Krishna Kaustubh Mishra

Drama


4.7  

Krishna Kaustubh Mishra

Drama


परिणाम की घड़ी

परिणाम की घड़ी

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आज ग्यारहवीं के परिणाम आना थे, मन कुछ घबराया सा था क्योंकि परीक्षा कुछ खास नहीं गयी थी। विद्यालय के औने पौने नियम मानवाधिकार के उल्लंघन को उतारू थे। अभिभावक-शिक्षक सम्मेलन के तहत प्रगति पत्र अभिभावकों को सौंपे जाते थे। बची-खुची कसर शिकायत रूपी नमक से, प्रतियोग रूपी घाव पर मल दिए जाते थे। सुबह उठकर स्नान करके मैं संकट मोचन मन्दिर जा पहुँचा। भगवान से परिणाम के अनुकूल रहने की विनती की। विद्यालय जाने से पहले भगवान का आशीर्वाद बहुत जरूरी था क्योंकि कोई चमत्कार ही मुझे अभिभावकों के तीक्ष्णता भरे क्रोध से बचा सकता था।

पिताजी को विद्यालय के लिए पूछा तो उन्होंने समय का हवाला देते हुए विद्यालय जाने में असमर्थता जताई। अब बब्बा से विद्यालय जाने के लिए अनुमति का वक़्त था।

बब्बा के कमरे में गया तो बब्बा अभी भी लेटे ही हुए थे, पर नींद में नही थे। सीताराम सीताराम का जाप उनके मुख को सुशोभित कर रहा था। मैं भी जाकर उनके बगल में लेट गया। उन्होंने इशारों में मुझसे भी जाप में हिस्सेदारी का आमंत्रण दिया और मैं भी सीताराम सीताराम कहते हुए उनके पीछे-पीछे गुनगुनाने लगा। बब्बा आगे आगे कहते, मैं उनके पीछे-पीछे, ऐसा लग रहा था दुनिया थम सी गयी हो, सूर्य प्रकाशित तो था पर उस क्षण के तेज के आगे उसकी चमक भी फीकी पड़ रही थी। मन से असीम शीतलता ऐसे लिपट रही थी मानो घाट पे नंगा खड़ा व्यक्ति अपने तन और मन को मिट्टी के लेप से शीतल कर गंगा के पवित्र जल से खुद को अभिसिंचित कर रहा हो। मैं सारे शोक से धीरे-धीरे उसी प्रकार से मुक्त होता चला जा रहा था जैसे स्वंय गरुण महाराज संकटों का नागफास को काटकर कृतार्थ कर रहे हों।

धीरे-धीरे बब्बा ने भजन को रफ्तार दी, यह उस सभा के अंतिम समय को दर्शाता था। बब्बा ने सारे देवी देवताओं से उनके स्त्रोतों द्वारा आशीर्वाद लिया और मुझसे अखबार लाने का आग्रह किया। मैंने बब्बा को अखबार देते हुए पुकारा- बब्बा

बब्बा- हम्म

मैं- आज विद्यालय में प्रगति पत्र मिलने वाला है।

बब्बा- तुम सब विषयों में अच्छे से उत्तीर्ण हो जाओगे।

मैं- पर मेरे विषय अच्छे से तैयार नहीं थे तो थोड़ा डर महसूस हो रहा है।

बब्बा- (ढांढस बढ़ाते हुए) धत्त तेरे की, तुमको और डर, डर किस चिड़िया का नाम है ? भगवान का नाम ले के जाओ, सब अच्छा ही होगा।

इसके पश्चात बब्बा ने आँख के आगे अखबार खोल लिया और अपने मोटे पुराने चश्मे से झाँकते हुए कहीं खो से गये।

खबरों में लीन, बिल्कुल शांत।

बब्बा, मैंने फिर दोहराया।

बब्बा- हम्म

पर उनकी नजर बराबर अख़बार पर थी।

मैं- आपको मेरे साथ विद्यालय चलना पड़ेगा क्योंकि अभिभावकों को ही प्रगति पत्र सौंपे जाएंगे।

बब्बा- ठीक है हम भी चलेंगे पर ऊपर तो नही चलना होगा।

बब्बा हृदय रोग से ग्रसित थे और सीढ़ियों पर चढ़ने से चिकित्सक ने मना किया था।

मैं- थोड़ा चलना पड़ेगा।

बब्बा- फिर भी मैं चलूँगा।

मैं- फिर आप अख़बार समाप्त करके तैयार हो जाइए, हम आपको ले चलेंगे।

बब्बा ने हामी भरी और फिर अखबार की खबरों में खो गए।

एक घण्टे पश्चात मैं फिर बब्बा के पास आया।

बब्बा बिल्कुल तैयार बैठे थे।

गांधी आश्रम का कड़क कुर्ता, सफेद धोती। सर पर नेहरू टोपी, गले मे रुद्राक्ष की माला महादेव की भांति बब्बा को सुशोभित कर रही थी।

माथे पर भस्म का त्रिपुंड उनके मस्तक के ओज को और गहराई प्रदान कर रहा था। बब्बा ने अपनी छड़ी उठायी और मेरे साथ चल पड़े।

स्कूल पहुँच कर मैंने स्थिति की पड़ताल की तो ज्ञात हुआ कि प्रगति पत्र ऊपर बँट रहे हैं।

बब्बा की स्थिति देखते हुए मैं उन्हें ऊपर नही ले जाना चाह रहा था पर बब्बा ने कक्षा में ले जाने की बात कही। खैर विकल्प शून्यता देखते हुए मैं उनको ऊपर अपनी कक्षा तक ले गया।

बब्बा को अपने मुख्य अध्यापक के पास ले गया। अन्य विषयों के अध्यापक भी वहीं बैठे हुए थे।

बब्बा को मेरा प्रगति पत्र दिया गया। बब्बा ने उसमे तनिक भी रुचि न दिखाई और पत्र को जेब मे रख लिया।अध्यापक ने पत्र पर एक नजर डाल लेने का आग्रह किया पर उन्होंने उनकी बात यह कहकर काट दी कि एक कागज का टुकड़ा किसी के विद्वता और ज्ञान का प्रमाण नही दे सकता। आंग्ल भाषा के अध्यापक उपाध्याय जी बड़ी बारीकी से सब देख रहे थे।

उन्होंने आंग्ल भाषा मे मुझे ले के टिप्पणी की। यह बात बब्बा को तनिक भी न जँची औऱ उन्होंने भी आंग्ल भाषा में अपनी मर्मज्ञता का परिचय देते हुए उपाध्याय जी को बहुत कुछ सुना दिया। बब्बा के मुख से शब्द ऐसे निकल रहे थे जैसे अर्जुन गांडीव लेकर मछली के आंख की ओर निशाने को भेद रहे हों। बब्बा को यदि सर्वप्रिय कोई था तो वो था ‘मैं’। मेरे बारे में वो कुछ भी नहीं सुन सकते थे।

उपाध्याय जी हक्के-बक्के हो गए।

उन्होंने बब्बा के आगे हाथ जोड़कर टिप्पणी के लिए खेद प्रगट किया।

बब्बा ने मुस्कुराते हुए उनकी पीठ थपथपाई औऱ मुझे लेके चल पड़े।

नीचे उतरते हुए मैने बब्बा से पूछा

‘कैसा रहा परिणाम , उत्तीर्ण तो हो गया हूँ न ?’

बब्बा ने कहा : उत्तीर्ण तो तुम जरूर हो गए हो पर मैं यह तुम्हे या फिर किसी को भी नहीं दिखाऊँगा।

और तुम मुझसे इस बात के लिए जिद भी न करना।

घर आने पर मन मे शंका, आशंका और उत्सुकता ने मन मे कुलबुली करना शुरू कर दिया पर बब्बा के दृढसंकल्पित दृष्टिकोण से मैं भलीभांति परिचित था तो मैंने उनसे इस विषय पर बात न करने का निश्चय किया।

शाम को पिताजी आये, उन्होंने मुझसे परिणाम के बारे में पूछा।

मैंने कहा परिणाम तो अच्छा है पर अंक नहीं पता।

पिताजी को आश्चर्य हुआ और वह बब्बा के पास आये और प्रगति पत्र के बारे में पूछा।

बब्बा ने एक सुर में उनकी चेष्ठा पर पानी फेर दिया। पिताजी ने बाबा से कहा- अरे एक पिता होने के नाते इतना तो पूछ ही सकता हूँ, बाबा ने तपाक से जवाब दिया-

‘अगर तुम उसके पिता हो तो हम उसके पिता के पिता हैं, कुछ भी देखने को नही मिलेगा।’

पिताजी ने भी हार मान ली और मैं भी मन ही मन प्रफुल्लित हो उठा कि इस विषय को ऐसे अंधकार मय होते देखना बहुत ही आनंदमय है।

कई साल बीत गए। बाबा हम सब को अकेला छोड़ कर चले गए।

उनके बक्से को खोलने पे उसमें मेरा प्रगति पत्र उनकी डायरी के बीच मिला, बिल्कुल सहेज के दुनिया की नजरों से दूर, बहुत दूर !


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