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सत्ता
सत्ता
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© Mihir

Drama Thriller

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वह अपनी काली-सी मनहूस सूरत लिए शहर की गलियों में अक्सर देखा जाता था। अब की गांव की गलियों में भी देखा गया। लोग अखबारों में उसके किस्से बड़े चस्के ले लेकर और चुस्की ले लेकर पढ़ते हैं। वह काली छाया जब शहर की गलियों में दौड़ती थी तो पीछे पीछे लाऊड स्पीकरों के साथ, चुनावी उम्मीदवार भी हलक फाड़ते नज़र आते। गांव में तो जहां इसकी छाया पड़ती है, अच्छे खासे लोग जमीन जायदाद के लिए लड़ मरते हैं। नाम भी कुछ अच्छा सा है- सत्ता। पर ताश के इक्के से कुछ कम नहीं।

अबकी बार इस बीमारी का प्रकोप गांव में कुछ नए ही ढंग से हुआ। न तो ज़मीन जायदाद की बात बीच में आई, न कोई कत्ल हुआ। शुरुआत इसकी कुछ यूं हुई-

एक दबंग छोकरा सारे गांव में लाऊड स्पीकर लिए चिल्लाता जा रहा था, "छोटे मियाँ को वोट देकर सफल बनायें। आपके अपने छोटे मियाँ मिस्त्री।"

पंचायत चुनाव पहली बार गांव में होने जा रहे थे। छोटे मियाँ मिस्त्री की तर्ज पर दो और मिस्त्री हाथ की छैनी-बसूली फेंककर मैदान में कूद पड़े थे। फिर ठेकेदार बिशन सिंह क्यों पीछे रहता ? बात की बात में पूरा गांव ही कूद पड़ा। क्या बच्चा, क्या बूढ़ा - सबकी ज़ुबान पर बस कुछ रटे हुए जुमले थे - "अपने छप्पन मियाँ को भोट दें।" अथवा "अपने रमन भैया को भोट दें।" शुरू में तो इन्हीं दोनों का प्रचार अधिक था। प्रचार की यह भावना तो इतनी बढ़ी की एक साहब सिंह ने तो अपनी भैंसें तक बेचकर पर्चे छपवाए। लाऊड स्पीकरों की तो भरमार ही थी। गांव के एक तंग गलियारे पर जब दो विरोधी गुटों के स्पीकर वाले मिलते तो एक दूसरे के आगे कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से अपना जुमला सुनाते और हँसकर पार निकल जाते।

हवा बड़ी तेज़ चल रही थी। पेड़ पत्ते जब तब हिलते तो आंगनों में धूल भर जाती पर प्रचार की हवा तो और तेज़ थी। कुछ लोगों ने ऐसी हवा बांधी 'अबकी बिशन सिंह राजा भएले।' फिर क्या था ? शाम को उसके दरवाजे शराबी-कबाबी नाच उठे। मुफ्त की शराब पर न पीने वाले भी हाथ साफ कर गए। उधर छोटे मियाँ के कान खड़े हो गये। टोपी सीधी कर नाक की सीध में गांव के तालाब वाले हिस्से में गए जहां अधिकतर खेतिहर उसकी अपनी बिरादरी के थे। उनसे कह दिया, "आप लोगन कै खातिर हम खड़े हुए हैं। बिरादरी की नाक रह जाये। अगर अबकी परधान हो गए तो तालाब की मरम्मत करा कर पक्की नालियां बनवाये देंगे।"

तालाब क्या था कि गन्दे पानी का पूरा शमशान ही था, जिसमे आकर गांव भर की सारी गंदगी मोक्ष को प्राप्त होती रहती थी। तालाब का गन्दला पानी बरसातों में रिस रिसकर घरों तक आ जाता था। एक राय न बन पाने के चलते गांव वाले इसका समाधान नही कर पाए थे। बस फिर तो एक मजबूत मुद्दा बन गया। यह सब शहर में देखे गए कुछ नए नुस्खे थे जो शहर से कुछ बेरोजगार युवा साथ लाये थे। ऐसा ही एक था - रमन भैया। उसका पहला मुद्दा था - बेरोजगारी दूर करना। अपनी तो कर न सका। कुछ साल पास के शहर की खाक छान कर अबकी गांव लौट आया था। जब कुछ न मिला तो राजनीति में उतर आया। कहने के लिए उसका शब्दाडंबर भी कुछ कम न था - "मैंने शहरों में बहोत देखा है। कुछ नई धरा वहाँ। यहाँ गांव से जियादा गन्दगी धरी है उहाँ। काम धंधा कुछ-ओ नई मिलता। यहाँ गांव में कुछ और न हो, अपनी जमीन तो है। भूखा तो नहीं मरेगा कोई।"

पर ज़मीन तो गांव में गिने चुने लोगों के पास ही थी। बाकी तो लाल झंडा वाले लोग थे जिनमें नाइ, कुम्हार, लोहार, मिस्त्री आदि शामिल थे। और रही बात शहर घूम कर आने की, तो अभी कुछ अरसा पहले यही बात कही गई होती तो लोगों में मान भी होता, जब इक्का दुक्का लोग ही गाँवों से शहर को जा पाते थे। आज तो कोई घर ऐसा नहीं जहां से एक दो जने दिहाड़ी-मजूरी के लिए पास के शहर न जाते हों।

साइकिल पहले पहल गाँवों में कौतूहल की चीज़ होती थी। जिसके घर साइकिल खड़ी हो तो वो खुद को ज़मींदार से कम नही समझता था। बच्चे गलियों में साइकिल के पीछे दौड़ लगाते, बूढ़े भी रोमांचित हो कभी पास से छू भर आते। पर इन बीते बरसों में तो सब बदल गया। आज बच्चे खुद ही गलियों में साइकिल दौड़ाते मिल जाएंगे। गाँव मे साइकिलें तो हैं पर सड़क नहीं। यह तीसरा चुनावी मुद्दा है। हाईवे से लेकर गांव के बीच स्कूल तक सड़क बनाये जाने का मुद्दा बिशन सिंह ने रखा है। इससे भी तालाब वाले ग्रामीण नाखुश हैं क्योंकि तालाब उस हिस्से में पड़ता है जहाँ सड़क बनाना किसी के मुद्दे में नहीं। इस बात का लाभ उठाया छोटे मियां ने। लोगों के खूब कान भरे", सड़क क्या तालाब पार वालों को ही चाहिए, हमें नहीं ? हम क्या गाय-भइसें हैं जो टौरियों पर चरेंगे ?" गाँव की स्त्रियां हँस देती हैं -' खी!खी !.....टौरियों पर........खी !खी !......गाय-भईसी......'।

अपनी सफलता पर छोटे मियां मिस्त्री मन ही मन मुस्कराता है। और लगे हाथों अपना एजेंडा बता देता है कि अगर जनता-जनार्दन साथ दे तो वो सड़क को स्कूल से आगे मन्दिर तक बनवायेगा। तो, ख्यालों में बनी सड़क तालाब वाले हिस्से तक भी पहुंच गई थी। लालटेन पर निशान पक्का कराकर छोटू मिस्त्री भी चला गया।

इधर गांव में ऐसे भी कुछ लोग थे जिनको अपने काम से ही फुरसत न थी। ऐसों को लोकतंत्र का भागीदार बनाना ज़रा मुश्किल होता है। ये बीड़ा उठाया है अपने रमन भैया ने। सबसे ज़्यादा पोस्टर भी उसी के नाम के छपे हैं। गांव के घर-घर घूमकर सबको बीड़ी का एक-एक बंडल मुफ्त में बाँट रहा है।

बीड़ी - बेरोजगारी की निशानी और रमन भैया का चुनाव-चिन्ह !वह काली, मनहूस छाया एक बार फिर गांव के दौरे पर है। शहर की खिच्च-पिच्च से तंग आकर कुछ दिन हवा पानी बदलने गांव आई है। शहर में उसके कुछ चुने हुए प्रतिनिधि हैं जो वहाँ उसकी कमी खलने नहीं देंगे। अबकी वह ज़रा मूड बदलने गांव आई है।

गांव में फल-सब्जियों के एकमात्र विक्रेता रामसागर का घर ज़रा किनारे की तरफ है। उसे धेला-भर की फुरसत नहीं। गांव से इकट्ठा की गई फल और सब्जियों की टोकरियाँ उसे पास के हाट और मंडी तक पहुंचानी होती है। फिर वहीं पर अपनी एक चलती फिरती दुकान डाल वह फुटकर सब्जियां भी बेचा करता था। गांव वालों की नज़रों में होनहार और मेहनती पर रश्क रखने वालों की भी कमी न थी।

पढ़ा लिखा आठवीं से आगे था नहीं पर व्यवहारिक इतना कि आते-जाते गांव में लोगों से मिलना-जुलना और दूर से ही सलाम-दुआ करना नहीं भूलता था। गांव के लोग वक़्त-ज़रूरत उससे न केवल परामर्श, बल्कि मदद लेने भी अक्सर आते रहते थे। यहाँ तक कि गांव में कहीं कोई बीमार भी पड़ता तो फौरन रामसागर की ड्योढ़ी पर खबर पहुंचती। मरीज को किस अस्पताल में या किस डाक्टर के पास ले जाना है, ये वही तय करता था, बल्कि लेकर भी जाता था। गांव को लौटते वक्त किसी-किसी की ज़रूरत का सामान भी लेता आता था। ऐसी तमाम पर्चियां हर समय उसकी जेब मे पड़ी मिलती थीं जिसमे किसी न किसी ने कोई ज़रूरत का सामान लिख दिया होता था। कमाता भी खूब था पर परिवार बड़ा था सो जिम्मेदारियाँ भी ज़्यादा थीं। फिर फल-सब्जी के व्यापार में अगर मुनाफा था तो घाटा भी जमकर होता था। जब सारे गांव में लहर है तो ऐसे शख्स को कैसे छोड़ दिया जाय ? वह काला साया उसकी ड्योढ़ी पर खड़ा था।

तीन-चार लोग अल-सुबह रामसागर से मिलने पहुंचे। इनमें एक रामदयाल भी था। रामसागर अपने झोट्टे को गाड़ी से बाँध रहा था। रामदयाल काफी समय से रामसागर के घर के चक्कर लगा रहा था। वह रामसागर से रश्क भी रखता था और उसका हुनर सीखना भी चाहता था। रामा-रामी के बाद आखिर उसने काम की बात की, "अब की सहकारी बैंक से मेरे लोन का पता कर आना।"

"मेरी मान रामदयाल, साइकिल की दुकान खोल। तू कहाँ कव्वा (जुगाड़) खरीदने के फेर में पड़ गया। बर्बाद हो जाएगा।" साथ आये एक शख्स ने उसे समझाया।

रामसागर बोला, "बैंक किसकी गारंटी पर लोन देगा तुझे ? न तेरे, ज़मीन न घर। पहले भी बैंक का सचिव मना कर चुका। पर तू कहता है तो अबकी फिर पूछ आऊंगा।"

"पर गारंटी कौन देगा ?"

"तू टीकाराम से बात कर ले। चुनाव का बखत है। इस टेम क्या पता बात बन ही जाए। वो अगर बात करे तो सचिव मना नहीं कर सकता।" रामसागर की ये बात रामदयाल को जँच गई।

"पर उसके कहने पर लोन मिल जाएगा, इस बात की क्या गारंटी ?"

"गारंटी उसकी नहीं तो फिर समझो किसी की नहीं। उसकी ब्लॉक में भी खूब चलती है और बैंक में भी। अबकी प्रधान वही बनेगा, लिखा के ले लो।" दूसरे ने कहा।

"अरे छोड़ो ! टीकाराम का पत्ता कटा समझो। छोटे मियाँ बनेगा या बिशुन सिंह।" रामदयाल कहने लगा।

फिर तो चर्चा का पर्चा ही बदल गया। बस चुनाव और चुनाव। तीसरा शख्स चुप था। रामसागर ने पूछ ही लिया, "तू काहे उदास है रामसुख ?

"सोचता हूँ चचा, तुम ही क्यों खड़े क्यों नहीं हो जाते चुनाव में ? अभी उम्मीदवारी का आखिरी दिन कल है। नाम लिखा क्यों नहीं लेते ?" फिर तो तीनों को जैसे चर्चा का नया मुद्दा ही मिल गया था।

"लड़का ठीक बोलता है।" रामदयाल ने शुरू किया। और फिर एक-एककर तीनों उसमें जोड़ते चले गए। रामसागर की गांव में जो इज्जत है, उसका वास्ता दिया जाने लगा। अपने यहाँ तो वैसे भी बैठे -ठाले लोग बातें बनाने में होशियार ज़्यादा ही होते हैं। घर फूँक तमाशा तो सब देखना चाहते हैं, बशर्ते घर किसी और का हो। रामसागर न नुकुर करते भी सोच में पड़ ही गया।

रामसागर की पत्नी फल-सब्जियों पर पानी छिड़क रही थी। आते जाते इन सब की बातें भी सुन रही थी। पति की मान-मनौव्वल वाली बातों तक तो ठीक था। मन ही मन प्रसन्नता और गर्व से सुनती रही। पर जब लगा पानी सिर के ऊपर से जाने ही वाला है, वो भी कूद पड़ी।

"रहने दो भैया। तुम इन्हें मत फुसलाओ।ये इन चक्करों को नहीं जानते। ठीक ठाक दो जून की रोटी मिल जाती है मजूर आदमी को उसी में खुश रहना चाहिए। "

"फुसलाना कैसा भाभीजी ? वो ही कह रहे हैं जो सच है। रामसागर जैसा नेक आदमी प्रधान होना ही चाहिए। नहीं तो साहब सिंह जैसे घोटालेबाज प्रधान हो जाएंगे। देखते नहीं, चुनाव लड़ने खातिर भैंस भी बेच दी है।"

रामदयाल जानता था कि रामसागर ने अगर ज़िद पकड़ ली तो पीछे नहीं हटेगा। जीत गया तो उसकी भी चाँदी, न भी जीता तो उसके घर से क्या जाएगा ? ड्योढ़ी का साया भी धीरे-धीरे खिसककर आगे बढ़ रहा था।

"रहने दो भैया। ज़्यादा तड़का मत लगाओ। ये तो तुम्हारी बातों में आ भी जाएंगे। मजूर आदमी चार दिन कमाने नहीं जाएगा तो खायेगा क्या ?"

"चार दिन नहीं जायेंगे तो फ़ाक़ा थोड़े ही पड़ जायेगा।" अबकी रामसागर बोला और मानो अपनी ही बात पर हँस दिया।

अगले ही दिन लोगों ने एक ओर से सुना," रामसागर को वोट देकर सफल बनायें। रामसागर भाजी वाले। चुनाव चिन्ह पतंग।" प्रधान पद का वह पंद्रहवाँ प्रत्याशी था।

गांव-गली की दीवारों पर अपने चित्रों को देख वह मन ही मन एक विचित्र अनुभूति से भर गया। काम पर जाने की बजाय चार जने साथ लेकर गाँव भर में समर्थन माँगता विनय की प्रतिमूर्ति बना फिरता था। पर ये विनय उसकी स्वाभाविक विनम्रता से ज़रा हटकर था और उतनी ही हटकर थीं वे निगाहें जो अब उसपर पड़ रही थी। लोग वही थे जिनके दसियों काम उससे पड़ते रहते, पर निगाहें कुछ अलग होतीं। बड़े प्यार से जब वह चुनाव में ख्याल रखने की बात करता तो सामने वाला भी उतने ही प्यार से निवेदन स्वीकार करता। गांव में ऐसे बीसियों घूम रहे थे। रमन तो मन ही मन दाढ़ पीसकर कहता, "अब इसी की कमी थी। खुद तो काम धंधा में कमा रहा है, हमारे जैसों के लिए यहाँ भी रास्ता रोकने चला आया।"

यों तो साल अभी आधा बाकी था, पर नए साल के कैलेंडर बाँटे जा रहे थे। कैलेंडर के नीचे हाथ जोड़े टीकाराम की मुस्कुराती फोटू। कइयों ने फोटो काटकर केवल कलेंडर वाला हिस्सा दीवार पर टांग दिया था।

कच्चे रास्ते पर टीकाराम की जीप आकर खड़ी हुई थी। कीचड़ भरे रास्तों पर सावधानी से पैर निकालकर वह बाहर आया। बस्ती का उसका अपना आदमी रमज़ान अली फौरन सामने आ गया। दो चार लोगों को लेकर गांव की एकमात्र दुकान पर पहुंचे। वहीं उससे कुछ बातें होने लगीं।

"नमस्कार, ठेकेदारजी।" रामसागर ने अपने समर्थकों सहित अभिवादन किया। थोड़ा बहुत कुशल क्षेम के बाद आगे बढ़ गया। रामदयाल कुछ पीछे आ रहा था। टीकाराम ने उसे रोककर पूछा, "रामदयाल, क्या हाल हैं ?"

"किरपा, ठेकेदारजी "

"कुछ तकलीफ तो नहीं ?"

"ज़्यादा कुछ नहीं, बस एक ज़रा सी बात।"

"हाँ, भाई बोलो।"

"बैंक वाले लोन नहीं दे रहे।"

"बस इतनी सी बात ? कल ही सुबह आकर मिलो। हाथ के हाथ काम हो जाएगा।"

रामदयाल देख चुका था, रामसागर के साथ घूमकर कुछ अर्जित नहीं कर सकता था।

"एक बात बताओ।" टीकाराम उसके कान के नजदीक मुँह ले गया-"तालाब वाले इलाके में किसकी हवा है ?"

"इस बख्त तो छोटे मियाँ का जोर है। पर कुछ कह नहीं सकते।"

विदा लेकर रामदयाल चलता बना। शाम के समय उसने रामसागर को नई बात सुझा दी कि अगर रुतबा बनाना हो तो एक जीप किराए पर लेनी होगी। अब तो नुमाइंदे भी काफी थे। सबके मन की सुनी जाती थी। सो अगले दिन जीप भी बुक हो गयी। रामसागर चार दिन से काम पर तो गया नहीं, उल्टे हजारों का खर्चा सिर पर पड़ा, सो अलग।

जब नाम वापस लेने की तारीख आयी तो एक विचित्र बात हुई। चार-पाँच लोगों को छोड़ बाकी सबने नाम वापिस ले लिए और वे सब टीकाराम की जीप में घूमते देखे गए।

"टीकाराम चालबाज़ी पर उतर आया है।" जमन रामसागर को बताने लगा, "तुमसे टक्कर लेने के लिए पैसा पानी की तरह बहाए जा रहा है। पीछे मत हटना। मुकाबला टक्कर का ही होना चाहिए।"

रामदयाल पुराना जुगाड़ खरीद लाया था। उसपर फल सब्जी और सवारी, दोनों ढोने लगा। गांव में वैसे भी सबकी फल-सब्जियाँ खेतों में सूखने लगी थी। सबने उसे थोक में दे दिया। रामदयाल अपने धंधे में जम गया।

चुनाव-प्रचार समाप्त होने तक स्थिति लगभग साफ हो चुकी थी। कुल पाँच प्रत्याशी ही असल मैदान में थे - छोटे मियाँ, बिशुन सिंह, रमन भैया, टीकाराम और रामसागर। इनके अलावा बाकी लोगों की कोई चर्चा भी न करता।

चुनाव का दिन आया और गया। बड़ी शांति के साथ बिना कोई शोरगुल किये प्रत्याशियों की किस्मत डिब्बों में बंद हो गयी। जिससे भी पूछो वोट किसे दिया तो यही सुनने को मिलता कि दे आये जिसको देना था। जवाब देने में महिलाओं का जवाब नहीं। किसे वोट दिया पूछो तो कहती - "जिसे इन्होंने (उनके पति) वोट दिया, उसी को हम भी दे आये। अब मत पूछो।"

इधर सुनने में आया कि रामदयाल वोट देने नहीं गया, उस दिन भी किसी काम से बाहर ही था। पूछने पर बोला-"मेरी औरत गयी तो थी। दोनो जने जाकर क्या करते ?"

वोटों की गिनती का दिन आया। रात भर गिनती चलती रही। सभी प्रमुख उम्मीदवार और उनके एजेंट सुबह से ही डेरा डालकर वहीं पड़े थे। थोड़ी ही देर में रमन भय्या का पत्ता साफ हो गया। बेरोजगारी खत्म। कुछ ही देर में बिशुन सिंह और रामसागर भी टाँय बोल गए। अब केवल टीकाराम और छोटे मियाँ रह गए। काँटे की टक्कर थी। बहुत रात गए दोबारा, तिबारा गिनाकर तब कहीं सुबह तक स्थिति साफ हो सकी। इसी बीच रामसागर पहले तो घुटनों के बल उकड़ूं बैठकर बच्चों की तरह रोया, फिर न जाने कब मौके से खिसककर घर आ गया। जीप सब लोगों को उनके घर छोड़ कर सुबह रामसागर के दरवाजे पर आ लगी।

जब सवेरे सात बजे लोग वापस लौटे तो रात की थकान चेहरों पर साफ दिख रही थी। फैसला हो चुका था। सभी घरों में हलचल मच गई। उसी समय रामदयाल जुगाड़ पर फल-सब्जियां लादकर शहर की ओर जा रहा था। उसने चलते-चलते ही पूछा- "भाई जमन, कौन जीता ?"

जवाब आया -"छोटे मियाँ मिस्त्री।"

"चलो...अब अपने गांव तक सड़क तो बनेगी।" हिचकोले खाते कच्चे रास्तों से जुगाड़ को सरपट ले जाते वह बोला।

सारे गांव की वीरानी एक अकेले रामसागर के घर पर छाई थी। वह अभी तक भी बिस्तर पर औंधे मुँह पड़ा था। जाने सो रहा था या जग रहा था। बाहर बकायेदार तकादे के लिए खड़े थे। किराए की जीप का ड्राइवर भी अपने मालिक के इंतज़ार में बाहर ही खड़ा था।

वह काली मनहूस छाया अबकी चौक में बैठी है। धूप में अलसाती हुई टाँगें फैलाकर। उसने वापसी का इरादा छोड़ दिया है। उसे गांव की आबो-हवा रास आ गयी है।

राजनीति छल उम्मीदें

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