बसेरा
बसेरा
बसेरा छोड़ कर बादल चला परबत से टकराने
मिलेगा क्या उसे उसका कोई अंजाम क्या जाने
अभी तो सोख गीली बूंद को सागर से निकला है
घुमड़कर अब उसे भी है घटा के रास्ते पाने॥
जो छोड़ी सर जमीं तो याद आया हम वहीं के है
खुले इस आसमां में फड़फड़ाते पर वहीं के है
वो घर जो फूल-पीले, बाली हरियल ओढ़े है लगते
हम टिब्बे वहीं के है, हम ढेले वहीं के है
दिखी जो सिल-पे-रस्सी याद आया हम वहीं के है
हलों के पीछे उड़ते-कूदते बगुले वहीं के है
वो छाया बड़ की जिसमें ठंडे पानी के गड़े मटके
हम मिट्टी वहीं की है, हम प्यासे वहीं के है ॥
समंदर मुँह खोले, नदिया किनारे कर रहा है क्या ?
वो नदिया को करे खाली, या खुद को भर रहा है क्या ?
किसी ने हाथ में हथियार तो, ले ही लिया है अब
डराना चाहता औरों को, या खुद डर रहा है क्या ?
वो तितली बाग की भंगार जाकर कर रहीं है क्या ?
क्यों लोहे पर है जा बैठी, समझ उसे घर रहीं है क्या ?
वहाँ करता किसानी खेतों में भीगा शख्स दिखता है
पसीने से है तन गीला, या बरखा झर रहीं है क्या ?
