बाढ़ की लहरें
बाढ़ की लहरें
नदी का क्रोध उमड़ा, किनारे सब बहा ले गई,
धरती की सांसें टूटीं, घर-आंगन डुबा ले गई।
छतों पर बैठे बच्चे, आँखों में सवाल लिए,
कहाँ है वो कल की हँसी, सपनों का ख्याल लिए?
माँ के आँचल में अब भी, साहस का दीप जलता है,
भूखे पेट में भी बच्चे को, दुलार ही पलता है।
खेतों की हरियाली डूबी, माटी की खुशबू खो गई,
रोटियों के संग मेहनत की, सब कहानी सो गई।
पर देखो! एक हाथ बढ़ा है, किसी ने खाना बाँटा है,
सहारे की कश्ती बनकर, इंसानियत तैराती है।
सूरज फिर मुस्कुराएगा, ये अंधियारा छँटेगा,
आशा का दीपक जलता रहे, दुख का सागर घटेगा।
बाढ़ भले ही छीन ले जाए, सपनों का रंग-रूप,
प्यार और साथ अगर मिल जाए, तो मिलता है हर रूप।
