बचपन की यादें
बचपन की यादें
याद आता है अपने गाँव का मकान
जिसमें मेरा बचपन खेला था कभी
बिजली तो नहीं थी उस गाँव में तब
रोटी बनती लकड़ी के चूल्हे पर कभी
सुबह होती थी वहाँ भोर के चार बजे
रात हो जाती थी शाम पाँच बजे कभी
कहने को तो रहते हैं हम अब शहर में
इससे जुड़ नहीं पाये हैं ठीक से अभी
गर्मी में जाकर बैठ जाते बाग में जाकर
वहीं मिल जाते थे अपने साथ के सभी
खेल लेते थे मिलकर हम गिल्ली डंडा
शाम हो जाती थी खेलते खेलते कभी।
