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दादी का जीवन
दादी का जीवन
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© Jay Kumar Tiwari

Inspirational

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कठिन घड़ी में कठिन पल में सबसे ज्यादा आवश्यकता हमे प्रेम की होती है, आज मैं आपका परिचय ऐसे खुश मिज़ाज व्यक्तित्व से कराने जा रहा हूँ जो रोज़ाना रोते हुए भी खुश है वर्तमान में अकेले रहते हुए भी अपनी अतीत की यादों के सहारे वह महिला, जो कभी इंदौर में मेरा पता हुआ करता था उस घर की मालकिन है या यूं कहूँ तो मेरी मकान मालकिन है। जब बचपन मे हमारे माँ बाप हमे अगर एक पल के लिए छोड़ देते थे तो अजीब सी घुटन डर में लिपटे हुई एहसास होते थे और बचपन के बाद हम जवान होने की श्रेणी में आ जाते है तो वह अजीब सी घुटन जो डर में लिपटी हुई थी उसका एहसास भी किश्तों में होने लगता है क्योंकि हमारी दूरी कई किलो मीटर की हो जाती है शायद कई दूसरे एहसास उस डर को कहीं छुपा देते है और उस डोर का प्रवाह रिस रिस के होने लगता है जो हमे अपने माँ बाप से जोड़ती है।

ज्यादा भारी बातें तो नही हुई चलिए में आपको उन महिला जिन्हें में प्यार से " दादी " बोलता हूँ उनसे कल की मुलाक़ात की बातचीत बताता हूँ कल जब मैं इंदौर पहुँचा तो अनायस ही में सुबह दादी के घर जा पहुंचा वह बालकनी में खड़े होने के बाद भी रोड पे खड़े लड़के को पहचान लेती है (मुझे शक होता है कि दादी 85 वर्ष की होने के बाद भी इतनी होशपूर्वक जरूरी चीज़ो को कैसे पहचान लेती है?) ,

जैसे ही में अंदर आया दादी प्रशन्नता से बोली कि "जय, दो तीन दिन से तेरे को ही याद कर रही थी बहुत अच्छा रहा तू आ गया"

मैंने दादी का आशीर्वाद लिया और उन्होंने मुझे बैठने को कहा

वहीं पीछे से जो पहले हमारे यहां साफ सफाई करती थी वह माताजी भी वही थी (यह माताजी दादी की सबसे अच्छी दोस्त दिखाई पड़ती है क्योंकि सबसे ज्यादा वक्त अगर कोई उन्हें देता है वह माताजी ही है)

माताजी पूछने लगी "बेटा कैसे हो"

"मैं बढ़िया हूँ अम्मा आप कैसे हो और आपका नाती कैसा है?" इस प्रश्न से मैंने अपनी बात पूरी की

अम्मा हैरान होक वोली "अरे बेटा तुम्हें अभी भी याद है उस दिन के लिए शुक्रिया"

मुझे वह शुक्रिया नही सुनना था मुझे सिर्फ तबियत जाननी थी उनके नाती के स्कूल के दाख़िला की, खैर बातों ही बातों में दादी को याद आया कि वह मुझे याद क्यों कर रही थी और कह उठी " अरे बाबा आज तू हमको बिना गाना सुनाये नही जाएगा इतना वक़्त हो गया तेरे से गाना ही नही सुना"

दादी की एक पोती है अहमदाबाद में जो अच्छा गाती है दादी हमेशा से कहती थी कि जब भी वह आएगी तो मैं दोनों का गाना साथ मे सुनूँगी मगर मेरे उस घर को छोड़ने के बाद यह थोड़ा मुश्किल था इस कारण दादी मेरे गाने नही सुन पायी और आज वह ये मौका नही गँवाना चाहती थी। 

"हाँ दादी ज़रूर आज आपके लिए किशोर दादा के गाने बिल्कुल तैयार "हँसते हुए मैंने उत्तर दिया, चुकी दादी बंगाली है तो किशोर दादा से स्नेह तो जायज़ है और बातों ही बातों में दादी ने मुझे खाने का न्यौता दिया जो मैंने शुरू में मना करते हुए स्वीकार किया। इतने बड़े घर मे दादी को अकेला देख कर जब मुझे अजीब लग सकता है तो उन्हें रहने में कितना अजीब लगता होगा, खैर बातों ही बातों में दाल बाटी बड़े प्यार से गरम कर के ले आयी, सुबह के दस बज चुके थे और दादी की हर बात, अपने बेटे से ले कर अपनी बहू तक जो कहीं पास में ही दूर रहते है, अपने पोते और पोते की बहू से ले कर अपने पड़पोते के पहले जन्मदिन की फ़ोटो तक, अपनी पोती को ऑस्ट्रेलिया जाने से लेकर उसकी शादी तक और अपने पति की यादों से लेकर उनकी बीमारी तक (जो कि अब नही रहे वह हिंदी फिल्मों के जाने माने कोरियोग्राफर थे दादी को लगभग 20 साल पहले अकेला छोड़ गए) इन सब के इर्द गिर्द ही घूम रही थी उनका इन सब के बारे में बात करके जो उत्साह दिखाई पड़ता वो शायद दिन भर में और किसी बात पर नही पड़ता होगा। चुकी वक्त ज्यादा होता जा रहा था और मुझे निकलना भी था मैंने दादी को गाने की बात याद दिलाते हुए टोका ,गाना तो बहाना था उनका वे यादों की गहराई में जाने में रोकने का, और फिर दादी बोल पड़ी "हाँ रे बाबा,चल तू गाना सुना " और मैंने उन्हें उनके पसंदीदा गाने सुनाये वह बहुत प्रसन्न हुई और मेरे जाने की आज्ञा माँगने के साथ साथ उनका प्रश्न आ गया की अब कब आएगा मैंने आशीर्वाद लेते हुए जवाब दिया "जल्द ही दादी"

घर गाना यादें

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