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एक कतरन
एक कतरन
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© Rupali Nagar ( Sanjha)

Drama Romance Tragedy

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कंक्रीट के जंगलों में ऐसा कम ही होता है पर ये सौ टका सच है; उस महानगर के बीचों-बीच वो बेतरतीबी से दूर-दूर तक फैला हुआ एक निहायत ही खूबसूरत हरा-भरा पार्क था। विश्व प्रसिद्ध इमारत को चारों ओर से घेरे हुए। उसमें दो छोटी-छोटी झीलें थी, ऊँचे-ऊँचे तन कर खड़े दरख्त थे, जो पंक्तियों में खड़े हुए किसी स्कूल के पीटी पीरियड की याद दिलाते थे। बाकि की सारी जगह हरी-हरी दूब थी, एकदम हरी मुलायम; मानो कोई मखमली कालीन बिछी हो, और इनमें चार चाँद लगाती थी फूलों और रंगीन पत्तों की क्यारियाँ जो जरी गोटे की तरह इनमें टाँकी गई थी। पूरे पार्क में सिरे से लैंप पोस्ट थे जो कि दिन के उजाले में तो काले चमकीले नजर आते थे, पर शाम धुंधलाते ही पीले सुनहरे रंग से चमक उठते थे, और फिर उनकी रोशनी में चुपके से रंग बदलते पेड़, घास, झील, जॉगर्स ट्रैक और उन सबके बीच खड़े-बैठे, घूमते-दौड़ते, लेटे-अधलेटे, रुठतेे-मनाते, लड़ते-झगड़ते, प्यार करते- सहलाते, गले लगते-लगाते, चूमते-चाटते, हँसी-ठट्ठा करते, खीजते- खाजते, अकेले-दुकेले, झुंड में शोर मचाते, उदास, बेचैन, खुश लोग... लोग ही लोग।

इस तमाम नजारे को भरपूर नजर देख पाने और नजरों में समाने के लिये रोशनी जलने के ठीक पहले और बाद में वहाँ होना जरूरी है, वरना किसी एक रंग से महरुम हो जाना तय है।

पता नहीं क्यूँ मैं हमेशा से अपने अंदर एक महान लेखिका के होने को जीती आई ( जो आप हकीकत में होते नही; उस ना होने को, ऐसे ही ख्वाबों में होने रहने देते है) और इसी गलतफहमी में खुद से; खुद के लिये, ये खयाल का खोमचा भी ठोंक लिया कि ऐसी किन्हीं जगहों पर जाकर चुपचाप बैठे सब देखते भी रहो तो कई सारे किरदार, किस्से यहाँ से उठाकर ले जाये जा सकते है, और घर पर अलगनी में टाँगें जा सकते है, और जब भी जरुरत हो उन्हें उतारकर अपनी रचनाओं में जामा पहनाया जा सकता है।

अपने इस महान खयाल या कहिये मुगालते की वजह से मैं अक्सर यहाँ आकर कई कतरनें जमा करती रही हूँ शगल के तौर पर।

तकरीबन हर रोज यही आबो-असबाब, यही मंजर रहता, लोगों का जखीरा, बस शरीरों पर चेहरे कुछ अलग-अलग से होते।

अपनी इसी रोजमर्रा की आवाजाही के दौरान मैंने नोटिस किया एक जवान खूबसूरत सा जोड़ा भी वहाँ अक्सर नजर आने लगा है।कभी बैंच पर बैठे हुए, कभी दूब पर अधलेटे हुए या कभी हाथों में हाथ डालकर टहलते हुए, पर हर बार दोनों जाने क्या बातें करते से नजर आते थे, हमेशा एक मुस्कुराहट उनके चेहरों पर टँंकी रहती थी, बड़े खुशदिल लगते थे दोनों।

घंटों काम की आपाधापी, काम की जगह पहुँचने और काम की जगह से वापस घर पहुँचने की भागदौड़ के बीच में उन दोनों के इतना खुश रहने की क्या वजह हो सकती थी ? क्या दोनों का कुछ समय यूँ साथ बिता पाना ? शायद यही, या शायद कुछ और क्या पता ? खैर जो भी हो; मुझे तो एक उम्दा फैब्रिक मिल गया था; खूबसूरत डिजाइनर ड्रेस बनाने के लिये, तो मैंने अपना सारा ध्यान उन्ही पर टिका दिया था।

लड़की जब भी मुस्कुराती थी बड़ी प्यारी लगती थी, ये और बात है कि वो अक्सर ही मुस्कुराती हुई नजर आती थी और लड़का भी मानो उसकी हँसी पर सौ जान निसार था। वो शायद वही सब कहता था जो लड़की को पसंद आये और वो सुनकर मुस्कुरा उठे और फिर वो खुद बस उसे निहारता रहे।

पब्लिक प्लेस है किसी को कहीं भी बैठने की आजादी है का झंडा उठाये मैं कई बार उनके नजदीक भी जा बैठी पर उन्हें इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ा वे अपनी ही दुनिया में खोये रहते।

वे इतने धीमे-धीमे बातें करते थे मानो फुसफुसा रहे हो या शायद उनके होंठ ही हिलते हो और वो समझ जाते हो कौन क्या कहना चाह रहा।

अक्सर लड़की अपने बालों की एक लट या कान में लटकती लटकन के साथ खेलती सी रहती, लड़का लगातार उसे देखता रहता, बस कभी-कभी इतना फर्क हो जाता कि उसका हाथ उसके बालों की लट या कान की लटकन से खेलने लगता, तब लड़की अपने उन्ही हाथों से तेजी से दूब उखाड़ने लगती। उस समय मुझे लगता इस तरह तो जब वे उस जगह से उठेंगें वहाँ दूब की जगह खाली खुदी हुई जमीन ही छूटी रह जाएगी। तभी लड़का उसके दूब उखाड़ते हाथों को अपने हाथों से छूता और उन्हें अपने हाथों में बेहद नरमी से बाँध लेता। तब लड़की फिर एक हाथ से अपने लटों या लटकन के साथ खेलने लगती। इस पूरे दौरान दोनों के होंठ कुछ कहते से रहते पर क्या कभी सुनाई नही पड़ा।

ये सब घंटों तो नहीं पर कुछ एक डेढ़ घंटे तक चलता रहता फिर दोनों उठते एक दूसरे का हाथ पकड़ते और धीरे-धीरे नजरों से ओझल हो जाते सुनहरी रोशनी भी उन्हें नजर आने से रोक नही पाती।

आहिस्ता-आहिस्ता उनकी मुलाकातों का सिलसिला बढ़ने लगा और लम्हें भी इसके साथ मेरी बैठक का समय और इंतजार की घड़ियाँ भी।

अब लड़का कभी-कभार उसके कंधे पर हाथ रखकर चलने लगा था वो पहले इघर-उधर देखकर हल्का सा झटका देती, फिर उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा देती, लेकिन हाथ हटाती नहीं थी, वो भी हटाता नहीं था, वे ऐसे ही चलते रहते थे, थमे हुए से; एक दूसरे को थामे हुए से।

आजकल वे मखमली हरी कालीन पर नहीं, अक्सर झील के किनारे हाथ में हाथ डाले बैठे रहते थे। अपने रंगबिरंगे ख्वाबों के कागजों की नावें बनाते थे और उन्हें झील में तैरा देते थे।बहुत मशगूल होकर देर तक इस खेल को वे खेलते रहते थे। कहाँ तक सैर करा लाती होंगीं उन्हें उनकी ये कश्तियाँ... मैं दूर बैठी ये सोचा करती।

कभी बैंच पर एक दूसरे के कंधों में हाथ डाले बैठे हुए, कभी एक दूसरे की कमर में हाथ रखकर टहलते हुए, कभी एक दूसरे की गोद में सिर रखकर लेटे हुए सारी दुनिया से बेखबर वो अपनी दुनिया में जी रहे होते या शायद उस दुनिया की कल्पना कर रहे होते जो उन्हें अभी हकीकत में मिली नहीं थी पर उसे वे पाना चाहते थे, जीना चाहते थे।

कोई प्यार में हो तो वो अपने प्यार के साथ कितने और कैसे प्यार में होता है ये जानने की चाह इंसान की सबसे बड़ी चाहत होती है। नहीं...? इस फितरत के शिकार कई है। इसमें डूबती-उतराती एक मैं भी।

बिना किसी ऊब के ये सिलसिला सूरज की रोशनी से लैंप पोस्ट की रोशनी, वहाँ से चाँद की रोशनी तक बदस्तूर चलता रहता। इन रोशनियों में उनकी मोहब्बत झिलमिलाती रहती। उनमें एक कशिश थी जो मुझे उन्हें लगातार देखते रहने से रोक नहीं पाती थी। मैं अनजान बनने का नाटक कर देर तक उन्हें कनखियों से देखती रहती थी पर शायद ही कभी इसका एहसास उन्हें हुआ हो।

अब वो जाते वक्त एक दूसरे का गाढ़ा सा आलिंगन लेने लगे थे जो उन्हें आगामी मुलाकात तक के लिये एनर्जी देता होगा। फिर बिछड़ना फिर मिलना इसके बीच का वक्त दोनों कैसे बिताते होंगे, क्या सोचते होंगें एक दूसरे के बारे में, कैसे महसूस करते होंगें एक दूसरे को....

मैं अपने तई सोचती रहती और अपने तैयार होते जा रहे ड्रेस पर एक और नयी कढ़ाई करती रहती।

आज लड़का बहुत खुश; बहुत हँसता सा लग रहा था, लड़की तो थी ही मुस्कुराती हुई सी।पता नहीं क्या बात थी लड़के की खुशी अचानक लड़की के हँसते होंठों को देखने की बजाय छूने पर जाकर टिक गई। लड़की हँसते-हँसते भौंचक रह गई उसकी बंद आँखों की कोरों पर ओस की बूंद सा कुछ ठहर गया।कुछ देर के लिये वक्त भी ठहर सा गया। लड़का जब अपनी सारी खुशी उसके होंठों को बता चुका तब उसने धीरे से लड़की को अपनी बाहों में भरा और उसकी ओस की बूंदों को अपने होंठों में उतार लिया। अब लड़की का चेहरा उसके दोनों हाथों में था जिसे वो काफी देर तक सहलाता रहा। लड़की अब भी मुस्कुरा रही थी पर ये मुस्कुराहट पहले की सारी मुस्कुराहटों से अलग थी, थोड़ी भीगी-भीगी सी,और लड़के की हँसी थी तप्त सी।

इसकेे बाद दोनों काफी देर तक चुपचाप बैठे रहे एक दूसरे में गुम या एक दूसरे से गुम ...क्या पता। चलने की बेला आयी दोनों हमेशा की तरह चलते-चलते मेरी आँखों से गुम हो गये। मैं कुछ देर वहाँ और बैठी रही बस यूँ ही, कतरनें मैं फिर भी इकट्ठा करती जा रही थी जो आस-पास उड़ती सी आती-जाती रहीं थी।

मैंने महसूस किया अब उनके शरीर ज्यादा बातें करने लगे थे उनके लबों की तुलना में। हालांकि वो भी उतने ही धीमे-धीमे जितने कि उनके लब किया करते थे। यहाँ लड़का ज्यादा बातें करता था, लड़की सुनती नजर आती थी, शायद उसके पास कहने को ज्यादा कुछ था नहीं या वो ये जानती थी कि जो उसे कहना है वो लड़का सुनेगा नही, या ऐसा भी कि जो उसे कहना है वो तो वो जानती है, जो लड़का कहना चाह रहा वो वह सुने तो जान सकेगी कि ये अलग सा कहना क्या होता है....

मैं तो बस अंदाजे ही लगा सकती थी।

मुझे कई बार लगता कि मैं उनके साथ गलत कर रही हूँ पर मैं करती भी क्या मैं अपने आप को रोक ही नहीं पाती थी। जब आप रुमानियत के इस दौर में पहुँचे नहीं होते है, या उसे कहीं बहुत पीछे छोड़ आये होते है, या फिर उस दौर में तो होते है पर उस दौर को जी नहीं पा रहे होते है, या या या...या कि आप इतने बदकिस्मत होते है कि आपको ये मौका ही नहीं मिला होता तो आपके पास अपनी फंतासियाँ इस तरह पूरा करने के सिवाय कोई चारा भी तो नही होता। मेरे पास तो फिर भी एक वाजिब वजह थी कि मैं तो एक किस्सा गढ़ने के लिये ताना-बाना बुन रही थी। इस खयाल के आते ही मैं पिछले सारे फिकरों को एकदम से झटक देती और उनकी दुनिया में हवा बनकर बहती रहती।

उनके कहने सुनने और मेरे गवाह बनने के बीच कई प्यार भरे लम्हें हिचकोले खाते रहे।

आज भी उनका आना हमेशा की तरह था वे झील के पास जा बैठे और मैं थोड़ी दूरी बनाकर उनके पास। बुदबुदाती हुई सी आवाजें जिन्हें मैं कई बार सुनने की चाहत रखती थी, हमेशा की तरह बड़ी खामोशी से कहीं जा रही थी, और मैं हमेशा की तरह एक भी शब्द तक नहीं पहुँच पा रही थी। पर आज वे कागज की कश्तियों का खेल नही खेल रहे थे। उनके हाथों में कागज की फिरकनियाँ थी जो शरीर की तेज उठती आँधी से तेज-तेज घूम रहीं थी, लड़की की फिरकी कम-कम , धीरे-धीरे घूम रही थी, हवा शायद कम थी उसके हिस्से में। देह की भाषा जोर-शोर से कुछ कहना चाह रही थी, लड़की की असहजता बढ़ती जा रही थी, पर लड़का बराबर उसे बोलने के लिये उकसा रहा था। लड़की बस मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी और मुस्कुराहट ऐसी मानो आऊँ या ना आऊँ के बीच कहीं टंगी हुई सी। काफी देर ये सिलसिला चलता रहा। अब मेरे लिये वहाँ बैठे रहना काफी मुश्किल हो गया था, एक तरह से ये ठीक भी नहीं था। मैं उठी थोड़ी दूर जाकर एक बैंच पर बैठ गई और दूसरी कतरनों की तलाश में नजरें इधर-उधर दौडा़ई लेकिन हर जगह वही एक सा आलम था अलग-अलग मुखौटों के पीछे। मैं भी यूँ ही अपनी नजरें दूर-दूर तक घुमा कर वापस लाती रही।

अचानक एक तेज आवाज ने मेरा ध्यान फिर उस ओर कर दिया .... वो ही लड़का एक झटके से उठ खड़ा हुआ था और उसी के मुँह से वो आवाज निकली थी... " साली बिच्च मना करती है " बोलता हुआ बड़ी तेजी से मेरे पास की क्यारी की ईट पर ठोकर मारता हुआ निकल गया।

ये क्या.... पहली बार दोनों के बीच की बात का एक हिस्सा मेरे हिस्से आया जो मैं अंदर ही अंदर कब से चाह रही थी और वो ये था....

"स्साली बिच्च मना करती है"

ऐसी कटिंग का ड्रेस तैयार करने का तो मैंने सोचा ही नहीं था। "बिच्च" का "साथी" भौंक कर जा चुका था। वो स्साली बिच्च घुटनों में सर डाले हताश हाँफती- रिरियाती हुई बैठी रह गई थी। थोड़ी देर में वो स्साली बिच्च भी किकियाती, गिरती पड़ती सी वहाँ से लस्त-पस्त हालत में भाग निकली।

मेरे अंदर का राइटर वहीं कहीं तभी का तभी गिर पड़ा और मैं सिर्फ अपने आप के साथ अपने रास्ते निकल पड़ी।

एक कतरन हाथ लगी थी वो ही कतरा-कतरा हो गई। मेरा डिजाइनर ड्रेस बनने के पहले ही बिगड़ चुका था। मार्केटिंग का जमाना है तो सेल या सेकेंड्स में कहीं ना कहीं बिक ही जाएगा दाम भी मिल ही जाएंगे पर एक उम्दा शोरुम की शान बनने से महरुम रह गया। क्या पता किसी ब्रैंड नेम से लाखों का हो जाता। पर अफसोस बस अफसोस। कुछ ना हो सका।

अब मैंनें काफी दिनों से उस पार्क में जाना छोड़ दिया है मन जाने तो कैसा-कैसा हो गया है।

अकेले जाकर करती भी क्या, मेरा साथी राइटर तो उसी वक्त जाने कहाँ चला गया था मुझे छोड़कर ।

अलबत्ता नींद में अभी भी कई बार वो "स्साली बिच्च" कुकियाती हुई चली आती है, मेरी नींद हराम कर चली जाती है मैं बड़ी देर तक कमरे में यहाँ से वहाँ चक्कर लगाती रहती हूँ।

और हाँ... जागते हुए पता नहीं क्यूँ मुझे कुत्तों से बड़ा खौफ आने लगा है। मैं बहुत-बहुत कतराने लगी हूँ उनसे सच में।

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