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 नवजीवन
नवजीवन
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© Anu Pande

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धरा , धूल बन चली नभ से मिलने, धरा से निकल, नभ से निभ जाने को ।

ओस की बूंदों से पलकर, सावन में पल्लवित हो,

हरी - भरी इक बेल पल्लवित हो, नभ की ओर चली ।

कोंपलें, कली पल्लवित हो, कुसुमित हुयी,

धरा और नभ का मिलन फलित हुआ ।

फलो से लदी धूल, धरा की ओर झुकी ,

 धूल -धरा से मिल ममत्व को प्राप्त हुयी ।

नवांकुरो के किलोल से, धूल - धरा निहाल हुयी,

नभ - छाया में नवांकुर जीवन धारणा को प्राप्त हुए ।

नभ -धरा के ठहराव मे, सृष्टि की संरचना में,

नव -जीवन पल्लवित हो आनंदित हुआ।

भोर की किरणें जब धरा को छूती,

ऑगन में कपिला ,छौने संग रंभाती।

 सुख सवेरा हो ,शीतल उजियारा,

सुवर्ण किरणों संग , जग मदमाता ।

जगमग करती सुवर्ण उषा की किरणें,

 नव - पल्लव को , ओस का अर्क दे जगाती।

नवोदय में नवांकुर, नवजीवन को जीते,

धूल -धरा संरक्षण में नवयौवन पाते।

नव कुसुम ,निश्छल,स्वतंत्र हो नभ तले,

 भौरों संग इठलाते , प्रणय गीत गाते ।

 धूल, धरा, नभ, निहाल हो निश्छल से,

 कुमुद, कुसुम , किलोल देख इतराते ।

 नवजीवन की ओर अग्रसर नव पल्लव को,

शत् - शत्, आशीष , दे निहारते ।

जीवन की यही रीत पुरानी,

नव पुरातन भये, पुरातन भये नभ।

आच्छादित हो पुरातन से ,

नवजीवन हो पुनः पल्लवित ।

जीवन चक्र यूहीं चलता रहे ,

धरा, धूल, नभ संग संग्रहित ।

नवांकुर , नवकुसुम पल्लवित हो,

जीव ही जीवत्व पर गर्वित हो।

बने फिर इक दूसरे का आसरा,

धूल -धरा -नभ, बने जीवन चक्र हमारा ।

आओ हम सब धरा बचाये,

धूल व नभ संग जीवत्व सजाये ।

जीवन चक्र का विवरण नूतन एवं पुरातन का समावेश एवं सामंजस्य ।

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