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वड़वानल – 62

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जहाज़ों पर गहमागहमी बढ़ गई थी। सभी जहाज़ किसी भी क्षण बाहर निकलने की और तोपें दागने की तैयारी कर रहे थे। बॉयलर फ्लैशअप किए जा रहे थे, चिमनियाँ काला धुआँ फेंक रही थीं। फॉक्सल और क्वार्टर डेक की ऑनिंग निकाली जा रही थी, तोपों से आवरण हटाकर उनकी क्षमता जाँची जा रही थी। कब क्या होगा यह कोई भी नहीं बता सकता था और इसीलिए हर जहाज़ हर प्रसंग का सामना करने की तैयारी कर रहा था।

सैम्युअल ने एक प्लैटून कमाण्डर को डॉकयार्ड से ‘कैसल बैरेक्स’ पर हमला करने की योजना समझाई।

‘‘पाँच–पाँच सैनिकों के दो गुट होंगे। गुट के हर सैनिक के पास L.M.G. होगी। एक गुट डॉकयार्ड में प्रवेश करके दीवार के किनारे–किनारे, पेड़ों की ओट लेते हुए आगे बढ़ेगा। दूसरा गुट निगरानी करते हुए पीछे ही रुका रहेगा। यदि जहाज़ हमला करने की कोशिश करेंगे तो यह गुट उन्हें व्यस्त रखेगा और पहले गुट को आगे जाने देगा। यह पहला गुट ‘कैसल बैरेक्स’ और डॉकयार्ड की दीवार के पास पहुँचते ही बैरेक्स के सैनिकों पर ज़बर्दस्त हमला बोलेगा। यह अटैक suicide attack हो सकता है।’’

''Yeah, yeah, sir.'' प्लैटून कमाण्डर ने ऑर्डर समझ ली और उसे अमल में लाने के लिए चल पड़ा।

जहाजों के सैनिक अपने काम में मग्न हैं यह देखकर पाँच गोरे सैनिकों का एक गुट डॉकयार्ड की दीवार के ऊपर से अन्दर घुसा। दूसरा गुट दीवार से ही जहाज़ों पर ध्यान दे रहा था। पहला गुट डॉकयार्ड के निकट की दीवार,  वहाँ पड़ी हुई भारी–भरकम चीज़ों और पेड़ों की ओट लेकर आगे सरकने लगा। यह गुट काफ़ी आगे निकल गया है, यह देखकर दूसरा गुट पेड़ पर चढ़ गया और HMIS ‘सिन्ध’ पर काम में मग्न सैनिकों पर लाइट मशीन गन से गोलीबारी करने लगा, ‘ फॉक्सल’ पर काम कर रहे ‘सिंध’ के चार सैनिक ज़ख्मी होकर नीचे गिरे। पास ही में खड़े ‘औंध’  के सैनिकों का उनकी ओर ध्यान गया। उन्होंने जहाज़ पर लगी बारह पौंड वाली तोप अभी–अभी तैयार की थी। गन क्रू अभी जहाज़ पर ही था। उन्होंने फटाफट कार्रवाई की, और क्या हो रहा है यह समझने से पहले ही तोप गरजी और पेड़ों पर चढ़े वे पाँचों सैनिक चिंधी–चिंधी होकर फिंक गए। इस अचानक हुए हमले से घबराकर ब्रिटिश सैनिकों ने डॉकयार्ड की ओर से हमला करने का विचार ही छोड़ दिया और मेन गेट की ओर से हमला तेज़ कर दिया।

गेट वे ऑफ इण्डिया के सामने चार किलोमीटर की दूरी पर खड़ा जहाज़ ‘पंजाब’ पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार गोला–बारूद लेने के लिए 20 तारीख को एम्युनिशन जेट्टी पर लगने वाला था। ‘पंजाब’ के सैनिकों ने 20 तारीख की रात को उपलब्ध गोला–बारूद का जायज़ा लिया तो पता चला कि गोला–बारूद एकदम अपर्याप्त है। ज़रूरत पड़ने पर सिर्फ एक–दो तोपें ही दागी जा सकती थीं।

‘‘इतना बड़ा जहाज़, मगर गोला–बारूद नहीं। अन्य जहाज़ ज़रूरत पड़ने पर फुल स्केल अटैक करेंगे मगर हम...’’ मुल्ला ने रोनी आवाज़ में कहा।

‘‘रोने से क्या होगा ?  कुछ करना होगा।’’  सज्जन सिंह ने कहा।

‘‘क्या करेंगे ?  गोला–बारूद एम्युनिशन स्टोर यहाँ से दस किलोमीटर दूर है।’’  मुल्ला के स्वर में निराशा थी।

‘‘ख़ामोशी से इस बातचीत को सुन रहे गोपालन का ध्यान ‘पंजाब’  से पाँच सौ फुट के अन्तर पर खड़े रॉयल नेवी के जहाज़ की ओर गया। ‘औंध’ से छूटे गोले की आवाज़ गोपालन ने सुनी और एक विचार उसके मन में कौंध गया।

‘‘इस जहाज़ पर उपस्थित गोरे सैनिकों में से अधिकांश को सुबह ही फोर्ट ले जाया गया है। जहाज़ पर यदि हुए,  तो सिर्फ बीसेक सैनिक ही होंगे। उन पर काबू पाना मुश्किल नहीं है ।’’  वह मन ही मन सोच रहा था कि ‘पंजाब’ के सैनिक डेक पर फॉलिन हुए। गोपालन ने अपनी योजना समझाई। ‘पंजाब’ से नौकाएँ पानी में छोड़ी गर्इं। दस–दस सैनिकों का एक–एक गुट एक–एक नौका में बैठा। हरेक के पास बन्दूक या लाइट मशीन गन थी। गन क्रू ने ‘पंजाब’ की चार इंची गन ‘मैन’ की और लोड करके ‘गेटवे’ की दिशा में घुमाई।

गोपालन ने इशारा किया और नौकाएँ ‘पंजाब’ से दूर गर्इं। ब्रिटेन के जहाज़ का ‘टोही’ इन नौकाओं पर नज़र रखे था। नौकाएँ डॉकयार्ड की ओर जाती हुई दिखीं तो उसने अपनी नज़र फिर से ‘गेटवे’ की ओर मोड़ी। गोपालन इसी की राह देख रहा था। उसने दूर जा चुकी नौकाओं को इशारा किया और नौकाएँ पीछे मुड़ीं। वे ‘पंजाब’ की दिशा में आ रही थीं। अब उनकी गति करीब चालीस नॉट थी। देखते–देखते नौकाएँ ‘पंजाब’ को पार करके ब्रिटेन के जहाज़ के पीछे की ओर गर्इं। गोपालन ने गन क्रू को इशारा किया। तोप चली। तोप का गोला उस जहाज़ से करीब बीस फुट दूर गिरा और उस हिस्से का पानी उफ़न कर ऊपर उछला। ब्रिटेन के उस जहाज़ पर भगदड़ मच गई। सैनिक ‘पंजाब’ वाली दिशा में आए। इस गड़बड़ का लाभ उठाकर नौकाओं वाले सैनिक जहाज़ में घुस गए, संगीनों के बल पर जहाज़ को कब्जे़ में ले लिया, और करीब डेढ़ घण्टे में उस ब्रिटेन के जहाज़ के गोला–बारूद के भण्डार खाली हो गए और ‘पंजाब’ के भण्डार पूरे–पूरे भर गए।

‘कैसल बैरेक्स’ के मेन गेट पर हमला अब कुछ ढीला पड़ गया था। सैनिकों का प्रतिकार भी कम हो गया था। खान के और सेंट्रल कमेटी के सदस्यों को चिन्ता होने लगी।

‘‘कैसल बैरेक्स’ के सैनिकों का गोला–बारूद तो ख़त्म नहीं हो गया ?’’  दत्त ने पूछा ।

‘‘अगर ऐसा है तो उन्हें गोला–बारूद पहुँचाना चाहिए।’’  खान ने जवाब दिया।

‘‘और, यदि वे मायूस हो गए हों तो ?’’   गुरु ने सन्देह व्यक्त किया।

‘‘ओह ! शायद वैसा न हो...’’ दत्त ने आशा व्यक्त की। ‘‘मेरा विचार है कि हम उन्हें सूचित करें कि मुम्बई के सारे जहाज़ तुम्हारी मदद के लिए तैयार हैं। यदि गोला–बारूद खत्म हो गई हो तो सूचित करें, जिससे सप्लाई की जा सके। किसी भी परिस्थिति में आत्मसमर्पण न करना।’’

‘कैसल बैरेक्स’ में सेंट्रल कमेटी का सन्देश मिलते ही सैनिकों का उत्साह दुगुना हो गया, और उन्होंने अधिक जोश से हमले का जवाब देना शुरू किया।

गॉडफ्रे और बिअर्ड ने ‘औंध’ और ‘पंजाब’ से दाग़ी गई तोपों की आवाज़ सुनी तो वे बेचैन हो गए। ‘‘जहाज़ों ने यदि दनादन तोपें दागनी शुरू कर दीं तो शहरी भाग में इमारतों की और जान–माल की खूब हानि होगी, और इस सारे नुकसान के लिए हमें ही ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा।’’ गॉडफ्रे ने चिन्तायुक्त सुर में कहा।

‘‘लंडन में पार्लियामेंट का अधिवेशन चल रहा है। यदि जहाज़ तोपों से मार करने लगे तो कल प्रधानमन्त्री और भारत मन्त्री को पार्लियामेंट का सामना करना मुश्किल हो जाएगा, और इस सबके लिए हमें ही ज़िम्मेदार माना जाएगा। हमें हर कदम फूँक–फूँककर तो रखना ही है; बल्कि इस समय लिये गए निर्णयों पर पुनर्विचार भी करना होगा।’’ बिअर्ड अस्वस्थ हो गया था।

‘‘मेरी राय है कि ‘कैसल बैरेक्स’ का हमला अब कुछ धीमा कर देना चाहिए। यदि सैनिक चिढ़ गए तो विस्फोट हो जाएगा और मेहनत से रची चालें बेकार हो जाएँगी।’’  गॉडफ्रे ने भय व्यक्त किया।

मेजर सैम्युअल को हमला धीमा करने का सन्देश भेजा गया।

नौसैनिकों का विद्रोह हिंसक मोड़ ले रहा है, यह ध्यान में आते ही मुम्बई के अनेक प्रतिष्ठित नागरिकों को मुम्बई के भविष्य की चिन्ता सताने लगी और वे बेचैन हो गए। सरकार पर दबाव डालकर यह सब रोकना चाहिए ऐसा उनका मत था। ‘सरकार और नौसैनिकों पर दबाव डालने वाला व्यक्ति कौन हो सकता है ?’ उनके सामने एक नाम तैर गया - सरदार वल्लभभाई पटेल। नौसैनिकों के विद्रोह के आरम्भ से ही वे मुम्बई में बैठे हैं यह बात भी ये प्रतिष्ठित नागारिक जानते थे। राष्ट्रीय समाचार–पत्रों के सम्पादकों ने,  मुम्बई के समाजसेवियों ने,  प्रमुख व्यापारियों ने, उद्योगपतियों ने और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने सरदार पटेल से मुलाकात करने की कोशिश की, मगर उनसे मुलाकात न हो सकी। इन प्रतिष्ठित नागरिकों के सामने दूसरा नाम आया मुख्यमन्त्री बाला साहेब खेर का। मगर पूछताछ करने से पता चला कि वे मुम्बई से बाहर गए हैं। प्रतिष्ठित शान्ति प्रेमी नागरिक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे।

‘कैसल बैरेक्स’ पर गोरे सैनिकों द्वारा की गई गोलीबारी और नौसैनिकों द्वारा दिया गया करारा जवाब, इस हमले में मारे गए और ज़ख्मी हुए सैनिक - यह सब सरदार पटेल को दोपहर में ही ज्ञात हो गया था। मगर वे सैनिकों को दी गई अपनी सलाह ‘बिना शर्त समर्पण’ पर कायम थे। दोपहर को जहाज़ों द्वारा तोप दाग़ने की ख़बर मिलते ही वे बेचैन हो गए।

‘मुम्बई की घटनाओं की गूँज यदि पूरे देश में फैल गई तो... दंगे, खून–खराबा, आगजनी...मुँह तक आई हुई स्वतन्त्रता फिसल गई तो ?’ इस ख़याल के आते ही वे कुर्सी से उठकर बेचैन मन से चक्कर लगाने लगे।

‘अगर मैं सैनिकों से मिलूँ तो ?  इस समय वे चिढ़े हुए हैं। मेरी सलाह शायद ही मानें। इसके बदले यदि मुम्बई के गवर्नर से सम्पर्क करूँ तो...’’  इस ख़याल से वे कुछ उत्साहित हुए और उन्होंने मुम्बई के गवर्नर सर कॉलविल को फ़ोन किया:

''May I speak to the Governor ? Sardar Patel on the line.''

''Please hold on the line.'' गवर्नर का पी.ए.  बोला।

''Yes, Colwil speaking.'' थोड़ी देर में गवर्नर ने फ़ोन लिया।

‘‘सर, ‘कैसल बैरेक्स’ के बाहर जो कुछ हो रहा है क्या उसे रोका नहीं जा सकता ?  क्या सिर्फ सैनिकों को दबाए रखने के लिए इस गोलीबारी की आवश्यकता थी ?’’   सरदार पटेल सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे।

''Cool down, Mr. Patel. यह सब ज़रूरी था इसीलिए किया गया। ज़खम के बिगड़ने से पहले की गई शस्त्र क्रिया है।‘’ शान्त स्वर में गवर्नर ने जवाब दिया।

‘‘क्या यह रोका नहीं जा सकता ?  क्या आप कुछ नहीं कर सकेंगे ?’’  पटेल ने पूछा।

‘‘नहीं, ये सारा मामला अब लॉर्ड एचिनलेक देख रहे हैं। अब तक जो भी घटनाएँ हुईं उन्हें देखते हुए हमारे द्वारा की गई कार्रवाई उचित थी। कल रात को भूखे सैनिकों के लिए मानवतावादी दृष्टिकोण से हमने खाद्य पदार्थ भेजे, सैनिकों ने उन्हें न केवल लेने से इनकार कर दिया, उल्टे बाहर तैनात भूदल की सेना पर पत्थरों की बौछार की। आज सुबह ‘कैसल बैरेक्स’ के सैनिक बेकाबू होकर नाविक तल के बाहर लगाए गए भूदल सैनिकों के घेरे को तोड़कर बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे, तब मजबूर होकर गोलीबारी करनी पड़ी... इस गोलीबारी का एक ही उद्देश्य था - बेकाबू सैनिकों को बैरेक में बन्द करना; उन पर ज़ुल्म करना या उन्हें आतंकित करना नहीं था। आज दोपहर को करीब एक बजे ‘नर्मदा’ नामक जहाज़ से तोपों की मार करने का आह्वान किया गया।’’ गवर्नर रॉटरे द्वारा तैयार किए गए प्रेसनोट के आधार पर जानकारी दे रहे थे। ‘‘ऐसी स्थिति में हमें मजबूरन हथियारों का इस्तेमाल करना पड़ा। मगर सर,   मैं आपको आश्वासन देता हूँ कि हम इस समस्या को शान्तिपूर्ण बातचीत के ज़रिये सुलझाने की कोशिश करेंगे।’’

‘‘ये सब इस तरह से हुआ है, यह मुझे मालूम नहीं था। यह सारा मामला शान्ति और समझदारी से ख़त्म हो यही मेरी इच्छा है। इसके लिए यदि मेरी मदद की ज़रूरत हो तो मैं तैयार हूँ।’’

पटेल सन्तुष्ट हो गए। उन्हें यकीन हो गया था कि यह प्रश्न शान्ति से सुलझ जाएगा।


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