आज की नारी
आज की नारी
अबला नहीं सबला है आज की नारी
सक्षम ,सजग, स्वतंत्र और बलधारी
भूल जाओ तुम कल की बेला
जब गाड़ देते थे तुम ज़िन्दा
जलाते थे सती प्रथा में
करते थे तुम अत्याचार
और वो डरी सहमी रहती थी
सब कुछ सहती कुछ न कहती
रोती थी वो छुप छुप कर
चुपचाप तेरे अन्याय को सहती
अबला नहीं सबला है आज की नारी
सक्षम, सजग, स्वतंत्र और बलधारी
आज है वो समर्थ और मजबूत
अपने पैरों पे खड़ी,
जीती आज़ाद ज़िंदगी
तोड़ कर समाज के बंधन सारे
खुद की जगह वो बनाई है
घर, समाज और देश में
अपना लोहा मनवाई है
बैठी है हर ऊँचे पद पर
इज़्ज़त की वो हक़दार है
अबला नहीं सबला है आज की नारी
सक्षम, सजग, स्वतंत्र और बलधारी
नहीं है वो लाचार, बेबस और निर्बल
वो नर के प्रबल प्रेरणा का आधार है
अपने आदर्शों का पालन करती
अपने कर्तव्य का निर्वाह करती है
प्रेम, स्नेह, श्रद्धा और ममता
जिस की वो भंडारी है
हर मैदान फतेह कर शान से
वो आज के युग की निर्माता है
जीती है आत्म सम्मान के साथ
स्वाभिमानी आज की नारी है
अबला नहीं सबला है आज की नारी
सक्षम , सजग, स्वतंत्र और बलधारी!
