STORYMIRROR

Purnima Vats

Abstract

4  

Purnima Vats

Abstract

और एक विद्रोही मन

और एक विद्रोही मन

1 min
238

कुछ भी महसूसा जा सकता है

यदि शब्द आवाज़ हो जाएं

सुबह की बुहारी से

शुरू हुई प्रक्रिया रात

गए लोरियों पर जाकर ख़त्म होती है

जैसे बच्चे की किलकरियाँ

बुढ़ापे तक आ मौन में बदल जाती है

बदलता क्या नहीं ?

दुनिया ,साँसे और आवाज़ 

हर क्षण बदलकर 

कहीं खो जाती है 

किसी व्योम में

स्थायी सिर्फ़ स्मृतियाँ हैं

संलाप है 

और एक विद्रोही मन! 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract