STORYMIRROR

Bhagat Singh

Inspirational

4  

Bhagat Singh

Inspirational

बसेरा

बसेरा

1 min
317

बसेरा छोड़ कर बादल चला परबत से टकराने

मिलेगा क्या उसे उसका कोई अंजाम क्या जाने

अभी तो सोख गीली बूंद को सागर से निकला है

घुमड़कर अब उसे भी है घटा के रास्ते पाने॥

 

जो छोड़ी सर जमीं तो याद आया हम वहीं के है

खुले इस आसमां में फड़फड़ाते पर वहीं के है

वो घर जो फूल-पीले, बाली हरियल ओढ़े है लगते

हम टिब्बे वहीं के है, हम ढेले वहीं के है

 

दिखी जो सिल-पे-रस्सी याद आया हम वहीं के है

हलों के पीछे उड़ते-कूदते बगुले वहीं के है

वो छाया बड़ की जिसमें ठंडे पानी के गड़े मटके

हम मिट्टी वहीं की है, हम प्यासे वहीं के है ॥

 

समंदर मुँह खोले, नदिया किनारे कर रहा है क्या ?

वो नदिया को करे खाली, या खुद को भर रहा है क्या ?

किसी ने हाथ में हथियार तो, ले ही लिया है अब

डराना चाहता औरों को, या खुद डर रहा है क्या ?

 

वो तितली बाग की भंगार जाकर कर रहीं है क्या ?

क्यों लोहे पर है जा बैठी, समझ उसे घर रहीं है क्या ?

वहाँ करता किसानी खेतों में भीगा शख्स दिखता है

पसीने से है तन गीला, या बरखा झर रहीं है क्या ?

 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational