आवाज उठाओ
आवाज उठाओ
तोड़ो चुप्पी और उठाओ
वो आवाज जो
दबी हुई है, सालो से
आजादी के स्वर निकले
जुबां लगे, इन तालो से
किस्मत की कश्ती, बहुत डोल ली
रीति रिवाजी लहरों में
दो आवाज और अगन जगाओ
श्रुतिपट बर्फीले बहरों में
जो कम समझे उसको समझा दो
झुकी आँख,
उठती उंगली को, दिखला दो
शर्म है अपनी जगह
और है धर्म अपनी
संस्कार अपनी जगह
और है कर्म अपनी
पर बेफिजूल का थोपा हुआ
क्या धर्म हुआ, क्या कर्म हुआ
पुरुष प्रधान इस समाज में
घर गृहस्थी में लोक लाज में
कहाँ मै ढूंढू खुद को खुद में
सपनों में, सपनों की जिद में
अपनों में, अपने बेबस में
कदमों का संग साथ चाहिए
मुश्किल में कंधे पर हाथ चाहिए
जो मिल जाए उस आजादी का
भाव भी निस्वार्थ चाहिए
जो करना चाहे कर जाए
इस कर में इतनी ताकत है
घर को घर जैसा रखने की
मन की बस एक चाहत है
कुचले ख्वाबों पर,
मौके का टीका मिल जाए
तीखे तंजों पर,
माफी का मरहम मिल जाए
अपनों जैसा व्यवहार हो
खुशी भरा संसार हो,
और क्या चाहे आज की नार
इज्जत की बराबर हो हकदार॥
