STORYMIRROR

Shwetha Krishnan

Abstract Inspirational Others

3  

Shwetha Krishnan

Abstract Inspirational Others

ब्रह्माण्ड

ब्रह्माण्ड

1 min
217

चंद लम्हों में छुपकर बैठा था मैं

पिछली रात की तन्हाइयों को सवेरे से लगा कर

खुद की हैसियत से खुद को दबा कर

फिर गिरा था नाम को मिटा कर

अपने सम्मान को गला कर

अपमान को भुला कर

समय को झुलसा कर

खरोंच को जला कर

बैठा था कोने में सब से छुपा कर


अब फूट जाना चाहता हूँ

शब्दों को पिरो कर

लिखना चाहता हूँ फिर से

रेत को मिटा कर

नहीं रुकूंगा तट पर समंदर को भुला कर

फूट जाऊंगा फिर से 

ब्रह्माण्ड में समा कर



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract