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मजबूर
मजबूर
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© Yogita Takatrao

Drama Inspirational Tragedy

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मैं छोटी थी तब की बात है। मेरी माँ पाठशाला में शिक्षिका है, वो आज भी पढाती है। जब मेरी छुट्टी होती थी, मैं उसके साथ उसकी पाठशाला जाया करती थी। एक आदरणीय शिक्षिका की बेटी को उतना ही आदर और सम्मान मिलता है, जितना की उनको। फिर क्या, गाँव वाले जम के मेरी मेहमान नवाजी करते।

पर इक बात ऐसी है जो मैं समझदार होने पर समझ आयी। मेरी माँ की कक्षा में एक छात्रा थी, होगी वो दस साल की उम्र में तब। इच्छा नाम था उसका। पाठशाला आती ही नहीं थी, हरदम गायब रहती थी तो माँ ने इसका कारण ढूंढना चाहा और पाठशाला का वक्त समाप्त होने पर वो मुझे अपने साथ लिए उसकी घर की तरफ चल पड़ी। माँ और मैं गाँव वालों के बताये रास्ते पर चलते-चलते एक छोटे-से, सादे से घर के सामने आ पहुँचे जिसकी छत सूखी घास से बनी थी।

माँ ने दरवाजे की कुंडी खटखटाते हुए इच्छा को आवाज़ लगाई। एक छोटी सी दस साल की बच्ची ने दरवाजा खोला। उस एक छोटे-से कमरे के घर में दो और बच्चों के अलावा और कोई भी बडा आदमी न था। माँ ने इच्छा से पूछा- तुम्हारे माँ-बाब कहाँ है, कब तक आयेंगे, मुझे उनसे जरूरी बात करनी है।

फिर उससे जो पता चला उससे माँ कुछ विचार करने के लिए मजबूर हो गयी।

आज बता रही हूँ वो बात,

इच्छा के माँ-बाबा दोनों, रोज की रोजी-रोटी कमाने के लिए खेतों में काम करते थे लेकिन इस मजबूरी के वजह से इच्छा को कम उम्र में अपने घर की जिम्मेदारी उठानी पड़ी थी। वो अपने छोटे-से भाई बहन की माँ की तरह परवरिश करती, वो उम्र जिसमें खेलना कुदना, पाठशाला जा के मन लगा के पढ़ना चाहिए वो उस उम्र में बहुत समझदार बनके अपना बचपन खो चुकी थी। खाना पकाने से लेकर घर और परिवार के सारे काम करने में माहिर हो गयी थी।

हम कितने ख़ुशनसीब है, सब मिलता था और मिल रहा है। हमने अपना विद्यार्थी जीवन भी अच्छे से बिताया है पर आज भी छोटे-से गाँव में रहने वाली कितनी इच्छा होंगी जिनको विद्यार्थी जीवन का अर्थ भी नहीं पता होगा।

जहाँ हम सुखी जीवन की, सुख-सुविधा की बातें करते हैं, वहाँ आज भी ऐसे छोटे छोटे गाँव है, सुख-सुविधा उनसे कोसों दूर है या तो है ही नहीं। उनमें रहने वाले लोगों के बच्चों को पाठशाला और विद्यार्थी जीवन नहीं पता।

जहाँ जिस उम्र में पढ़ना जरूरी है वो बच्चे घर संभाल रहे हैं। कब बदलेगा ये चित्र मालुम नहीं पर हम सबने मिल के थोड़ी सी कोशिश की तो जरूर वो बच्चे पढ़-लिख के अपने विद्यार्थी जीवन का उपयोग ले पायेंगे और ये प्रगतिशील बच्चे उनके बच्चों को एक सुख-सुविधा से भरपूर, हँसता खिलखिलाता विद्यार्थी जीवन दे पायेंगे।।

पाठशाला मजबूरी पढ़ाई

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