अधूरी ख्वाहिशें
अधूरी ख्वाहिशें
सूनी रही हैं मेज़ मेरी, और खाली रहे हैं हाथ,
ना फूल मिला, ना चॉकलेट, ना यादों वाली बात।
वो टेडी जिसकी बाहों में, मैं दिल का हाल सुनाती,
वो भी ना आया हिस्से मेरे, बस कसक ही रह जाती।
क्या मैं काबिल नहीं किसी के? क्या मैं इतनी आम हूँ?
या बस किसी की खोज में, मैं एक अधूरा नाम हूँ?
हर त्यौहार पे खुद को ही, मैं दिलासा देती हूँ,
भीड़ में होकर भी अक्सर, तन्हाई पी लेती हूँ।
पर सुन ऐ दिल, तू मायूस ना हो, ये दौर भी ढल जाएगा,
जो तुझे दिल से समझेगा, वो खुद ही चल कर आएगा।
मिले ना तोहफे तो क्या हुआ, तू खुद में एक नज़ारा है,
जो तेरा मोल ना जान सके, वो वक्त ही बेचारा है।
