धरती रही है मुस्कुरा
धरती रही है मुस्कुरा
कोरोना के सबब
बंद हैं फैक्टरियाँ,
गराजो में हैं गाड़ियां,
हैंगरो में हैं विमानें,
इंसान है आशियानों में
हवाएँ हुई हैं साफ
गिर गया प्रदूषण का स्तर
जाने कितने सालों बाद..
खिली है ये चमचमाती धूप
सूरज तो निकलता था हर रोज़
लेकिन कल कारखानों से निकला ज़हर
गाड़ियों और पराली जलाने से फैला धुएँ का बादल
कर देता था उसकी चमक को स्याह
और रहती थी जो कसर बाक़ी
वो इंसानों के फैलाए कचरे और
आवाज़ों के शोर से हो जाती थी पूरी
बंद है कोरोना के कारण सब कुछ
खिल उठा है धरती का चेहरा
हो रहीं हैं रौशन ऐतिहासिक इमारतों की दरों दीवार
ऊपर है नीला अम्बर , धरती पर बिखरे हैं रंग सारे
लगता है अवनि पर उतर आया है सप्तकर्ण
शबाब पर है दरख़्तों की ताज़गी
रहीं हैं झूम डालियाँ,
रहीं हैं चिड़िया चहक
गा रहीं हैं गीत अवनि से अम्बर तक
नदियाँ हो गई है अविरल, स्वच्छ, और निर्मल
रास्ते हैं खुशनुमा तन्हा होकर भी
कर रहीं हैं हवाएँ दिल्लगी जुदा होकर ज़हर से
मुश्किल में है इंसान ,धरती है खुशगवार!
बिखरे हैं प्राकृति में खुशियों के रंग
कोरोना के इस आफत में धरती रही है मुस्कुरा|
