उत्तराधिकारी

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लघुकथा

                    उत्तराधिकारी

    गंगू के पुत्र मंगू ने भी अपने पिता की ही तरह वर्षों भगवान विष्णु की तपस्या की।अन्त में भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिया।भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले,"हे वत्स--वर्षों से तुम मेरी तपस्या कर रहे हो बोलो तुम्हें क्या चाहिये?"

  "हे नाथ,मुझे बस आपकी भक्ति मिलती रहे और आपकी कृपा बनी रहे यही मेरी इच्छा है।"मंगू बेहद चतुराई से बोला।

   "मंगू,मैं तो तुम्हारी भक्ति से हि बहुत प्रसन्न हूँ--आज जो चाहे माँग लो।"भगवान विष्णु ने फ़िर कहा।

मंगू ने कुछ क्षणों तक सोचा।फ़िर अपनी वाणी में शहद घोलता हुआ बोला,"हे मेरे आराध्य देव,आप मुझे मेरे पिता की ही तरह एक "नेता" बना दीजिये।"

   "क्या?नेता?नहीं ऐसा कदापि नहीं हो सकता।"विष्णु भगवान थोड़ा नाराज़ होकर बोले।

  "पर--पर आपने तो मेरे पिता को--"।

  "तब में और अब में बहुत अंतर आ चुका है मंगू। आज समय बहुत बदल चुका है।मैं तुम्हें "नेता"बनने का वरदान नहीं दे सकता।"भगवान विष्णु मंगू की बात काट कर बोले।

  "लेकिन मेरे अंदर कमी क्या है देव?"मंगू ने पूछा।

 "कमी----?"कहते कहते भगवान विष्णु के माथे पर बल पड़ गये।

 "बताओ,तुमने आज तक कितनी हत्याऐं की हैं?"भगवान विष्णु ने पूछा।

"एक भी नहीं प्रभु।"मंगू थोड़ा सहम कर बोला।

"तुमने कितने बलात्कार किए?"विष्णु ने फ़िर सवाल किया।

"भला मैं यह पाप कैसे कर सकता हूँ ?"मंगू और भयभीत हो गया।

"तुमने आज तक कितनी बैंक डकैतियाँ डालीं?"भगवान विष्णु की आवाज थोड़ा तेज हो गयी।

"ये अनर्थ मुझसे नहीं हो सकता स्वामी।"मंगू रुआँसा हो चला था।

"तुम्हारे खिलाफ़ कितने थानों में किडनैपिंग,स्मगलिंग और ड्रग्स के धन्धों के मुकदमे दर्ज हैं?"भगवान विष्णु खीझ कर बोले।

"एक भी नहीं मेरे आराध्य देव----।"कहकर रोता हुआ मंगू भगवान के चरणों में गिर पड़ा।

"तो जाओ मंगू--।ये सभी काम  पूरे कर के थोड़ा अनुभव प्राप्त करो।फ़िर आकर मुझसे "नेता" बनने का वरदान माँगना।"भगवान विष्णु मुस्कराकर बोले और अन्तर्ध्यान हो गये।

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डा0हेमन्त कुमार

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