Mahak Sharma

Drama Romance


4.2  

Mahak Sharma

Drama Romance


वो बरसात

वो बरसात

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आज जब ऑफिस से निकला तो रास्ते में रोज की तरह ट्रैफिक था। लेकिन मौसम कुछ अलग था, हल्की हल्की बरसात होने लगी थी। लाल बत्ती पर बाइक रोकनी पड़ी तो मेरा सब्र जवाब देने लगा, एक तो ऑफिस की थकान और ऊपर से ये रेड सिग्नल।

लेकिन तभी मेरा ध्यान सड़क के उस तरफ खडी लड़की पर गया। रंग गोरा, हलके भूरे बाल, बड़ी बड़ी आँखेंं और होठोंं के ऊपर दाईं ओर एक तिल। बरसात में भीगते हुए वो शायद घर जाने के लिए किसी ऑटो का इंतज़ार कर रही थी। इतने में बरसात और तेज हो गयी और रेड सिग्नल भी ग्रीन। लेकिन न जाने क्यों मैं उस चेहरे को देखे ही जा रहा था। तभी गाड़ियों के शोर से मेरा ध्यान भंग हुआ और मैं आगे चल पड़ा। मैंने पीछे मुड़कर देखा तब तक वो लड़की भी ऑटो में बैठ चुकी थी।

घर आकर मैंने माँ से कहा की चाय मेरे कमरे में भेज दें। ऐसे तो मुझे बरसात में भिगना कुछ खास पसंद नहीं था पर आज मुझे पहली बार बरसात में भीगकर बुरा नहीं लग रहा था। 

रात भर वही चेहरा मेरी आँखों के सामने रहा। हालांकि इस तरह से कई चेहरों से अनजाने में मेरा सामना हुआ है लेकिन न जाने क्यों मैं उस चेहरे को भुला नहीं पा रहा था।

सुबह आज समय से पहले ही मेरी आँख खुल गई तो सोचा आज बालकनी में चाय का मजा लिया जाये। चाय लेकर जब मैं बालकनी में आया तो अचानक से मेरी नज़र सामने वाले घर पर पड़ी, वो घर काफी दिनों से बंद था लेकिन आज वहां कुछ हलचल नज़र आ रही थी। लगता है कोई नया किरायेदार आया होगा। मैं ये अनुमान लगा ही रहा था कि तभी अचानक ठीक मेरे सामने उसी घर का दरवाजा खुला और बालकनी में एक लड़की अपने बाल सुखाती हुई नजर आई।

अरे! ये क्या ये तो वही चेहरा है जो कल रात भर से मेरे जहन में अटका हुआ है। हाँ ये वही लड़की है जिसे मैंने कल शाम को देखा। एक पल के लिए मेरा दिमाग असमंजस में पड गया। क्या ये किस्मत का कोई खेल है या महज एक इतेफाक ?

खैर मेरे देखते ही देखते वो फिर से अंदर चली गयी शायद उसकी नज़र मुझ पर नहीं पड़ी थी।

माँ ने मुझे खाने के लिए आवाज लगाई तो मैं भी नीचे चला आया।

तैयार होकर ऑफिस के लिए निकला तो बरबस ही नज़र सामने वाले घर पर चली गयी। दरवाजा बंद था। मैंने बाइक स्टार्ट की और निकल गया। सारा दिन काम में उलझ कर उस लड़की के बारे में भूल गया। लेकिन शाम को जब घर आया तो सामने वाली बालकनी देख फिर से उसी के ख्याल ने दिमाग को घेर लिया।

रात फिर से करवटों में ही गुजर गई। 

सुबह ऑफिस के लिये निकला तो थोड़ी दूरी पर ही वो फिर से मुझे टैक्सी का इंतज़ार करते हुए दिखाई दी।इस बार मैं खुद को रोक नही पाया।मैंने उसके सामने बाइक रोकी और कहा "अगर आप चाहे तो मैं आपको आपकी मंज़िल तक पहुंचा सकता हूँ....ओह! मेरा मतलब लिफ्ट से है"

उसने मुझे सवालिया नज़रो से देखा।

"सॉरी ! दरअसल मेरा नाम मयंक है और मैं आपके सामने वाले घर में रहता हूँ। शायद आपने मुझे नहीं पहचाना"

"नहीं मैं चली जाऊँगी, ईट्स ओके" उसने कहा।

"आप मुझ पर भरोसा कर सकती हैं" मैंने बोला।

उसने एक पल अपनी घड़ी की ओर देखा और फिर मेरी तरफ फिर और वो मेरी बाइक के पीछे बैठ गई।

मैंने पूछा " कहाँ जाना है आपको ?"

"लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज" उसने कहा।

कुछ ही देर में हम उसके कॉलेज के सामने थे।

मैंने उस से कहा" अगर कभी किसी मदद की जरूरत हो तो जरूर बताइयेगा" 

उसने मुस्कुराकर कहा" जी, शुक्रिया" और वो कॉलेज के गेट की तरफ मुड़ गई। मैं भी अपने ऑफिस की तरफ निकल पड़ा। आज ऐसा लग रहा था मानो कोई छिपा हुआ खजाना हाथ लग गया हो।

उस चेहरे में एक कशिश थी जो मुझे अपनी तरफ खिंच रही थी।

आज ऑफिस का काम करने में मजा आ रहा था, मन में एक अलग तरह का उल्लास था। 

पहली बार, पहली बार मुझे किसी से मिलकर अच्छा लगा था।

अगले दिन इतवार था तो मैं सुबह देर से उठा।

नीचे आया तो माँ नाश्ता लगा रही थी।

मैंने माँ से पापा के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि पापा सुबह ही अपने किसी दोस्त से मिलने निकल गए, किसी काम के सिलसिले में।

मैं सोफे पर बैठकर अख़बार पढ़ने लगा की तभी दरवाजे की बेल बजी।

मैं उठकर जाने लगा कि माँ बोली रुक मैं देखती हूँ।

माँ ने दरवाजा खोला तो सामने वही लड़की खड़ी थी।

"आंटीजी, मैं सामने वाले घर में रहती हूँ। प्रेस वाला शायद आपके कपड़े हमारे घर दे गया है और हमारे आपके घर। आप एक बार चेक कर लीजिए" उसने कहा।

"ओह,मैंने तो कपड़े देखे बिना ही रख दिए। गठरी भी नहीं खोली। तुम रुको बेटा, मैं चेक करती हूं। और अंदर आ जाओ बाहर क्यों खड़ी हो ?"

इस से पहले की वो अंदर आती मैं उठकर किचन में चला गया क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मुझे देखकर वो अंदर आने में हिचकिचाए।

"तुम बैठो में अंदर से कपड़े लेकर आती हूँ"

"जी"

मैं उसे किचन से देख रहा था लेकिन कोशिश ये थी की उसकी नज़र मुझ पर न पड़े।

कुछ देर में माँ अंदर से कपड़े लेकर आई।

"ये लो बेटा तुम्हारे कपड़े और मैं प्रेस वाले से कह दूंगी कि आगे से ऐसी गलती न हो"

"जी, अच्छा अब मैं चलती हूँ" वो बोली।

दिल से निकला " अभी कैसे ?"

माँ ने कहा "अरे बैठो तो सही कम से कम, पहली बार घर आई हो हम भी तो जान पहचान कर ले। मैं तुम्हारे लिए चाय लेकर आती हूँ या ऐसा करो तुम भी हमारे साथ नाश्ता कर लो।"

"जी नहीं, आप लोग कीजिये, धन्यवाद।"

"अच्छा ठीक है अगर तुम्हे कुछ लेना नहीं है तो कुछ देर बात तो कर सकते हैं, है न ?" माँ ने हँसकर कहा।

"जी,ठीक है" उसने मुस्कुराकर कहा।

"तो क्या नाम है बेटा आपका ?"

"अंकिता, अंकिता सिंह"

"ओह! तो मैडम का नाम अंकिता है।" मैंने खुद से बोला।

"घर में कौन कौन है ? पापा क्या करते हैं ? इस से पहले आप कहाँ रहते थे ?" माँ ने बहुत सारे सवाल पूछ डाले एज युजुअल।

उसने बताना शुरू किया-" जी पापा इंडियन रेलवे में इंजीनयर हैं, घर में मम्मी,पापा,मैं और एक छोटा भाई हैं, इस से पहले हम लोग देहरादून में रहते थे लेकिन अभी कुछ दिन पहले ही पापा का ट्रांसफर यहां दिल्ली में हो गया।"

इस से पहले की वो फिर से जाने के लिए कहती, मैं तुरंत चाय ले जाकर सामने रख दी और पूछा-"चाय"

उसने मुझे एक पल हैरानी से देखा-"आप!" 

"जी हां और इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है क्योंकि ये घर मेरा ही है"

माँ ने हम दोनों की तरफ देखा।

"दरअसल माँ कल ये अपने कॉलेज के लिए लेट हो रही थी तो मैने इन्हें लिफ्ट दी थी, बस" 

"अरे ये तो अच्छा है की तुम दोनों एक दुसरे को जानते हो" माँ ने कहा।

तभी फोन की घंटी बजी और माँ फोन उठाने के लिए चली गयी।

"तो अब तो आप यकीन करती हैं न की मैं झूठ नहीं बोल रहा था" मैने कहा।

जवाब में वो मेरी तरफ मुस्कुरा दी।

माँ आई तो उसने बोला-"अच्छा अब मुझे चलना चाहिए'"

"ठीक है बेटा, तुमसे बात करके अच्छा लगा"

"जी मुझे भी" और फिर वो चली गई।

उस दिन के बाद दोनों घरों में मेलजोल बढ़ गया।

कभी पापा और अंकल जॉगिंग के लिए निकल जाते कभी मम्मी आंटी से किचन टिप्स लेने चली जाती और कभी मैं अंकिता को लिफ्ट दे देता।

एक दिन घर लौटते वक़्त अचानक ही वो मुझे रास्ते में मिल गई।

"अरे तुम यहाँ ? तुम तो आज कॉलेज नहीं गई थी न फिर यहाँ कैसे ?"

"हाँ वो सुबह से तबियत कुछ ठीक नहीं थी"

"तो तुम्हें घर में आराम करना चाहिए था, यहाँ क्या कर रही हो ?"

"अरे बीमार होने का मतलब घर में बैठना नहीं होता, और घर में मन नहीं लग रहा तो थोड़ा घुमने चली आई"

"ओह, ये बात है तो अगर आपकी इज़ाज़त हो तो आप मेरे साथ कॉफ़ी के लिए चलेंगी ? यहीं पास में एक अच्छा कैफे है"

"ठीक है लेकिन मुझे जल्दी ही घर जाना होगा"

"हाँ ठीक है, अब चलें ?"

कैफे में हम दोनों आमने सामने थे।

"क्या हुआ कुछ खोई-खोई सी लग रही हो, क्या बात है ?"

"नहीं ऐसा कुछ नहीं है, तुम्हें यूं हीं लग रहा है"

"देखो तुम मुझे बता सकती हो, शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर पाऊँ"

"कुछ खास नही बस स्टडी को लेकर परेशान हूँ, एग्जाम आने वाले हैं और अभी तक मुझे कोई ढंग का ट्यूटर भी नहीं मिला है"

"बस इतनी सी बात ?, अरे अच्छा खासा ट्यूटर तुम्हारे सामने बैठा है और तुम बाहर ढूंढ रही हो"

"मयंक तुम क्या कह रहे हो मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा"

"अरे भई यही की हम भी एम बी ए क्वालिफाइड हैं, एंड इफ यू वांट देन आई कैन गिव यू कोचिंग"

"रियली ? क्या तुम सच में मुझे कोचिंग दोगे ?"

"हाँ क्यों नहीं, तुम चाहो तो कल से आ सकती हो"

"तो बस मुझे टाइमिंग बताओ और फीस क्या लोगे ?"

"फीस! दोस्ती में ये फीस कहाँ से बीच में आ गई ?"

"दोस्त!"

"हाँ अब इतनी जान पहचान के बाद हम एक दूसरे को दोस्त तो कह ही सकते हैं"

"बिल्कुल, क्यों नहीं ?"

"तो ठीक है कल से टाइम पर आ जाना, ठीक 6 बजे"

"जी, सर" उसने बोला ओर हम दोनों हँस पड़े।

उसके बाद वो घर ट्यूशन के लिए आने लगी और हमारी दोस्ती बढ़ती चली गई।

वो हर शाम मेरे आने से पहले ही घर पर आ जाती और मैं उसे पढ़ाता। बीच बीच में हम बहुत सी बातें भी करते, कभी अपनी-अपनी ज़िन्दगी की, कभी बचपन की, कभी अपने सपनों की तो कभी किसी ओर टॉपिक पर।

कई बार वो देर तक अपनी बातें कहती रहती और मैं सुनता रहता। मुझे उसे बीच में टोकना अच्छा नहीं लगता था जब तक कि वो पलटकर खुद मुझसे जवाब न मांगे। और मैं जितना उसके बारे में जानता जा रहा था मैं उसमे डूब भी रहा था और उलझ भी।

वो कभी मुझे एक चंचल पंछी की तरह आज़ाद लगती थी तो कभी अपने सपनों में खोई दूर आसमान में ताकती एक कैदी की तरह। वो अपने आप में एक पूरा जहां समेटे रहती थी और जब भी कुछ कहती थी तो पहली बार में शायद ही मुझे कुछ समझ में आता था। वो पागल भी थी और समझदार भी, कभी एकदम सीधी और सुलझी हुई तो कभी रेशम के धागे सी उलझी हुई। समझ में नहीं आता था कि उसे क्या कहूँ मैं ? बस इतना जनता था कि कहीं न कहीं उसके करीब आता जा रहा हूँ। मैंने कभी उसके और अपने बारे में कुछ सोचा नहीं कि वो मेरे लिए क्या महसूस करती है। बस मैं उसका साथ चाहता था और उसे अपने आस-पास।

ये दोस्ती का सिलसिला यूँ ही जारी रहा। करीब 2 साल होने को आए थे और अब तक हमारी दोस्ती बहुत मजबूत हो चुकी थी। वो मुझे समझने लगी थी और शायद थोड़ा मैं भी। सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक वो एक दिन पढ़ने के लिए नहीं आई। मुझे लगा शायद उसकी तबियत खराब होगी या कहीं गई होगी। लेकिन पहले तो वो मुझे बता देती है जब भी ऐसा कुछ होता है तो।

मैंने सोचा कि चलो इंतजार करते हैं।

एक दिन गुजरा,दो दिन गुजरे और फिर तीसरे दिन इंतज़ार करना मुश्किल हो गया। मैंने उसका फोन भी ट्राय किया लेकिन उसने नहीं उठाया। आखिरकार मैंने तय किया कि मैं कल सुबह ही उसके घर जाकर पूछुंगा लेकिन फिर मुझे लगा कि नहीं सुबह-सुबह अच्छा नहीं लगेगा। और अगर बात कुछ भी न हुई तो!

"ऐसा करता हूँ कि कल शाम ऑफिस से आकर मैं किसी बहाने से उसके घर जाऊंगा और फिर सारी बात पूछ लूंगा। हाँ ये सही रहेगा" 

अगले दिन मैं ऑफिस गया लेकिन वहाँ भी दिमाग में हलचल थी।

"क्या हुआ होगा जो उसने मुझे नहीं बताया ? ऐसा भी क्या था ? वो ठीक तो है ना ? वो मुझे एक फोन भी तो कर सकती थी न" न जाने कितने सवाल घूम रहे थे मेरे दिमाग में।

शाम होते ही मैं घर की तरफ भागा और आज भी बरसात हो रही थी। घर पहुँच कर कपड़े बदल कर मैं सीधे अंकिता के घर गया।

"अरे, मयंक बेटा आओ आओ बहुत दिनों बाद घर आए। चाय लोगे या मैं कुछ और बनाऊँ ?" अंकिता की माँ ने कहा।

"नहीं आंटी थैंक्स, वो मैं अंकिता से मिलने आया था। क्या हुआ वो कुछ दिनों से पढ़ने भी नहीं आई घर ? सब ठीक तो है ना आंटी ?"

मुझे कोई जवाब नहीं मिला।

"आंटी बताईए न क्या हुआ है, अंकिता कहाँ है ?"

"बेटा क्या हुआ है ये तो मुझे भी नहीं पता, बस उसने कुछ दिन से खुद को कमरे में बंद कर के रखा है। न ढंग से खा-पी रही है और न ही किसी से बात ही कर रही है। मैं तो थक चुकी हूँ पूछकर, अब तुम ही जाकर उस से बात करो शायद तुम्हें कुछ बताए।"

"जी आंटी"

मैं जब उसके कमरे में गया तो दरवाजा खुला था और वो खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी एकटक शून्य में देख रही थी। मुझे बहुत हैरानी हुई क्योंकि आज से पहले मैंने कभी उसे ऐसे नहीं देखा था।

"अंकिता" मैंने धीरे से उसके पास जाकर कहा।

"मयंक तुम क्यों आये हो यहाँ ?" उसने बिना मेरी तरफ देखे मुझसे सवाल किया।

"मैं जानने के लिए आया हूँ की आखिर हुआ क्या है ?, आंटी ने बताया की तुमने खुद को कमरे में बंद कर रखा है,क्यों कर रही हो ऐसा ? बताओ अंकिता क्या बात है ?" 

"अरे ऐसा कुछ भी नहीं है और माँ को तो आदत है फ़िक्र करने की। कुछ भी नहीं हुआ है, तुम बहुत ज्यादा सोच रहे हो।"

"अच्छा मैं ज्यादा सोच रहा हूँ तो तुम चार दिन से घर क्यों नहीं आई पढ़ने ?"

"अरे वो ऐसे ही तबियत ठीक नहीं लग रही थी।"

"तो क्या तुमने मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा ?"

वो चुप रही।

"देखो अंकिता तुम चाहे कुछ भी कर लो लें तुम मुझ से झूठ नहीं बोल पाओगी तो बेहतर यही होगा कि तुम मुझे सच बताओ। अंकिता प्लीज़" इतना कह कर मैंने जब उसके कंधे पे हाथ रखा तो वो मुझसे लिपटकर जोर से रो पड़ी।

मैंने उसे चुप कराया और पूछा क्या बात है, तो उसने बताया कि देहरादून में कॉलेज में उसके साथ एक लड़का पढता था जिसे वो प्यार करती थी, वो उसका अच्छा दोस्त भी था। लेकिन ये बात कभी उसे बता नहीं पाई। उसने बताया की पिछले हफ्ते वो दिल्ली आया हुआ था और उसने अंकिता से मिलने के लिए कहा। लेकिन अंकिता के घर पर किसी को न पता होने की वजह से उसने उसे मना कर दिया। बस तब से वो न ही अंकिता से बात कर रहा है और न उसके मैसेजेस का कोई जवाब दे रहा है।

"तुम ही बताओ मयंक मैं क्या करूं ?" इतना कह कर वो फिर से रोने लगी।

मुझसे उसके आंसू देखे नही जा रहे थे और गुस्सा भी बहुत आ रहा था दोनों पर। कोई इतनी अच्छी लड़की साथ भला ऐसे कैसे कर सकता है ? और कोई इतना बेवकुफ़ कैसे हो सकता है कि उस इन्सान क लिए अपने आंसू बहाए जिसने उसे कभी समझा ही नहीं।

"देखो अंकिता, हो सकता है इस वक्त तुम्हे मेरी बातें बुरी लगें लेकिन एक दोस्त होने के नाते मैं तुमसे यही कहना चाहूँगा कि उस इन्सान के लिए अपने आंसू बहाना बेकार है जिसने कभी तुम्हारे जज्बातों की कद्र ही नहीं की। उस इन्सान से प्यार करने का क्या फायदा जिसने तुम्हारी दोस्ती तक को नहीं समझा"

"प्यार में फायदा या नुकसान नहीं देखा जाता मयंक"

"हाँ जानता हूँ कि प्यार फायदा या नुकसान देख कर नहीं किया जाता लेकिन सबसे पहले तुम उसकी दोस्त थी और एक दोस्त होने के नाते उसे तुम्हे समझने की कोशिश तो करनी चाहिए थी। न की तुमसे ऐसा बर्ताव करना चाहिए था। देखो हो सकता है की वो तुमसे प्यार न भी करता हो लेकिन मुझे लगता है कि उसकी दोस्ती भी एक दिखावा थी। वरना वो तुम्हें ऐसे इग्नोर नहीं करता"

"मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है की उसने ऐसा क्यों किया लेकिन मैं खुद को सम्भाल नहीं पा रही हूँ क्योंकि मैंने उसे दिल से चाहा था"

"मैं समझ सकता हूँ तुम्हारी हालत लेकिन खुद को ऐसे सबसे अलग रखकर, ऐसे भूखा-प्यासा रहने से क्या हासिल होगा ? तुम्हीं बताओ क्या तुम नाइंसाफी नहीं कर रही हो ? खुद के साथ, अपनी फैमिली क साथ अपने दोस्तों के साथ, बोलो ? जो कुछ हुआ उसमे तुम्हारा कोई कुसूर नहीं था फिर तुम खुद को सजा क्यों दे रही हो ? क्या इस तरह से खुद को तकलीफ देकर तुम सही कर रही हो,बताओ ?"

उसने मुझे मासूम नजरों से देखा जैसे वो मुझसे मदद मांग रही हो।

"तुम चिंता मत करो मैं तुम्हारे साथ हूँ बल्कि हम सब तुम्हारे साथ हैं। तुम इस तरह से अपना हौन्सला नही तोड़ सकती, क्या हुआ अगर एक इन्सान तुम्हें समझ नही सका। यहाँ तुम्हारे अपने भी हैं जो तुम्हें बहुत चाहते हैं। तुम फ़िक्र मत करो सब ठीक हो जाएगा"

उसने मुस्कुरा कर मेरी तरफ हाँ में सिर हिलाया।

"और एक बात कान खोल कर सुन लो कल से मेरी क्लास में आना शुरू कर दो वरना....."

"जी सर" और फिर हम दोनों मुस्कुराने लगे।


मैं घर वापिस आकर कमरे में लेट गया। मेरे अंदर कुछ था जो न चाहते हुए भी मुझे महसूस हो रहा था लेकिन क्या ? कुछ सवाल कुछ जवाब मेरे अंदर कशमकश पैदा कर रहे थे।

"क्यों मैं उसके आंसू देख नहीं पा रहा था ? क्यों मुझे उसके दर्द से इतनी तकलीफ हो रही थी ? क्यों मुझे उस इन्सान से इतनी जलन हो रही थी ? क्यों मैं उसे रोता देख खुद को बेबस महसूस कर रहा था ? क्या मुझे अंकिता से प्यार हो गया है या कुछ और बात है ? हाँ या न ?"

"हाँ" मेरे दिल से जेसे एक आवाज़ आई।

"हाँ मैं सच में अंकिता से प्यार करता हूँ वरना मुझे इतनी बैचेनी नहीं होती उसे न देखकर, उसके आंसुओ से मुझे यूँ दर्द न होता। लेकिन अब मैं उसे और नहीं रोने दूंगा और न ही मैं उसे कभी खुद से अलग होने दूंगा।

अब मैं उसे कभी खोना नहीं चाहता, कभी नहीं।"

ये एहसास एक अजीब तरह का था। शायद इसे ही पहले प्यार का एहसास कहतें हैं। और ये सोचते ही मेरे होठों पर एक मुस्कान फ़ैल गई।

अगली सुबह उठा तो दिल में एक हल्कापन था जैसे कोई बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो। 

शाम को जब घर वापिस आया तो अंकिता को हमेशा की तरह देख कर ख़ुशी हुई। उसके चेहरे की मुस्कान देखकर और भी अच्छा लगा।

"देखिये आज मैंने हम दोनों के लिए कॉफ़ी बनाई है" उसने चहकते हुए कहा।

"अरे वाह, कमाल है। वैसे माँ कहीं दिखाई नही दे रहीं, कहाँ हैं ?"

"आंटी जी बाज़ार गई हैं, कुछ सामान लेने"

"ओके, तो चलो पढाई शुरू करते हैं"

"हाँ ठीक है, लेकिन उस से पहले मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ मयंक"

"हाँ बोलो"

"दरअसल मैं तुम्हारा थैंक्स करना चाहती थी, कल अगर तुम मुझे नहीं समझाते तो शायद मैं अंदर ही अंदर घुटती रहती। शायद मैं कभी जान नहीं पाती कि मैं गलत कर रही हूँ या सही। लेकिन तुमने मुझे फिर से हौंसला दिया, फिर से हिम्मत दी जो शायद एक सच्चा दोस्त ही कर सकता है और इन सब के लिए थैंक यू सो मच"

"अरे बस बस अब क्या रुलाओगी ? पागल दोस्तों पे हक जताया जाता है उन्हें थैंक्स नही कहा जाता, समझी। अच्छा चलो अब वरना तुम्हारा सिलेब्स कम्प्लीट नहीं हो पायेगा।"

"हाँ ठीक है चलो"


इस बात को लगभग एक साल बीत गया था।

इस बीच मैंने कई बार उस से अपने दिल की बात कहने की कोशिश की पर न जाने क्यों किसी डर के कारण मैं चुप हो जाता था। कई बार मुझे महसूस होता था कि उसके दिल में भी मेरे लिए कुछ है और शायद वो मेरे दिल की बात जानती है। लेकिन फिर लगता था की वो इन सब से बिलकुल अनजान है। न जाने उसमे क्या जादू था वो मेरे दिल की कोई भी बात बिना कहे जान लेती थी लेकिन ये बात कि मैं उसे चाहता हूँ शायद वो जानती नहीं थी या फिर जान न ही नहीं चाहती थी।

आज हमारी दोस्ती को पूरे तीन साल हो चुके थे। मुझे प्रमोशन मिल गया था। मैं चाहता था कि ये बात मैं अंकिता से मिलकर उसे बताऊँ कि वो मेरे लिए कितनी लक्की है। मैंने उसे फोन लगाया। लेकिन उसने उठाया नहीं। तभी मुझे याद आया कि आज तो उसका इंटरव्यू था। न जाने क्या हुआ होगा, मैं सोच ही रहा था की तभी फोन की रिंग बजी।

अंकिता का ही कॉल था।

"हैलो, अंकिता कहाँ हो तुम ? मुझे तुम्हें कुछ बताना है।"

"हाँ हम बस कॉलेज से निकल रहें हैं, दरसल हमें भी तुम्हे कुछ बताना है।"

"ठीक है पहले तुम बताओ"

"नहीं पहले तुम बताओ"

"पहले तुम"

"बोला न पहले तुम बताओ"

"अच्छा बाबा ठीक है, मैं बताता हूँ वैसे भी तुम लड़कियां किसी की मानती कहाँ हो ?"

"बिलकुल सही" उसने हंसते हुए कहा।

"मुझे, मुझे प्रमोशन मिल गया है अंकु, यू नो यू आर वैरी लक्की फॉर मी"

"वाओ....ये तो बहुत खुशी की बात है, मैं बहुत खुश हूँ तुम्हारे लिये, कांग्रचुलेशन।"

"थैंक यू थैंक यू, अच्छा अब तुम बताओ क्या गुड़ न्यूज़ है ?"

"पहली ये की हमारा रिज़ल्ट आ गया है और हम फर्स्ट आए हैं और दूसरी ये की हमारी जॉब लग गयी है, है ना खुशी की बात।"

"अरे वाह! ये तो बहुत ही अच्छी न्यूज़ सुनाई तुमने। वैसे मुझे तुमसे यही उम्मीद थी, आखिर स्टूडेंट किसकी हो ?" मैंने हँसकर कहा।

"जी सर" उसने बोला और हम दोनों हँसने लगे।

"अच्छा तुम्हें नहीं लगता कि ये टाइम हमे सेलेब्रेट करना चाहिए ?" मैंने कहा।

"बिल्कुल करना चाहिए, तो बताओ कहाँ चलना है ?"

"जहां तुम चाहो"

"तो ठीक है हम ठीक बीस मिनट बाद उसी कैफे में मिलते है जहाँ हम पहली बार कॉफी के लिए गए थे।"

"अच्छा आईडिया है, डन"

"ठीक है मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी" और फिर उसने फोन रख दिया।

मैं बहुत खुश था। माँ से एक घण्टे बाद आने का कह कर मैं घर से निकला ही था कि अचानक से बहुत तेज़ बरसात शुरू हो गई। एक बार तो मुझे ख्याल आया कि जाना मुश्किल है लेकिन अंकिता के बारे में सोचा कि वो इंतजार कर रही होगी। 

बरसात को देखकर मुझे उस दिन की याद आ गयी जब मैंने अंकिता को पहली बार ट्रैफिक सिग्नल पर देखा था। लेकिन मुझेक्या पता था कि आज की ये बरसात मेरी जिंदगी को एक नये और दर्द भरे मोड़ पर ला खड़ा करेगी।

मैंने तय कर लिया था कि आज मैं अंकिता से अपने दिल की सारी बात कह दूंगा, उसके बाद चाहे उसका जो भी फैसला हो। ये सब सोचते हुए मैं रास्ते में कुछ दस मिनट की दूरी पर ही गया था कि बरसात और तेज़ हो गयी इतनी की सामने रास्ते पर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। जगह जगह पानी भर गया था और रास्ते के गड्ढे भी नज़र नहीं आ रहे थे। मैं सम्भाल कर बाइक चला रहा था कि तभी अचानक एक बड़ा पत्थर मेरी बाइक के टायर के नीचे आया और मेरा बैलेंस बिगड़ गया और मेरी बाइक सामने से आती तेज़ गाड़ी से जा टकराई और मैं काफी देर तक घिसटते हुए बहुत दूर जा गिरा।

मैंने आंखे खोलने की कोशिश की लेकिन मेरी आँखो के सामने अंधेरा छा गया और मैं बेहोश हो गया।

जब मुझे होश आया तो मैं हॉस्पिटल में था। मैंने आँखे खोली तो सब धुंधला सा नज़र आ रहा था, मैं बोलना चाहता था लेकन कुछ बोल नहीं पा रहा था। तभी मैंने माँ के हाथ का स्पर्श अपने सिर पर महसूस किया।

"मयंक मेरे बच्चे, कैसा है तू ? तू ठीक तो है न ? ज्यादा दर्द तो नहीं हो रहा न ?"

"अरे तुम उसे अभी आराम करने दो, सवाल बाद में पूछ लेना" पापा की आवाज़ सुनाई दी। 

मैंने धीरे से कहा-"माँ मैं ठीक हूँ" और मैं फिर से बेहोश हो गया।

रात को मुझे पूरी तरह से होश आया। माँ, पापा मेरे पास बैठे थे, उन्हें देखकर मुझे ख़ुशी हुई।

लेकिन कोई और भी था जिसे मेरी आँखे तलाश रहीं थी, अंकिता। 

"अंकिता कहाँ है ? वो आई क्यों नहीं मुझसे मिलने ? क्या उसे किसी ने बताया नहीं मेरे बारे में ? और अगर बताया है तो वो यहां क्यों नहीं है ?" ऐसे कितने ही सवालों ने मुझे घेर लिया।

मैंने माँ से पूछा-"माँ अंकिता नहीं आई मुझसे मिलने ?"

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

मैंने फिर से वही प्रश्न दोहराया।

"देख मयंक, तू पिछले दो दिन से हॉस्पिटल में है और मैं नहीं चाहती की तुझे कोई और तकलीफ हो। मैं ही जानती हूँ की ये दो दिन कैसे गुजरे हैं हमारे लिए। इसलिए अब तू सिर्फ आराम करेगा और कोई फालतू का सवाल नहीं करेगा मुझ से, समझा"

"लेकिन माँ ये फालतू का सवाल नहीं है, अंकिता मेरी दोस्त है"

"मुझे कुछ नहीं सुन न और न तुझे कोई जवाब देना है, मैं डॉक्टर से पूछ कर आती हूँ की तुझे खाने में क्या देना है" इतना कह कर माँ चली गई।

मैंने पापा की तरफ देखा लेकिन उन्होंने भी नज़रे झुका ली। मुझे बहुत अजीब लगा।

"आखिर माँ, पापा ऐसे क्यों बर्ताव कर रहें हैं, ऐसा क्या हुआ है ? कुछ तो है जो ये लोग मुझसे छुपा रहे है और वो क्या है ये मुझे पता लगाना पड़ेगा"

अगले दो दिन तक मैंने माँ, पापा से कोई सवाल नहीं किया। हॉस्पिटल से डिस्चार्ज मिलने के बाद मैं घर आ गया। लेकिन एक ही सवाल मेरे मन को बार बार कचोट रहा था कि 5 दिन से अंकिता मुझसे मिलने क्यों नहीं आई और न ही उसकी फैमिली से कोई मुझे देखने आया। आखिर ऐसी क्या बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है ? 

मैं अपने कमरे में बैठा ये सब सोच ही रहा था कि तभी माँ अंदर आई-"मयंक मैं घर का कुछ सामान लेने मार्किट जा रही हूँ, तुम आराम करना और कहीं बाहर मत जाना। तुम्हें कुछ चाहिए ?"

"नहीं माँ"

"ठीक है" कहकर माँ चली गई।

मुझे लगा यही सही मौका है सच का पता लगाने का, कि आखिर बात क्या है ? पापा को ऑफिस से आने में अभी वक्त था और माँ एक-दो घंटे से पहले आएगी नहीं इसलिए मैं चुपचाप घर से बाहर निकला और सीधा अंकिता के घर का दरवाजा खटखटाया।

दरवाजा खोलते ही आंटी मुझे देख पहले हैरान हो गयी फिर खुशी से बोली-

"मयंक बेटा तुम, कब आए, तुम ठीक तो हो न ? बहुत खुशी हुई तुम्हें देख कर। भगवान का लाख लाख शुक्र है कि तुम अब बिल्कुल ठीक हो, आओ अंदर आओ न"

मैं अंदर चला गया। 

"तुम बैठो मैं तुम्हारे लिए कुछ लेकर आती हूँ"

न जाने मुझे उन्हें देख कर ऐसा लगा कि मेरे आने से पहले वें रो रही थी। जैसे उन्हें कोई दुख था लेकिन मेरे सामने वो उसे छुपाने की कोशिश रही थी।

"नहीं आंटी मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं बस यहाँ आपसे बात करने आया हूँ"

"कौनसी बात बेटा, और मुझे लगता है कि तुम्हें यहां इस तरह नहीं आना चाहिए था"

"क्यों आंटी क्यों नहीं आना चाहिए था ? मैं भी तो आपके बेटे जैसा हूँ न और यहाँ मैं कोई पहली बार नहीं आया हूँ तो अब ऐसा क्या बदल गया है कि आप मुझे ऐसा कह रहीं हैं। बताइए न आंटी।"

"देखो बेटा कुछ सवालों का कोई जवाब नहीं होता, बेहतर होगा की तुम यहाँ से चले जाओ। अगर तुम्हारी माँ को पता चला की तुम यहाँ हो तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा।"

"नहीं आंटी आज चाहे जो हो जाए मैं अपने सवालों के जवाब लिए बिना वापिस नहीं जाऊँगा और मुझे पता है कि मेरे सवालों के जवाब सिर्फ आप मुझे दे सकती हैं, इसलिए मैं आपसे हाथ जोड़ कर विनती करता हूँ प्लीज़ मुझे बताइए की क्या हुआ है ? अंकिता कहाँ है ? माँ और पापा आप लोगों के बारे में बात क्यों नहीं करना चाहते ? प्लीज़ बताइए मुझे"

आंटी की आँखों से आंसू बहने लगे। ऐसा लग हा था जैसे वो कोई बहुत बड़ा बोझ लिए बैठी हैं अपने दिल में, लेकिन क्या ? यही मुझे जानना था।

आंटी ने बताना शुरू किया.....

"उस शाम अंकिता कैफे में तुम्हारा इंतजार कर रही थी कि तभी उसके पास एक फोन आया। फोन करने वाले ने उसे बताया कि यहाँ कैफे से कुछ दूर एक लडके का एक्सीडेंट हो गया है और उसके फोन से उन्हें अंकिता का नम्बर मिला। ये सुनते ही अंकिता एकदम घबरा गई। वो फटाफट एक्सीडेंट वाली जगह पहुंची तो देखा तुम ज़ख्मी हालत में बेहोश पड़े हुए थे। उसकी आँखों से आंसू निकल पड़े। उसने जैसे तेसे एम्बुलेंस को फोन लगाया और तुम्हें हॉस्पिटल ले गई। हॉस्पिटल वालों ने मना किया की ये एक एक्सीडेंट केस है और पहले पुलिस में रिपोर्ट करवानी पड़ेगी लेकिन अंकिता की दोस्त के पिता जो की वहां डॉक्टर हैं उन्होंने अंकिता को देखा और सारी बात सुन ने के बाद उन्होंने तुम्हे एडमिट कर लिया। अंकिता ने तुम्हारे घर और हमारे पास फ़ोन किया और जल्दी हॉस्पिटल आने को कहा।"

"फिर क्या हुआ आंटी ?"

"वही, जो नहीं होना चाहिए था" उन्होंने अपने आंसू पोछतें हुए कहा।

"मतलब ?"

"जब हम लोग हॉस्पिटल पहुंचे तो अंकिता का रो रो कर बुरा हाल था। मुझे देखते ही वो मुझसे लिपट गई, बहुत सहम गई थी वो इस हादसे से। तुम्हारी माँ तुम्हे इस हालत में देखकर खुद को सम्भाल नहीं पा रही थी और फिर......"

"क्या आंटी ?"

"तुम्हारी माँ अंकिता पर बरस पड़ीं। उन्होंने कहा.....

"ये झूठे आंसू बहाना बंद करो तुम। मेरे बेटे की आज जो भी हालत है उसकी वजह सिर्फ और सिर्फ तुम हो अंकिता। मेरे बेटे ने तुम्हारे लिए क्या-क्या नहीं किया और बदले में उसे क्या मिला ? ये हादसा"

"आंटी ये आप क्या कह रही हैं ?" अंकिता बोली।

"मैं बिलकुल सही कह रही हूँ, न तुम उसे कैफे में बुलाती और न मेरा बेटा आज इस हालत में होता। ये सब तुम्हारे कारण हुआ है। अगर तुम मेरे बेटे की जिन्दगी में नहीं आती तो आज मेरा बेटा मेरे पास होता सही सलामत"

"उसके बाद तुम्हारी माँ बोलती रहीं और अंकिता सुनती रही। मैं चुप थी क्योंकि मैं एक माँ थी और तुम्हारी माँ का दर्द समझ सकती थी। तभी डॉक्टर ने आकर बताया कि तुम खतरे से बाहर हो, उन्होंने कहा कि तुम्हें अभी होश नहीं आया है लेकिन हम तुमसे थोड़ी देर में मिल सकते हैं। लेकिन तुम्हारी माँ को ये मंजूर नहीं था.....

"देखो अंकिता, मैं तुमसे विनती करती हूँ की अब तुम मेरे बेटे की जिंदगी से चली जाओ हमेशा हमेशा के लिए, उस से दूर हो जाओ। जो कुछ भी हुआ उसके बाद मैं नहीं चाहती कि तुम्हारा साया मेरे बेटे पर कभी पड़े, इसलिए बेहतर होगा कि तुम यहाँ से चली जाओ इस से पहले की मयंक को होश आए, चली जाओ।"


ये सब सुनकर अंकिता टूट गई। मैंने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन उसने किसी की न सुनी और रोते रोते वहां से घर चली आई। 

"अच्छा होगा आप लोग भी यहाँ से चलें जाएँ, मैं हूँ अपने बेटे का ध्यान रखने के लिए।"

हमने सोचा कुछ बोलने से बात बिगड़ सकती है इसलिए हम भी वहां से चुपचाप चले आए।"


मैं हैरान था, मुझे यकीन नहीं हो रहा था की माँ अंकिता से ऐसा बर्ताव कर सकती हैं।

"लेकिन अंकिता है कहाँ ? मैंने पूछा।


"पता नहीं....... जब हम लोग घर आए तो अंकिता अपने कमरे में थी, मैंने दरवाजा खटखटाया लेकिन उसने नहीं खोला। मुझे लगा की अभी उसे बहुत बुरा लगा है इसलिए अभी उस से बात करना ठीक नहीं होगा और कुछ दिनों में तुम्हारी माँ का गुस्सा भी उतर जाएगा। लेकिन......."

"लेकिन क्या ?"

"जब सुबह मैं उसके कमरे में गई तो दरवाजा खुला था लेकिन अंकिता कमरे में नहीं थी। मैंने उसे कमरे में ढूंढा लेकिन वो कहीं नहीं थी। सुबह से घर में भी उसे किसी ने नहीं देखा था। मैं घबरा गई लेकिन तभी मैने उसके तकिये के नीचे एक चिठ्ठी देखी"

"क्या लिखा था उसमें आंटी बताइए"

"तुम खुद ही देख लो" कहकर आंटी ने वो चिट्ठी लाकर मेरे हाथ में थमा दी।

मैंने पढना शुरू किया।


"माँ, जब तुम ये चिठ्ठी पढ़ोगी तब मैं तुम्हारे सामने नहीं होउंगी, इसलिए खुद को सम्भालना। कल रात आंटी ने जो कुछ भी हॉस्पिटल में कहा मैंने उस बारे में बहुत सोचा, और मुझे लगा की कहीं न कहीं उन्होंने जो भी कहा वो सच था। शायद कहीं न कहीं मयंक की इस हालत की जिम्मेदार मैं ही थी। और अब एक सच्चा दोस्त होने के नाते मैं नहीं चाहती की दोबारा उसकी जिंदगी में कुछ भी बुरा हो। अब वो तो जिद्दी है मानेगा नहीं, इसलिए मैं खुद ही उस से दूर जा रही हूँ। और मैं ऐसा इसलिए भी कर रहीं हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहती की मेरी वजह से आप लोगों को कुछ भी ऐसा वैसा सुन न पड़े। मुझे नहीं पता था की मुझे अपने दोस्त से इस तरह अलग होना पड़ेगा पर शायद किस्मत को यही मंजूर है और शायद इसी में सबकी भलाई है। मयंक को कुछ मत बताना और उसे कहना कि हो सके तो मुझे भूल जाए। और आप सब मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना। वादा करती हूं जहां भी रहूंगी अपना ख्याल रखूंगी।

आपकी बेटी।"


मेरी आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

मैंने सोचा भी न था कि नाज़ुक सी दिखने वाली लड़की कभी इतना बड़ा कदम भी उठा सकती है और वो भी मेरे लिए। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ ? अंकिता, मेरी अंकिता जिसे मैं कभी अपने से दूर नहीं करना चाहता था, वो मुझे छोड़कर जा चुकी थी। हम सबको छोड़कर जा चुकी थी।


"बेटा मैं तुम्हारी माँ से नाराज़ नहीं हूं और न ही उन्हें दोष देना चाहती हूं क्योंकि वो उस वक़्त अपने बेटे के लिए दुखी थी। लेकिन तुम ही बताओ जो कुछ भी हुआ उसमें मेरी बेटी का क्या कुसूर था ?"

इतना कहकर आंटी रो पड़ीं। मेरे पास भी उनकी बातों का कोई जवाब नहीं था।


"आंटी क्या उसके बाद अंकिता का कोई फोन कोई मैसेज आया ? उसकी कोई ख़बर ?"


"नहीं बेटा, कोई फोन नहीं आया, अंकिता के पापा भी सभी रिश्तेदारों और अंकिता के दोस्तों से पता कर चुके हैं लेकिन किसी को भी उसके बारे में कुछ नहीं पता। हमने पुलिस में भी रिपोर्ट लिखवाई है लेकिन उन्होंने कहा कि जब उन्हें कोई खबर मिलेगी तो वो हमें बता देंगे।"


"आप चिंता मत कीजिए, अंकिता मेरे लिये घर छोड़कर गई है तो अब उसे वापिस लाना मेरी जिम्मेदारी है। मैं आपसे वादा करता हूँ कि मैं आपकी बेटी को ढूंढकर जल्द ही आपके पास लेकर आउंगा।"

"लेकिन बेटा तुम्हारे मम्मी पापा...."

"आंटी आप उनकी चिंता मत कीजिए, अंकिता मेरी दोस्त है, मेरा भी कुछ फ़र्ज़ है उसके लिए इसलिये अब चाहे कुछ भी हो मैं उसे ढूंढकर ही रहूंगा।" इतना कह कर मैं वहाँ से चला आया।


जब घर आया तो माँ और पापा दोनों आ चुके थे।

"कहाँ था तू इतनी देर से ? मैंने मना किया था न घर से बाहर जाने के लिए, तुझे कुछ समझ में नहीं आता ? कोई फिक्र नहीं है इस लड़के को, न अपनी न हमारी।" मां शुरू हो गयी।

"माँ आपने अंकिता को मुझसे दूर जाने के लिए कहा था ?" मैंने पूछा।

"अच्छा तो तू उसके घर गया था। रहा नहीं गया न तुझसे ?"

"माँ आपने अंकिता को मुझसे दूर जाने के लिए कहा था या नहीं ?" मैंने गुस्से में चिल्लाकर पूछा।

मां चुप हो गई।

"जवाब दीजिये मुझे हाँ या नहीं ?"

"हाँ"

"क्यों मां क्यों किया आपने ऐसा ?"

"मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि उस लड़की का बुरा साया तुझ पर पड़े और तेरे साथ दोबारा कुछ भी बुरा हो।"

"क्या आपको जरा सा भी अंदाजा है की आपकी इस हरकत की वजह से उस पर क्या असर हुआ है ? वो घर छोडकर चली गई है और आपसे ये किसने कहा कि अंकिता मेरे लिए मुसीबत की वजह है ? कैसे सोच लिया आपने कि आप मुझे उस से अलग कर देंगी ?"

"मैं तुम्हारी माँ हूँ"

"और अंकिता मेरी दोस्त है और एक और बात आप लोग जान लीजिए, मैं अंकिता से प्यार करता हूँ और इसलिए मैं उसे हर हाल में ढूंढ कर लाऊंगा।"

माँ और पापा मेरे चेहरे की तरफ देख रहे थे। माँ ने कुछ कहना चाहा लेकिन मैं अनसुना कर अपने कमरे में चला गया।

पूरी रात यही उधेड़बुन दिमाग में चलती रही कि कैसे ढूँढू अंकिता को। 

सुबह पापा ने दरवाजा खटखटाया।

"आइये पापा"

"कैसे हो ?

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

"बेटा मैं जानता हूँ की जो कुछ भी हुआ सही नहीं हुआ और मैं ये भी मानता हूँ की जो कुछ भी तुम्हारी माँ ने किया वो गलत था। आज हमारी वजह से उस घर ने अपनी बेटी खोई है और मैं नहीं चाहता की इन सबका असर उस निर्दोष बच्ची की जिन्दगी पर पड़े। बेटा मैं उस वक्त तो तुम्हारी माँ से कुछ कह नहीं पाया क्योंकि वो दुखी थी लेकिन तुम पर मुझे पूरा विश्वास है की तुम अपनी दोस्त क साथ कुछ बुरा नहीं होने दोगे। इसलिए मैं चाहता हूँ की तुम अंकिता को वापिस लेकर आओ। तुम प्यार करते हो न अंकिता से तो अब समय है उस प्यार को साबित करने का और इन सब में मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

मैं आश्च्रर्य से पापा की तरफ देख देख रहा था।

"सच पापा, आप मेरा साथ देंगे ?"

"हाँ बेटा मैं तुम्हारे साथ हूँ और तुम अपनी माँ की चिंता मत करो उसे मैं सम्भाल लूँगा। बेटा सच्चा प्यार जिंदगी में बहुत मुश्किल से मिलता है और अगर वो तुम्हे मिल जाये तो उसे खोना नहीं चाहिए।"

मैं खुशी से पापा के गले लग गया। मुझे नहीं पता था कि पापा मुझे इतने अच्छे से समझते हैं।

बस तब से मैंने अंकिता की तलाश शुरू कर दी। देहरादून, नैनीताल जहाँ उसका ननिहाल था सब जगह पता किया। जहाँ जहाँ तक अंकिता के होने का अंदेशा था सब जगह ढूंढा। उसकी जॉब जिस कम्पनी में लगी थी उसमे भी कॉल किया लेकिन वहां इस नाम से कोई जॉइनिंग नहीहौहुई थी।

तकरीबन 6 महीने बीत चुके थे और इस बीच कई बरसातें चली गई थी उसे याद करते हुए लेकिन अंकिता का कहीं पता नहीं था। अब तो मेरी उम्मीद की लौ भी डगमगाने लगी थी लेकिन फिर भी मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी। आख़िरकार मैंने भगवान से प्रार्थना की कि अब वही मुझे कोई रास्ता दिखा सकता है।

एक दिन शाम को जब घर वापिस आया तो माँ ने मुझे एक लिफाफा थमाया। 

"क्या है इसमें ?"

"तेरे लिए कोई कोरिअर आया है, खोल के देख जरा क्या है ?"

"ठीक है"

मुझे लगा शायद अंकिता का कोई लैटर हो इसलिए मैं दौड़ कर कमरे में गया और लिफाफा खोला। लेकिन उसमें तो मुंबई में होने वाले किसी कथा सम्मेलन का इनविटेशन था। दरअसल अंकिता को कहानी लिखने का बहुत शौंक था और उसी के कहने पर मैंने ऐसे ही एक कहानी लिखकर भेजी थी। बस इसीलिए ये इनविटेशन आया था मुझे। मैंने लिफाफे को गुस्से में एक ओर फैंक दिया। 

लेकिन तभी एक ख्याल आया की अंकिता की सबसे पसंदीदा हॉबी लिखना थी इसलिए हो सकता है कि ये इवेंट ही मुझे उस तक पहुँचने का कोई रास्ता दिखा दे।

इवेंट 2 दिन बाद था। मैंने ऑफिस से कुछ दिन की छुट्टी ली और माँ से कहा की मुझे मुंबई ऑफिस के काम से जाना है कुछ दिनों के लिए। पापा ने मुझे हिम्मत दी और कहा-

"भगवान ने चाहा तो तुम अपनी मंजिल पाकर ही लौटोगे बेटा, हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है"

जाने से एक दिन पहले मैं अंकिता क घर गया। मैंने अंकिता के मम्मी पापा से कहा-

"मैं मुंबई जा रहा हूँ और मेरा आपसे वादा है कि इस बार या तो अंकिता को लेकर ही लौटूंगा या फिर कभी वापिस नहीं आऊंगा। बस आप लोग भगवान से प्रार्थना कीजियेगा"

उन लोगों से आशीर्वाद लेकर मैं घर आ गया और जाने की तैयारी करने लगा कि तभी माँ मेरे कमरे में आई।

"मयंक"

"जी माँ"

"बेटा मुझे एहसास हो चुका है की मैंने अंकिता और तेरे साथ सही नहीं किया। मैं तुम सब की गुनाहगार हूँ। मैंने उस दिन बेटे के प्यार में अंधे होकर न जाने उस बच्ची से क्या-क्या कह दिया जबकि उस बेचारी का तो इन सब में कोई कुसूर ही नहीं था। बेटा हो सके तो मुझे माफ़ कर देना। और मैं जानती हूँ की इस वक्त भी तू मुंबई अंकिता को ढूंढने जा रहा है लेकिन इस बार मैं तुझे रोकूंगी नहीं, बल्कि मैं भगवान् से दुआ करूंगी कि तू अंकिता को लेकर जल्दी लौटे। मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।"

इतना कहकर माँ रो पड़ी। मैंने उन्हें गले से लगा लिया।

अगली सुबह मैं मुंबई के लिए निकल पड़ा। रास्ते भर अंकिता के बारे में ही सोचता रहा। मुंबई पहुंचकर मैंने होटल बुक किया और इवेंट के वेन्यु का पता किया। इवेंट कल सुबह 10 बजे शुरू होना था।

मैं ठीक 9:30 बजे इवेंट की जगह पर पहुँच गया। न जाने मेरे मन में आज एक अजीब सा एहसास था, वो एहसास जो तब होता था जब अंकिता मेरे आस-पास होती थी।

थोड़ी देर में इवेंट शुरू हो गया। एक के बाद एक मशहूर लेखक आए और अपने विचार प्रकट किए। मैं पहली बार इस तरह का कोई सम्मेलन अटेंड कर रहा था लेकिन सच कहूँ तो मुझे अच्छा भी लग रहा था। लेकिन मेरी नज़रे एक ही इन्सान को ढूंढ रही थी। तभी अचानक माँ का फोन आया और मैं उठकर बाहर आ गया।

मैं माँ से बात कर ही रहा था की अचानक तभी साल के सर्वश्रेष्ट लेखक के पुरुस्कार की घोषणा हुई-

"और ये पुरुस्कार दिया जाता है मिस अंकिता सिंह को"

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। मैंने दोबारा ध्यान से सुना।

"जी हाँ वही अंकिता सिंह जिन्होंने पिछले कुछ दिनों में ही अपनी कहानियों और लेखों से इस शहर में अपनी एक पहचान बनाई है।"

मुझे लगा की मैं ख़ुशी से पागल हो जाऊंगा। मैंने मन ही मन भगवान का धन्यवाद किया और अंदर की तरफ दौड़ा।

सामने स्टेज पर अवार्ड लेते हुए अंकिता नजर आई। उसे इतने दिनों बाद अपनी आँखों से देखकर मुझसे रहा नहीं गया। मेरी आँखे नम हो गई। बस अब तो इंतजार था कि ये फंक्शन खत्म हो और मैं अंकिता से मिलूं।

करीब एक घंटे बाद इवेंट खत्म हो गया।

लोगो की भीड़ में मैं अंकिता को तलाश रहा था। तभी वो मुझे दिखाई दी लेकिन वो बहुत सारे लोगों और पत्रकारों से घिरी हुई थी। मुझे उसे इस वक्त बुलाना सही नहीं लगा। कम से कम वो अपनी ख़ुशी को सही ढंग से बाँट लें। मैं उसके फ्री होने का इंतजार करने लगा।

थोड़ी देर में अंकिता मेरे पास से गुजरी। मैंने उसे आवाज़ दी लेकिन शोर बहुत ज्यादा था इसलिए वो सुन नहीं पाई और सीधा जाकर कार में बैठ गई। मैं उसके पीछे पीछे भागा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

मैं चुपचाप उसे जाते हुए देखता रहा। मुझे लगा की मेरी मंजिल एक बार फिर मेरे हाथों में आकर फिसल गई।

लेकिन तभी मैंने एक व्यक्ति को फोन पर अंकिता के बारे में बात करते हुए सुना। मैं जल्दी से उसके पास गया और पूछा-"सुनिए, क्या आप अंकिता को जानते हैं ? वहीं जिन्हें अभी अभी बेस्ट राइटर का अवार्ड मिला है"

"अरे उन्हें कौन नहीं जनता। बहुत मशहूर हो चुकी हैं कुछ ही वक्त में। बहुत अच्छी लेखिका हैं।"

"क्या आप मुझे उनका पता या फोन नम्बर दे सकते हैं ? देखिये प्लीज़ मेरा उनसे मिलना बहुत जरूरी है।"

"देखिये मैं उनका नम्बर तो नहीं जानता हूँ बस इतना जानता हूँ की वो अंधेरी में रहती हैं। हाँ लेकिन मैं आपको उनकी असिस्टेंट का नम्बर दे सकता हूँ, नोट कीजिए।"

"धन्यवाद भाई साहब"

एक बार फिर से दुनिया का सबसे बड़ा खजाना मेरे हाथ लग चुका था।

मैंने उसकी असिस्टेंट से बात कर अगले दिन की अपॉइंटमेंट ले ली।

ठीक 9 बजे मैं अंकिता के फ्लैट के सामने था। मैंने दरवाजा खटखटाया तो एक नौकर ने खोला।

"मिस लिली से कहिये की मिस्टर मयंक आए हैं"

"जी सर आप बेठिये, मैं अभी मैम को बुलाता हूँ"

मैंने चारों तरफ़ नजर दौड़ाई। फ्लैट काफी अच्छा था दीवारों पर अंकिता की बहुत सी तस्वीरें लगी हुई थी। कुछ फैन्स के साथ, कुछ अवार्ड्स लेते हुए। लेकिन एक शख्स पर मेरा ध्यान गया जिनके साथ अंकिता की बहुत सी तस्वीरें थी। उम्र यही कोई 50-55 के आस पास होगी। मैं सब देख ही रहा था की तभी वही शख्स मुझे मेरी तरफ आते दिखाई दिए व्हीलचेयर पर। मैंने उन्हें अभिवादन किया, उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया।

"तो तुम हो मयंक, लिली ने मुझे बताया की तुम्हें अंकिता से मिलना है लेकिन तुम तो मुंबई से नहीं हो और न ही मैंने पहले तुम्हें कहीं देखा है तो तुम अंकिता को कैसे जानते हो ? क्यों मिलना चाहते हो उस से ?"

"सर, मैं अंकिता का दोस्त हूँ दिल्ली से। सर मुझे नहीं पता की अंकिता यहाँ क्यों है, लेकिन सर मैं अंकिता को घर वापिस ले जाने आया हूँ, उसके माता-पिता के पास।"

"तो तुम चाहते हो की मैं अंकिता को तुम्हारे साथ भेज दूँ लेकिन अंकिता ने तो कभी तुम्हारे बारे में कुछ बताया नहीं। और सिर्फ तुम्हारे कहने से मैं ये कैसे यकीन कर लूँ की तुम अंकिता को वाकई उसके घर ले जाने आए हो ?"

"सर आपको यकीन करना होगा क्योंकि मैं अंकिता से प्यार करता हूँ और बहुत कोशिश के बाद मैं यहाँ अंकिता तक पहुँच पाया हूँ, प्लीज़ सर मुझे अंकिता से मिलने दीजिये"

और फिर मैंने अंकिता और अपने मिलसे से लेकर अंकिता को तलाश करने तक की सारी कहानी उन्हें बता दी।

"सर आप एक बार अंकिता को बुलाइए, देखिएगा वो खुद अपन मुँह से मेरा नाम लेगी"

"वो तुम्हारा नाम नहीं लेगी, क्योंकि अंकिता बोल नहीं सकती"

"क्या...... ये आप क्या कह रहें हैं ?"

"हाँ ये सच है, अंकिता अपनी आवाज़ खो चुकी है"

"पर कैसे ?"

"आज से 6 महीने पहले एक शाम को मैं अपने दोस्त के यहाँ से लौट रहा था की तभी मैंने सड़क पर भीड़ देखी। मैंने ड्राईवर से देखने को कहा कि आखिर बात क्या है ? उसने मुझे आकर बताया की एक लड़की जख्मी हालत में पड़ी है जिसका किसी कार से एक्सीडेंट हो गया है लेकिन पुलिस केस के डर से कोई भी उसे हॉस्पिटल ले जाने को तैयार नहीं है। मैंने ड्राइवर से उसे लोगों की मदद से कार में बैठाने को कहा और उसे सीधा हॉस्पिटल ले गया। वहां 2 दिन उसका इलाज चला और फिर डॉक्टर ने आकर बताया की वो कोमा में जा चुकी है। ये सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। उसके सामान से मुझे पता चला की उसका नाम अंकिता है और वो दिल्ली की रहने वाली है। उसके पास एक कम्पनी का जॉइनिंग लैटर भी था। मैं हताश होकर घर लौट आया।

मैं उसे अक्सर देखने जाया करता था और भगवान से यही दुआ करता था की इस बच्ची को जिंदगी बख्श दे। 

मुझे उसे देख कर अपनी बेटी की याद आती थी। क्योंकि आज से पांच साल पहले एक रोड एक्सीडेंट में मैं अपनी बीवी, बेटी और अपने पैरों को खो चुका था। उसके बाद 2 महीने बाद मुझे डॉक्टर का फोन आया कि अंकिता को होश आ चुका है। मैं बहुत खुश था लेकिन जब मैं हॉस्पिटल पहुंचा तो डॉक्टर ने मुझे बताया की अंकिता अपनी आवाज़ खो चुकी है। मुझे इस से धक्का पहुंचा लेकिन मैंने तय किया की मैं किसी भी कीमत पर अंकिता को कमज़ोर नही पड़ने दूंगा। मैं उसे घर ले आया और अपनी बेटी की जगह उसे दे दी या फिर कहूँ तो उसके आने से मुझमे जीने की उम्मीद दोबारा जाग उठ थी। कुछ दिन अंकिता सदमे में रही लेकिन मैंने उसे हौंसला दिया और उसे फिर से खुद के लिए जीने को कहा। उसे लिखना पसंद था इसलिए मैंने उसे लिखने के लिए प्रेरित किया और आज वो अपनी मेहनत से बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर चुकी है।"

"लेकिन कल इंटरव्यू के टाइम....."

"वो अंकिता की असिस्टेंट लिली है जो हर मौके पर अंकिता के साथ होती है और उसकी तरफ से हर बात समझ कर लोगों से साझा करती है। मैंने अंकिता के न बोलने को कभी उसकी कमज़ोरी नहीं बन ने दिया और आज अंकिता भी आत्मविश्वास के साथ हर चीज़ का सामना करती है"

"थैंक यू सर कि आपने मेरी अंकिता का इतने अच्छे से ध्यान रखा, आपका ये एहसान मैं जिन्दगी भर नहीं भूल पाउँगा"

"तुम्हारी नहीं अब वो मेरी अंकिता है, मेरी बेटी" उन्होंने सख्ती से कहा।

"लेकिन अगर तुम्हारे जैसा राजकुमार मेरी बेटी को मिले तो मुझे कोई हर्ज़ नहीं" और फिर वो हंसने लगे।

"लेकिन मुझे पहले अंकिता से बात करनी होगी क्योंकि उसका फैसला जो भी होगा मैं वही मानूंगा"

"जी सर जैसा आपको ठीक लगे, मैं इंतजार करूंगा आपके और अंकिता के फैसले का" मुझे यकीन था कि अंकिता कभी न नहीं करेगी।

मैं वहां से ख़ुशी ख़ुशी लौट आया मुझे अगले दिन मेरी मंजिल मेरी अंकिता मुझे मिलने वाली थी।

अगली सुबह मैं फिर से अंकिता के फ्लैट में था। इस बार मैं खुश था।

तभी मिस्टर रमाकांत घोष मुझसे मिलने आए।

"हेल्लो सर, आपने अंकिता से बात की ? क्या कहा उसने ?"

वो खामोश रहे।

"बताइए सर क्या कहा अंकिता ने ?"

"देखो मयंक मैं जनता हूँ की तुम सच्चे हो लेकिन मैं अंकिता की मर्ज़ी के खिलाफ़ कुछ नहीं कर सकता। अंकिता ने तुम्हें पहचानने से इंकार कर दिया है, उसने कहा की वो तुम्हें नहीं जानती और तुम्हें यहाँ से चले जाने को कहा है।"

"लेकिन सर वो ऐसा कैसा कर सकती है ? मैं ऐसे कैसे जा सकता हूँ, मैं अंकिता से प्यार करता हूँ उसके बिना नहीं जी सकता और आप कह रहे हैं कि मैं चला जाऊं"

"तुम्हें जाने के लिए अंकिता ने कहा है, मैंने नहीं"

"मतलब ?"

"मतलब ये की अगर तुम अंकिता को पाना चाहते हो तो तुम्हें उस से मिलना होगा। उसे अपने प्यार का एहसास कराना होगा। लेकिन वो तुमसे मिलने कभी नहीं आएगी इसलिए तुम्हें जो भी करना होगा उसे बिना बताये करना होगा"

"जी समझ गया" मैं खुश था और उदास भी, मेरी किस्मत आज मुझे मेरी मंजिल के पास ले आई थी और मेरी मंजिल मेरे सामने होते हुए भी मुझसे मुहँ मोड़कर खड़ी थी।

मैंने मिस लिली से कहा की कि वो कल शाम अंकिता को किसी भी बहाने से कैफे में ले आए। अब बस मुझे अंकिता को किसी भी तरह मनाना था। सारी रात सोचते-सोचते निकल गई। अगली शाम जब मैं कैफे पहुंचा तो मिस लिली मुझे बाहर ही मिल गईं।

"मैंने मैम को अंदर बैठा दिया है ये कहकर की कोई प्रोडूसर अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट के सिलसिले में उनसे मिलना चाहते हैं। अब आगे का काम आपको करना है, ऑल द बेस्ट।"

"लेकिन आप तो हमेशा उनकी जगह बोलती हैं तो उन्हें शक नहीं हुआ ?"

"मैंने कहा की वो इशारों की भाषा समझते हैं। और प्यार की भाषा तो सबसे अलग है, है न ?"

मैंने उन्हें थैंक्स कहा और अंदर चला गया। अंदर अंकिता अकेली बैठी थी, उसके सामने जाने में डर भी लग रहा था आखिर उसके साथ जो कुछ भी हुआ उसका जिम्मेदार मैं ही तो था।

"हाय अंकिता" मैंने उसके पास जाकर कहा।

उसने मुडकर देखा और हैरान हो गई। लेकिन तभी वो उठकर जाने लगी, मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

"अंकिता प्लीज़ मेरी बात सुनो, प्लीज़ एक बार हमारी दोस्ती की खातिर। तुम्हें नहीं पता है की तुम्हारे बिना हम सबका क्या हाल है ? मैं, तुम्हारे मम्मी पापा सब तुम्हें पागलों की तरह ढूंढ रहे थे। मैं जानता हूँ कि जो कुछ भी उस रात हुआ वो नहीं होना चाहिए था और उसके लिए मैं तुमसे हजार बार माफ़ी मांगता हूँ। माँ को भी अपनी गलती का एहसास हो चुका है और उनकी तरफ़ से मैं तुमसे माफ़ी मांगता हूँ प्लीज़ हम सबको माफ़ कर दो और घर चलो"

उसन गुस्से में बैग से एक पेपर निकाला और उसपर कुछ लिखने लगी फिर उसने वो मुझे पकड़ा दिया। उसपर लिखा था-"मैं यहाँ से कहीं नहीं जाना चाहती और तुम मुझे फ़ोर्स नहीं कर सकते, अच्छा होगा कि तुम यहाँ से वापिस चले जाओ"

"नहीं जा सकता मैं वापिस क्योंकि मैं तुम्हारे घरवालों से वादा कर के आया हूँ की या तो तुम्हें साथ लेकर जाऊंगा या कभी वापिस नहीं जाऊंगा। और एक और बात मैं तुमसे कहना चाहता हूँ, वो ये की मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, बहुत ज्यादा प्यार करता हूँ इसलिए या तो तुम्हें साथ लेकर जाऊंगा वरना यहीं अपनी जान दे दूंगा।"

अंकिता मुझे हैरानी से सुन रही रही और मैं बोले जा रहा था। बाहर बरसात शुरू हो चुकी थी।

मैं गुस्से मैं बोलते-बोलते कैफे से बाहर निकल गया-" तुम्हें यकीन नहीं आता न मेरी बात का लेकिन एक बात समझ लो अच्छी तरह से अगर मैं जीऊंगा तो सिर्फ तुम्हारे साथ वरना मुझे ये जिंदगी मंजूर नहीं है। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता और अगर तुम्हें मेरी जरूरत नहीं है तो मुझे भी इस जिन्दगी की जरूरत नहीं है। अब मेरी जिंदगी और मौत दोनों तुम्हारे हाथों में है।"

मुझे पता ही नहीं चला की कब मैं सड़क के बीच में आ गया। तभी मेरी और एक गाडी आती देख अंकिता चिल्लाई-"मयंक बचो"

मैंने जब देख तो गाड़ी मेरे सामने थी मैं एक पल के लिए सहम गया की तभी अंकिता ने मुझे धक्का दिया और हम सड़क के एक किनारे जा गिरे। अंकिता ने उठाकर मुझे गले से लगा लिया और कहा-"एक बार तुम्हें खो चुकी हूँ दोबारा नही खो सकती"

"मैं कभी ऐसा होने भी नहीं दूंगा, और देखो मेरी जान बचाने के चक्कर में तुम्हारी आवाज़ भी वापिस आ गई, है न फायदे की बात ?" मैंने हंसते हुए कहा।

"नालायक तुम्हें मज़ाक सूझ रहा है, क्या जरूरत थी तुम्हें ऐसे बीच सड़क पर आने की अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो..." उसने गुस्से में कहा।

"अरे कुछ हुआ तो नहीं है न बल्कि मेरी मंजिल यानि कि तुम मुझे मिल गई। अब बताओ कभी मुझे छोडकर जाओगी ?" मैंने बनावटी गुस्से में कहा।

"कभी नहीं"उसने मुस्कुराते हुए बोला और मैंने उसे गले से लगा लिया और देर तक हम बरसात में भीगते रहे।

जो बरसात हम दोनों को एक दुसरे की जिन्दगी में लेकर आई......जिस बरसात ने हमें एक दुसरे से अलग किया....आज उसी बरसात ने हमे फिर से एक कर दिया.........सच में मेरी जिंदगी की सबसे खुशनुमा बरसात थी वो बरसात।


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