Vibhor Gupta

Inspirational


4.5  

Vibhor Gupta

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वो बिस्किट का पैकेट

वो बिस्किट का पैकेट

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गाँव के लोगों का दिल शायद कुछ ज़्यादा ही बड़ा होता है, गरीबी बस उनकी जेबों में होती है जज़्बातों में नहीं। अक्सर मैं ऐसी बातें किताबों में पढ़ता रहता था, लेकिन उस दिन इस बात को जी लिया था मैंने। ये बात उस दौर की है जब मैं आगे की पढ़ाई करने नए शहर आया था, और मैं यहां अकेला ऐसा नहीं था ना जाने कितने ही मेरे जैसे बच्चे अपना घर छोड़कर यहां आए थे।

ख़ैर मैंने जिस कॉलेज में एडमिशन लिया वहाँ के टीचर्स की पढ़ाई मुझे कुछ ख़ास समझ नहीं आ रही थी, इसलिए अपने हास्टल से कुछ दूर पर मैंने एक कोचिंग जॉइन कर ली। ठीक शाम 5 बजे वहां सर आ जाते थे और 6:30 होते-होते हम सबकी छुट्टी हो जाया करती थी। अब मैं हॉस्टलर था तो मुझे ये पता लगाने में बिल्कुल दिक्कत नहीं हुई कि वहाँ कौन कौन सी और कितनी लडकियाँ पढ़ती हैं और वैसे भी हास्टल के लड़कों को मैथ्स के फॉर्मूले याद हों चाहे ना हों, लेकिन ये जरुर याद रहता था कि आज उनकी वाली कौन से रंग का टॉप पहन कर आयी थी।

आज़ कोचिंग का मेरा पहला दिन था और मैंने वो लाइन पढ़ रखी थी, first impression is the last impression, इसलिए जाने से पहले दो बार फेशवाश किया, ज़्यादा अन्तर तो आया नहीं पर मन को तसल्ली हो गई, फिर वो सफ़ेद वाली अपनी पसंदीदा शर्ट पहनी और चल दिया। वहाँ पहुंचा तो अभी सर नहीं आए थे, क्लास में आगे की बेंच पर लड़कियां थीं और पीछे के बेंच पर लड़के। मैं भी क्लास की पीछे वाली बेंच पर जा कर बैठ गया और चारों तरफ़ नज़रें घुमाने लगा।

अब इसे आप मेरा बचपना कहिये या फ़िर इंसानी फ़ितरत, मतलब किसी को देखते ही उसके चेहरे और कपड़ों से उसे judge कर देना, मैं भी वहाँ बैठकर यहीं कर रहा था। जिसके बाल सुलझे हुए, चेहरा साफ़ वो अच्छी लड़की और जिसके कपड़े गंदे वो गंदी लड़की। इतने में सर आ गए तो मैंने भी अपना ध्यान पढ़ाई पर कर लिया। ऐसे धीरे-धीरे लगभग एक महीना बीत गया था और अब तक तो मैंने उस पीछे वाली सीट पर अपना नाम भी चार बार लिख दिया था। बस कोचिंग में हीरो वाली एंट्री लेना और सबसे पीछे वाली सीट पर बैठ जाना, भले ही आगे की सीटें खाली हों लेकिन अब इस बात से किसे फर्क़ पड़ता था, उसके बाद वहीं अपना रोज़ का काम लड़कियों की शक़्ल देखकर उन्हें अच्छी-बुरी की category में divide करना।

उनमें से एक लड़की थी, सांवली शक्ल, घुंघराले उलझे हुए बाल, थोड़े मैले से कपड़े, उसे कोई भी देखता तो सबको यहीं लगता कि वो किसी गरीब घर से है। लेकिन मुझे इन सब से क्या ही लेना देना था, देखते-देखते आधा साल हो गया, फ़िर एक शाम मैं कोचिंग छूटने के बाद पास वाली दुकान पर गया और अपने लिए दो बिस्किट के पैकेट ले लिए, उसी बीच उस लड़की ने भी वहाँ आकर एक बिस्किट का पैकेट ले लिया। हम दोनों लगभग एक साथ दुकान से बाहर निकले ही थे कि इतने में एक छोटा सा लड़का फटे कपड़ों में वहां आया और मेरी ओर अपने हाथ फैलाते हुए कुछ मांगने लगा। मैंने भी मन में सोचा अरे ये सब ड्रामा है, और उसे आगे बढ़ जाने को बोल दिया। इसके बाद वो उसी लड़की के पास गया, पहले तो उस लड़की ने उस बच्चे की शक्ल देखी और फ़िर थोड़ी देर के लिए अपने बिस्किट के पैकेट को घूरकर देखती रही, इतने में उस बच्चे ने फिर से हाथ बढ़ाया तो उस लड़की ने उसे वो पैकेट दे दिया।

एक पल को तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ, मतलब यार उस लड़की के चेहरे को देखकर साफ़ पता चल रहा था कि वो बिस्किट उसके लिए बहुत जरूरी था, ये सब देखकर मुझे अपने ऊपर थोड़ी शर्म आयी लेकिन फिर सोचा अरे! छोङो और मैं वहाँ से चल दिया। इत्तेफ़ाक से मेरा और उस लड़की का रास्ता एक ही था, तो हम दोनों लगभग दस कदम ही आगे बढ़े होंगे कि इतने में उस नन्हें लड़के ने वो बिस्किट का पैकेट उस लड़की को फेंक कर मार दिया और फिर कुछ बुदबुदाते हुए रोने लगा। ये देखकर वहाँ खड़े हर इंसान के चेहरे पर एक ही भाव था - अच्छाई का तो ज़माना ही नहीं है, पर उस लड़की का चेहरा उदासीन था। फ़िर वो लड़की पैकेट उठाकर उस बच्चे के पास चली गई। अब मैं ना तो उस लड़की का दोस्त था और ना ही इतना सामाजिक कि वहां खड़े होकर आगे का किस्सा देखूँ, इसलिए मैं मुड़ा और सीधे अपने हास्टल आ गया।

लेकिन वो होता है ना कि कुछ बातें और कुछ इंसान हम चाह कर भी नहीं भुला सकते हैं। मैं भी उस रात बिस्तर पर लेटा सोंचता रहा, यार उस लड़की ने वो बिस्किट का पैकट क्यूँ दिया और फिर वो बेवकूफ़ लड़का, मतलब कोई ऐसे भी करता है क्या..... ये सब सोंचते-सोंचते ना जाने कब आँख लग गई। अगले तीन दिन कोचिंग बंद थी क्यूंकि सर कहीं शहर के बाहर गए हुए थे। फ़िर तीन दिन बाद जब मैं कोचिंग गया तो वहीं अपना पुराना अंदाज़, आखिरी सीट और फ़िर सबको देखना। ऐसे दो-तीन दिन बीत गये, फिर एक दिन मैंने ध्यान दिया तो वो लड़की नहीं दिख रही थी, शायद वो उस दिन के बाद से कोचिंग नहीं आयी थी। पहले तो मेरे मन में कई सवाल आए लेकिन समय के साथ और दुनियादारी में पड़ कर मैं सब भूल गया ।

फ़िर एक दिन कोचिंग से निकलते वक्त वो मुझे दिख गई, मैं बिना देर किए हुए उसके पास गया और झट से बोला Hii, उसने पलट कर मेरा चेहरा देखा, फ़िर एक झर्राटे में बोली Do we know each other, मतलब यार हास्टल में तो बस गालियाँ ही सुनते थे वो भी अवधी या भोजपुरी में, लेकिन जिस flowमें उसने ज़वाब दिया मैं एक मिनट तक बिल्कुल शांत रह गया, फ़िर धीरे से बोला नहीं जानते तो नहीं हैं, पर आप वहीं हो ना जो शाम 5 बजे वाली मैथ्स की कोचिंग में आती थीं। वो बोली हाँ तो मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा, मैं vibhor वहीं पढ़ता था, ये सुनकर उसने भी अपने अंदाज में हाथ बढ़कर कहा, मैं anupma, उसके इतना कहते ही मैं धीरे से हंस पड़ा तो एक बार फ़िर से वो झर्राटे वाली इंग्लिश में बोली was it funny? अब तक मैं उसके बोलने के अंदाज़ से जान गया था दिखने में चाहे कैसी भी हो, उसकी इंग्लिश बहुत अच्छी है। इस बार मैं भी confidence के साथ बोला, नहीं funny तो नहीं था लेकिन तुम ऐसे बोलीं जैसे शहंशाह मूवी में बच्चन जी बोलते हैं मैं शहंशाह और इतना सुनकर वो खिलखिला कर हंस उठी।

फ़िर उसने वो सवाल पूछा जो शायद मेरे जैसे स्टूडेंट के लिए किसी बहुत बड़े दुःख से कम नहीं था। वो बोली और तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही?, अब अगर पड़ोसियों और परिवारवालों को छोड़ दिया जाये तो कौन ही ये गन्दा सवाल पूछता है। ख़ैर अब उसने पूछ लिया था तो मैंने भी मुह लटकाकर ज़वाब दे दिया ठीक-ठाक। इसके बाद वो पढ़ाई से जुड़ी कोई बात पूछती इससे पहले ही मैंने उससे पूछ लिया अब तुम कोचिंग क्यूँ नहीं आती हो, थोड़ी देर वो शांत रही और फ़िर बोली कि अब मैं छोटे बच्चों को पढ़ाती हूं, अभी वहीं से आ रही हूँ।

मुझे लगा शायद पैसों की जरुरत के चलते ट्यूशन पढ़ाने लगी होगी, इतने में ही छोटे बच्चों के एक झुंड ने आकर उसे घेर लिया, वो सब एक साथ बोले कल आओगी ना दीदी? उसने हाँ बोलते हुए उन बच्चों के सिर सहला दिए और फ़िर bye का इशारा करते हुए सबको अपने घर जाने को बोल दिया। एक बार फ़िर वो सब एक साथ एक स्वर में बोले bye-bye दीदी, और ये सुनकर वो मुस्कराते हुए चलने लगी। इस सब के दौरान मेरी नज़रें बस भीड़ के एक ही चेहरे पर टिकी हुई थीं, ये शायद वहीं बिस्किट वाला लड़का था। हम जब थोड़ा आगे बढ़े तो मैंने उससे पूछ ही लिया, ये वहीं लड़का था ना.... मेरे इतना कहने से वो समझ गयी और बोली हाँ ये वहीं था।

फ़िर मैंने उससे पूछ ही लिया ये सब कैसे, तो वो बोली उस दिन मैं वो बिस्किट लेकर उसके पास गईं और उससे पूछा क्या हुआ, तो वो रोते हुए बोला मुझे ये सब नहीं बस पैसे चाहिए तो मैंने उससे पूछा और पैसे क्यूँ चाहिए तुम्हें तो वो बोला मेरी माँ नहीं है और मेरा बाप हर रोज़ शराब में पैसे उड़ा आता है, मेरी एक छोटी बहन भी है, हम पढ़ना चाहते हैं इतना कहकर वो और रोने लगा। मैंने उसके आँसू पोंछे और कहा कि तुम प्राथमिक स्कूल क्यूँ नहीं जाते, इस बार वो एकदम साफ़ आवाज़ में बोला दीदी मैं वहां गया था पर वहाँ के अध्यापक कुछ पढ़ाते नहीं हैं, वहाँ सब एक दूसरे से लड़ते रहते। ये बात सुनकर पहले तो मैं परेशान हो गईं लेकिन फ़िर थोड़ा ठहरने के बाद उससे पूछा मैं पढ़ाऊंगी तो पढ़ोगे, वो झट से बोला हाँ दीदी क्यूँ नहीं और बस उसके बाद से मैं इन सबको पढ़ाने लगीं।

तो तुम किसी और टाईम भी पढ़ा सकती थीं कोचिंग क्यूँ छोड़ दी, मैं एकाएक बोला। वो हल्का सा मुस्करा के बोली, तुम बहुत सवाल करते हो, हाँ ऐसा हो सकता था, लेकिन इन बच्चों के पास पढ़ने के लिए किताबें कॉपियां नहीं थी और इसके लिए जो पैसे आते थे वो मेरी कोचिंग फीस ही थी। तो मैंने कहा तुम्हारी पढ़ाई? वो एक बार फिर से झर्राटे से बोली Do you think I need coaching classes? After all i am a brilliant student. इतना बोलकर वो हल्का सा मुस्करा दी। और तब तक उसके घर वाली गली भी आ गई थी, वो जाते- जाते बोली अगर कभी मेरे घर आना तो please कहना कि मैं रोज़ कोचिंग आती हूँ , वैसे अब तो तुम समझ गए होगे ना कि मैंने पढ़ाने के लिए वहीं टाईम क्यूँ चुना, इतना कहते-कहते वो उस गली में कहीं ग़ायब हो गई।

उस दिन लाइफ में दो बातें क्लियर हो गई थीं, पहली तो ये कि अपना दिल हमेशा अपनी जेब से बड़ा रखो और दूसरी ये, you are never wrong to do the right things, मतलब अगर आपके इरादे नेक हैं तो कभी कभी गलत रास्ते भी मंज़िल तक पहुँचा देते हैं। शायद पहली बार मेरी खुशियाँ, होठों की बजाय आँखों से आ रहीं थीं। मैं खुश तो बहुत था इंसानियत का ये चेहरा देखकर लेकिन उन्हीं पलों में रो भी रहा था अपने अंदर के इंसान को मरता देख कर....

जिंदगी में vibhor चाहे कोई भी मुक़ाम पा जाना

तुम कुछ बनना या नहीं बनना, बस एक अच्छे इंसान बन जाना। 


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