानी भय हरें, करती मंगल काज। शरण पड़े जो द्वार पर, जाकर करते राज।। माँ के हाथ त्रिशूल है, माथे बिंदिया लाल। दृष्टि भवानी देखकर, भग जाता है काल।। सदा भवानी कर रहीं, असुरन का संहार। भक्तों का दुख हर करें, बेड़ा भव से पार।। मातारानी आइए, देने कृपा अपार। शीश नवाएँ तव चरण, करो मातु उद्धार।। स्वागत वंदन मातु का, हम सब हैं तैयार। आदिशक्ति का आगमन, चलो चलें दरबार।। माता आईं द्वार पर, भक्तों में है हर्ष। मिटा सभी संदेह अब, होगा नव उत्कर्ष।। सजे हुए पंडाल में, गरबा करते लोग। इस नवराते पर्व पर, भूल गए सब रोग।। करते पूजन आरती, आदिशक्ति के नाम। मातु कृपा बरसे सदा, बनें सभी के काम।। हर जन-मन संताप के, संग सभी का पाप। भेदभाव को भूलकर, करती माँ उपकार।। नहीं किसी का कर्ज है, जो दे मातु उतार। मगर सदा ही सुत-सुता, माँ करती उपकार।। माँ करती उपकार है, सबके साथ समान। कहें मित्र यमराज जी, नहीं बघारो ज्ञान।। बिना मचाए शोर ही, भरती झोली प्यार। खुशियों का भंडार भर, करती माँ उपकार।। आंचल में जिसके मिले, हमको ममता छाँव। करती माँ उपकार है, चले न कोई दाँव।। बच्चे उसके हम सभी, देती सबको तार। भेदभाव करती नहीं, करती माँ उपकार।। भक्तों के कल्याण का, रखती है माँ ध्यान। करती माँ उपकार है, बिना ज्ञान विज्ञान।। सजा मातु दरबार है, होती जय-जयकार। मैया मेरी आ गईं, करने जग उद्धार।। थोड़ा तो अब ध्यान दो, होती जय जयकार। शीश झुकाने सब चलो, माता के दरबार।। आसन पर माँ आ गईं, होती जय-जयकार। भक्त लगाने हाजिरी, पहुँच रहे दरबार।। दुर्गा मैया आ गईं, होकर सिंह सवार। दुष्टों का संहार कर, देने खुशी अपार।। माता दुर्गा रूप को, देख सभी को हर्ष। आईं सिंह सवार हो, देने जग उत्कर्ष।। माता के नवराते आए, सजा हुआ पंडाल। आईं शेर सवार माँ, है दरबार विशाल।। सजे हुए पँडाल में, माता का दरबार। नवराते में आ गईं, होकर सिंह सवार।। आईं शेर सवार माँ, भव्य दिव्य है रुप। सभी हाजिरी दे रहे, आम खास या भूप।। नौ दिन माँ के नाम की, गुंजित जय-जयकार। भक्त खड़े दरबार में, पाने माँ का प्यार।। ढोल नगाड़े बज रहे, चमके माँ का भाल। माता आईं द्वार पर, होकर सिंह सवार।। ******* नौ दिन हुए व्यतीत ******* आदिशक्ति नवरात्रि के, नौ दिन हुए व्यतीत। भक्तों ने गाए भजन, अरु श्रद्धा के गीत।। करते पूजन आरती, नौ दिन हुए व्यतीत। आदिशक्ति के रूप में, माँ ही सबकी मीत।। नौ दिन हुए व्यतीत अब, मैया के दरबार। दुर्गा मैया की कृपा से, होगा जग उद्धार।। आदिशक्ति आराधना, पूजन आरति पाठ। नौ दिन हुए व्यतीत तब, लगता मन में काठ।। आदिशक्ति होकर विदा, चली गईं निज धाम। नौ दिन हुए व्यतीत हैं, हृदय गूँजता नाम।। ******* माँ शारदे वंदना - दोहे ******* मातु शारदा चरण में, झुके शीश शत बार। ज्ञान-दीप देकर हमें, हृदय भरे उजियार।। वीणा-पुस्तक धारिणी, हंस-वाहिनी मात। शब्द-शब्द में शारदा, बनती सुंदर बात।। कंठ बसे माँ शारदा, तो बन जाए गान। ज्ञानी बनकर मूढ़ भी, पाए जग में मान।। मैया मेरी शारदा, मुझ पर भी दो ध्यान। अज्ञानी सुत आपका, है मूरख नादान।। मातु शारदे की कृपा, मिले कलम को धार। इतना तो विश्वास है, होगा मम उद्धार।। ***** आराधना ******* करो मातु आराधना, करके सोच विचार। प्रभु बसते हैं भाव में, समझो इसका सार।। हम करते आराधना, मिटते मन के ताप। बिना छिपाए भाव निज, भरे हुए जो पाप।। जैसी जिसकी आराधना, वैसा ही परिणाम। कोई छोटा या बड़ा, नामचीन बेनाम।। शीश झुकाकर कीजिए, आप सभी हर रोज। मातु-पिता आराधना, व्यर्थ ईश की खोज।। झूठी कर आराधना, खुद होते गुमराह। फिर क्यों निकले आपके, नाहक मुख से आह।। सुधीर श्रीवास्तव
