उत्तरदायित्व
उत्तरदायित्व
शाम का समय था। खिड़की के पल्ले हवा के झोंकों से बार-बार हिल रहे थे और हल्की-हल्की बारिश की बूँदें चित्रा के चेहरे पर पड़ रही थीं। अपने गालों पर हाथ रखे, खिड़की से बाहर देखती चित्रा गहरी सोच में डूबी हुई थी। हवा से उसके बाल बार-बार उसके चेहरे पर आ रहे थे, लेकिन उसका ध्यान उन पर बिल्कुल नहीं था।
उसके मन में बस एक ही सवाल घूम रहा था—
“क्यों निरंजन? तुम ऐसा क्यों कर रहे हो मेरे साथ?
तुम्हारे लिए मैंने अपना सब कुछ छोड़ दिया... फिर क्या हो गया है तुम्हें? तुम इतने बदल क्यों गए? तुम्हारे वो वादे... वो प्यार... सब कहाँ खो गया?”
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“चित्रा... चित्रा! कहाँ खोई है तू?”
चित्रा अचानक अपने ख्यालों से बाहर आई और पलटकर देखा।“लता... तू? तू कब आई?”
लता उसके पास आते हुए बोली—
“जब तू अपने ख्यालों में खोई हुई थी।”
फिर कुछ पल चित्रा को ध्यान से देखने के बाद उसने कहा—
“मुझे पता है, तू फिर से निरंजन के बारे में सोच रही थी।”
चित्रा ने धीमे से सिर झुका लिया।
“हाँ लता... जब से निरंजन का एक्सीडेंट हुआ है, उसके बाद से वह पूरी तरह बदल गया है। लेकिन मैं क्या करूँ? मैं भी बस इन्हें खुश देखना चाहती हूं मैंने निरंजन का बहुत इलाज करवाया, हर संभव कोशिश की... लेकिन सारे डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। सबने एक ही बात कही कि अब निरंजन को चलने के लिए सहारे की जरूरत पड़ेगी।”
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“मैं हूँ ना उसके साथ... हमेशा रहूँगी। लेकिन वो मुझसे बात तक नहीं करता। कितनी भी कोशिश कर लूँ, लता... न तो वो शराब पीना छोड़ रहे हैं और न ही...”
चित्रा की आवाज़ भर्रा गई और वह आगे कुछ नहीं कह पाई।
लता ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे ढाँढस देते हुए कहा—
“तू दुखी मत हो, चित्रा। सब ठीक हो जाएगा। कभी-कभी इंसान अपनी परिस्थितियों से इतना टूट जाता है कि वह अपनों से भी दूर होने लगता है। निरंजन भी शायद उसी दर्द से गुजर रहा है। उसे अभी तेरे प्यार और साथ की सबसे ज्यादा जरूरत है।”
चित्रा ने नम आँखों से लता की ओर देखा।
बाहर बारिश अब कुछ तेज हो चुकी थी... लेकिन चित्रा के मन में उठ रहा तूफ़ान उससे कहीं अधिक गहरा था।
लता ने चित्रा का हाथ अपने हाथों में थाम लिया, । उसकी आँखों में अपनापन था और आवाज़ में एक अजीब-सी सांत्वना।
“चित्रा,” उसने धीमे स्वर में कहा, “तू परेशान मत हो। अस्पताल में शहर से एक बहुत बड़े डॉक्टर आए हुए हैं। मैं मौका मिलते ही निरंजन के बारे में उनसे बात करूँगी। शायद वे कोई रास्ता निकाल सकें… शायद सब ठीक हो जाए।”
उसके शब्दों में उम्मीद थी, और उसी उम्मीद की हल्की-सी रोशनी चित्रा के बुझते मन में भी उतरने लगी।
लता ने एक बार फिर घड़ी की ओर देखा,
फिर वह बोली—
“अच्छा, अब मैं चलती हूँ। मुझे देर हो रही है और हाँ, काकी तेरे बारे में पूछ रही थीं। जब मैं आ रही थी, उन्होंने तेरे लिए लड्डू भी भेजे हैं।”
यह सुनकर चित्रा के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसकी आँखों में एक अपनापन झिलमिला उठा।
“ये काकी भी न…” वह धीरे से बोली, “मेरा कितना ख्याल रखती हैं।”
क्षण भर के लिए कमरे में एक सुकून-सा उतर आया। चित्रा ने चुपचाप लता की ओर देखा। उसके चेहरे पर चिंता की रेखाएँ अब भी थीं, पर लता की बातों ने उसके भीतर कहीं गहरे दबे हुए विश्वास को जगा दिया था—एक नन्ही-सी उम्मीद, जो अंधेरे में भी टिमटिमा रही थी।
लता ने हल्की-सी मुस्कान के साथ उसका हाथ दबाया और कहा—
“तू हिम्मत रख, चित्रा। मैं निरंजन के बारे में उस डॉक्टर से जरूर बात करूँगी।”
इतना कहकर लता वहाँ से चली गई।
तभी निरंजन अपनी व्हीलचेयर को खिसकाता हुआ वहाँ आ पहुँचा। उसके पास आते ही शराब की तेज़ दुर्गंध चित्रा तक पहुँची। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।
वह चिल्लाते हुए बोला—
“अगर तुम्हारी बातें पूरी हो गई हों, तो अब खाना लगाओगी?”
चित्रा ने तुरंत अपने आँसू पोंछे और उसकी ओर देखकर धीमे स्वर में बोली—
“हाँ निरंजन... चलो, तुम्हें हाथ धुला देती हूँ। खाना तैयार है। आज मैंने तुम्हारी पसंद का सब कुछ बनाया है।”
निरंजन ने उसकी ओर बेरुखी से देखा और कठोर स्वर में बोला—
“हाथ धुला दूँ... मुझे अपने काम खुद करने आते हैं।”
चित्रा कुछ पल चुप रही। उसके चेहरे पर उदासी साफ़ झलक रही थी। वह बिना कुछ कहे रसोई की ओर चली गई और खाना लगाने लगी।
उसने मेज़ पर एक-एक करके सारे व्यंजन सजाने शुरू किए। हर पकवान में उसने वही स्वाद रखने की कोशिश की थी, जो निरंजन को पसंद था। कभी इन्हीं चीज़ों को देखकर निरंजन के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी, लेकिन अब वही मुस्कान जैसे कहीं खो गई थी।
चित्रा ने एक बार पलटकर निरंजन की ओर देखा।
वह चुपचाप व्हीलचेयर पर बैठा था।
चित्रा के मन में कई सवाल उठे, लेकिन उसने उन्हें अपने भीतर ही दबा लिया।
उसने मन ही मन सोचा—
“मैं तुम्हें पहले जैसा देखना चाहती हूँ, निरंजन... बस इतना ही तो चाहती हूँ।”
पर निरंजन अब पूरी तरह बदल चुका था। उसे शराब के सिवा जैसे किसी और चीज़ से कोई मतलब ही नहीं रह गया था। चित्रा की तकलीफ़, उसकी चिंता और उसकी कोशिशें भी अब उसे दिखाई नहीं देती थीं।
खाना खाने के बाद चित्रा ने निरंजन को सुला दिया। उसके बाद वह खुद खिड़की के पास आकर बैठ गई और न जाने कितनी देर तक गहरी सोच में डूबी रही। उसके मन में निरंजन को लेकर तरह-तरह के विचार उमड़ रहे थे।
रात कब बीत गई, उसे पता ही नहीं चला।
सुबह किसी की आवाज़ से उसकी आँख खुली।
“चित्रा... चित्रा सुन बिटिया!”
चित्रा जल्दी से उठकर बाहर आई।
“जी काकी, आई। क्या हुआ काकी?”
काकी ने पास आते हुए कहा—
“बिटिया, लता आई रही। कहत रही कि बिटिया से कह दियो, तैयार हुई जाए। निरंजन को भी साथ ले जाएँ। कह रही कि डॉक्टर साहब से कुछ बात करनी है।”
चित्रा कुछ पल के लिए जैसे विश्वास ही नहीं कर पाई।
“क्या काकी... सच कह रही हो?”
उसकी आँखों में अचानक चमक आ गई।
काकी ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।
“हाँ बिटिया, लता यही कहत रही।”
चित्रा के चेहरे पर खुशी फैल गई। उसकी आँखों में उम्मीद की एक नई किरण दिखाई देने लगी।
“अब मेरे निरंजन ठीक हो जाएँगे, काकी... ”
उसके चेहरे पर कई दिनों बाद सच्ची खुशी दिखाई दी। उसने मन ही मन उस अनजान डॉक्टर से एक आखिरी उम्मीद जोड़ ली थी।
चित्रा ने जल्दी से निरंजन के पास जाकर कहा—
“निरंजन, चलिए... जल्दी से तैयार हो जाइए। हमें डॉक्टर साहब के पास जाना है।”
निरंजन ने बिना उसकी ओर देखे कहा—
“मुझे कहीं नहीं जाना।”
“एक बार चलिए न, निरंजन। बहुत बड़े डॉक्टर आए हैं।
एक बार उनसे मिल लीजिए। शायद वे आपकी कुछ मदद कर सकें।”
चित्रा ने बहुत समझाया। काफी देर तक मनाने के बाद आखिरकार निरंजन तैयार हो गया।
कुछ देर बाद दोनों तैयार हो गए। चित्रा के मन में एक नई उम्मीद जाग उठी थी। वह बड़ी बेसब्री से लता का इंतज़ार करने लगी।
तभी बाहर से आवाज़ आई—
“चित्रा! तू तैयार है?”
चित्रा तुरंत बाहर आई।
“हाँ लता... लेकिन क्या डॉक्टर साहब हमसे मिलने के लिए तैयार हो गए? उन्होंने हमारे लिए समय निकाल लिया?”
“हाँ चित्रा। वो बहुत अच्छे इंसान हैं। मैंने जब उन्हें तुम्हारे और निरंजन के बारे में बताया, तो उन्होंने कहा कि आज ही उन्हें लेकर आ जाओ।”
चित्रा की आँखों में कृतज्ञता झलक उठी।
“मैं तेरा कैसे शुक्रिया करूँ, लता... तूने मेरे लिए इतना कुछ किया।”
लता मुस्कुराते हुए बोली—
“अच्छा, अब बातें छोड़ और जल्दी कर। हमें अस्पताल के लिए निकलना है।”
तीनों अस्पताल के लिए रवाना हो गए।
निरंजन सुबह से ही शराब के नशे में था। उसकी हालत देखकर चित्रा परेशान तो थी, लेकिन आज उसके मन में इन सब बातों से ज्यादा डॉक्टर से मिलने की उम्मीद थी। उसे विश्वास था कि शायद यही डॉक्टर उसके निरंजन की जिंदगी में फिर से खुशियाँ लौटा सकें।
अस्पताल पहुँचने के बाद लता ने कहा—
“चित्रा, तू निरंजन के साथ यहीं रुक। मैं जाकर देखती हूँ कि डॉक्टर साहब अभी खाली हैं या नहीं।”
चित्रा निरंजन के साथ पास रखी एक बेंच पर बैठ गई।
कुछ देर बाद लता वापस आई और बोली—
“चित्रा, थोड़ा समय लगेगा। डॉक्टर साहब अभी थोड़े व्यस्त हैं।”
यह सुनते ही निरंजन झुंझलाकर बोला—
“मुझे नहीं रुकना! मैं घर जा रहा हूँ।”
चित्रा ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया।
“निरंजन, थोड़ी देर के लिए रुक जाइए, प्लीज़। बस एक बार डॉक्टर साहब से मिल लीजिए।”
निरंजन गुस्से में कुछ बड़बड़ाता रहा, लेकिन चित्रा ने बहुत मुश्किल से उसे वहीं रोक लिया।
काफी देर तक इंतज़ार करने के बाद आखिरकार लता फिर उनके पास आई।
“चलो चित्रा, अब निरंजन को डॉक्टर साहब को दिखा देते हैं। डॉक्टर साहब अब खाली हो गए हैं।”
चित्रा के चेहरे पर राहत दिखाई दी।
लता उन्हें डॉक्टर के कमरे के बाहर ले गई और दरवाज़े पर पहुँचकर बोली—
“डॉक्टर साहब, बाहर मेरी दोस्त चित्रा और उसके पति आए हैं। मैं उन्हें अंदर बुला लूँ?”
अंदर से डॉक्टर ने अनुमति दी।
लता ने बाहर आकर आवाज़ लगाई—
“चित्रा, चित्रा... अंदर आ जा।”
चित्रा निरंजन को लेकर कमरे के अंदर चली गई।
“नमस्ते डॉक्टर साहब। ये मेरे पति निरंजन हैं।” चित्रा ने बैठते ही निरंजन की पूरी स्थिति के बारे में डॉक्टर को बताया—उसका एक्सीडेंट, उसके बाद उसकी हालत में आया बदलाव, इलाज के दौरान आई परेशानियाँ और फिर धीरे-धीरे शराब की बढ़ती आदत के बारे में भी।
डॉक्टर साहब ने ध्यान से उसकी सारी बातें सुनीं। इसके बाद उन्होंने निरंजन का चेकअप किया। निरंजन के पास से आ रही शराब की तेज़ दुर्गंध डॉक्टर को भी परेशान कर रही थी, लेकिन उन्होंने बिना कुछ कहे अपना चेकअप जारी रखा।
कुछ देर बाद डॉक्टर साहब ने कहा—
“मैं कुछ टेस्ट लिख रहा हूँ। ये टेस्ट करवा लीजिए और दो दिन बाद रिपोर्ट लेकर मुझसे मिलिए।”
तभी निरंजन ने तुरंत कहा—
“मुझे कोई टेस्ट नहीं करवाना।”
चित्रा ने उसकी ओर देखा और बहुत प्यार से समझाने लगी—
“निरंजन, प्लीज़... एक बार ये टेस्ट करवा लीजिए। शायद डॉक्टर साहब आपकी परेशानी का कोई हल निकाल सकें।”
काफी समझाने के बाद आखिरकार निरंजन टेस्ट करवाने के लिए तैयार हो गया।
चित्रा ने राहत की साँस ली।
टेस्ट करवाने के बाद चित्रा निरंजन के साथ घर वापस लौट आई। उसके मन में अब भी डॉक्टर की बातों को लेकर एक उम्मीद थी।
उसे लग रहा था कि शायद इस बार सच में कुछ अच्छा होने वाला है।
अब चित्रा के लिए उन दो दिनों का इंतज़ार करना मुश्किल हो रहा था। उसे हर पल यही उम्मीद रहती कि डॉक्टर साहब शायद निरंजन के लिए कोई रास्ता निकाल दें।
किसी तरह दो दिन बीत गए।
सुबह लता ने चित्रा को आवाज़ दी—
“चित्रा, क्या तू तैयार है? आज हमें अस्पताल जाना है।”
चित्रा ने उदास चेहरा लिए बाहर आते हुए कहा—
“हाँ लता... लेकिन इस बार मैं निरंजन को नहीं मना पाई। वो अस्पताल चलने के लिए तैयार नहीं हैं।”
लता ने उसे समझाते हुए कहा—
“तू परेशान मत हो। इस बार हमें सिर्फ रिपोर्ट दिखानी है। निरंजन का साथ होना जरूरी नहीं है।”
चित्रा कुछ पल चुप रही, फिर बोली—
“पर लता... मैं निरंजन को इस तरह अकेला छोड़कर कैसे जाऊँ?”
तभी काकी ने पास आते हुए कहा—
“अरे बिटिया, तू जा। हम हियाँ रुक जाएँगे। तू आराम से अस्पताल जा और डॉक्टर साहब को रिपोर्ट दिखा आ।”
चित्रा ने काकी की ओर देखा और धीरे से सिर हिला दिया।
“ठीक है काकी।”
लता अस्पताल से रिपोर्ट लेकर आई थी। चित्रा उसके साथ अस्पताल पहुँच गई। उसके मन में कई तरह के सवाल थे। वह बड़ी बेसब्री से डॉक्टर साहब का इंतज़ार कर रही थी। उसे उम्मीद थी कि शायद डॉक्टर साहब निरंजन के लिए कोई रास्ता निकाल सकें।
तभी लता उसके पास आई और बोली—
“चित्रा, चल... डॉक्टर साहब ने बुलाया है।”
चित्रा तुरंत उठी और लता के साथ डॉक्टर के कमरे में चली गई।
“नमस्ते, डॉक्टर साहब।”
“नमस्ते। आइए, बैठिए।”
लता ने डॉक्टर साहब के सामने रिपोर्ट रखते हुए कहा—
“डॉक्टर साहब, ये निरंजन की रिपोर्ट है।”
डॉक्टर साहब ने रिपोर्ट अपने हाथ में ली और ध्यान से उसे देखने लगे।
कुछ देर तक कमरे में खामोशी छाई रही। डॉक्टर साहब के चेहरे के भाव धीरे-धीरे गंभीर होते गए।
रिपोर्ट देखने के बाद उन्होंने गहरी साँस ली और चित्रा की ओर देखा।
“मुझे अफसोस है... मैं आपके पति के पैरों के लिए कुछ नहीं कर पाऊँगा। उनकी स्थिति ऐसी है कि अब उनके दोबारा चल पाने की संभावना नहीं है।”
चित्रा कुछ पल तक डॉक्टर को देखती रह गई।
डॉक्टर ने आगे कहा—
“लेकिन रिपोर्ट में एक और गंभीर समस्या सामने आई है। लंबे समय से शराब पीने के कारण उनके शरीर पर बहुत बुरा असर पड़ा है, उन्हें कैंसर है।”
डॉक्टर के शब्द सुनते ही चित्रा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“नहीं... नहीं डॉक्टर साहब। आप झूठ बोल रहे हैं। ऐसा नहीं हो सकता।”
वह रोते हुए बोली—
“मेरे निरंजन को कुछ नहीं हो सकता...”
डॉक्टर ने उसे शांत करते हुए कहा—
“देखिए, मैं समझ सकता हूँ कि आपके लिए यह खबर कितनी मुश्किल है। मैं उनके पैरों को ठीक नहीं कर सकता, लेकिन कैंसर का इलाज संभव है। अगर समय पर इलाज शुरू किया जाए, तो हो सकता है आपके पति ठीक हो जाएँ।”
चित्रा ने आँसुओं के बीच डॉक्टर की ओर देखा।
“क्या... सच में वो ठीक हो सकते हैं?”
“हाँ, उम्मीद रखिए। लेकिन इलाज में समय लगेगा और आपको हिम्मत रखनी होगी।”
चित्रा ने चुपचाप सिर हिला दिया।
वह भीतर से पूरी तरह टूट चुकी थी।
अस्पताल से बाहर निकलते समय उसके कदम भारी हो गए थे। लता उसके साथ थी, लेकिन चित्रा जैसे अपने ही विचारों में खोई हुई थी।
घर लौटते पूरे रास्ते उसके मन में डॉक्टर की बातें ही घूमती रहीं—
“नहीं... नहीं। मैं निरंजन को कुछ नहीं बताऊँगी। वो पहले ही अपनी जिंदगी से टूट चुके हैं। अगर उन्हें यह सब पता चला, तो वो पूरी तरह टूट जाएँगे।”
लेकिन अगले ही पल उसके मन में दूसरा सवाल उठ खड़ा हुआ—
“पर इलाज के लिए इतने पैसे कहाँ से आएँगे?”
चित्रा की आँखों से फिर आँसू छलक पड़े।
एक तरफ निरंजन की जिंदगी थी और दूसरी तरफ इलाज का खर्च।
वह समझ ही नहीं पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए।
उसके मन में बस एक ही बात गूँज रही थी—
“मैं अपने निरंजन को बचाऊँगी... चाहे मुझे इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े।”
लेकिन कैसे?
इस सवाल का जवाब उसके पास नहीं था।
चित्रा बहुत परेशान थी और भीतर से बुरी तरह टूट चुकी थी। फिर भी उसने अपने चेहरे पर एक झूठी मुस्कान सजा ली और निरंजन के पास जाकर बोली—
“निरंजन, तुम्हें पता है आज अस्पताल में क्या हुआ? डॉक्टर साहब ने कहा है कि तुम बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे।”
लेकिन निरंजन पर जैसे उसकी बातों का कोई असर ही नहीं हुआ। वह चुपचाप अपनी शराब की बोतल की ओर देखता रहा।
चित्रा ने उसे समझाते हुए कहा—
“निरंजन, लेकिन इसके लिए तुम्हें शराब छोड़नी होगी। डॉक्टर साहब ने भी यही कहा है।”
चित्रा की बात सुनते ही निरंजन का गुस्सा भड़क उठा। उसने चित्रा को दूर हटाते हुए गुस्से में कहा—
“निकल जाओ मेरे घर से! मुझे उपदेश देने चली आती हो।”
उसने अपनी शराब की बोतल उठाई और व्हीलचेयर को कमरे की ओर ले गया। अगले ही पल उसने तेजी से दरवाज़ा बंद कर लिया।
दरवाज़े के बाहर बैठी चित्रा की आँखों से आँसू बहने लगे। वह देर तक वहीं बैठकर रोती रही।
कुछ दिन और बीत गए।
निरंजन की दवाइयाँ भी अब खत्म होने वाली थीं। चित्रा हर दिन उसके व्यवहार और अपनी परेशानियों के बीच किसी तरह खुद को संभाल रही थी।
उधर अस्पताल में लता ने डॉक्टर साहब को कुछ परेशान देखा तो उसने पूछा—
“क्या हुआ डॉक्टर साहब? आप कुछ परेशान से लग रहे हैं।”
“नहीं... नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।”
लता ने उनकी ओर देखते हुए कहा—
“कुछ तो बात है। आप मुझे बता सकते हैं। शायद मैं आपकी कुछ मदद कर सकूँ।”
डॉक्टर कुछ पल चुप रहे, फिर बोले—
“वो बात ये है कि मेरे लिए ये शहर बिल्कुल नया है। यहाँ मैं किसी को जानता भी नहीं हूँ। मुझे अपनी बच्ची के लिए एक ट्यूशन टीचर की जरूरत है।”
लता ने मुस्कुराकर कहा—
“बस इतनी-सी बात, डॉक्टर साहब?”
डॉक्टर ने कहा—
“ये इतनी-सी बात नहीं है। मेरी बच्ची को पढ़ाना आसान नहीं है। उसे पढ़ाने के लिए कोई सुलझा हुआ और समझदार इंसान चाहिए, जो उसे ठीक से समझ सके।”
लता तुरंत बोली—
“फिर तो मैं आपकी मदद कर सकती हूँ।”
डॉक्टर ने हैरानी से पूछा—
“वो कैसे?”
लता ने कहा—
“वो मेरी दोस्त है न, चित्रा... जो अपने पति के साथ यहाँ आई थी।”
डॉक्टर कुछ सोचते हुए बोले—
“ओह... हाँ, वो। लेकिन वो क्या...?”
लता ने उनकी बात पूरी करते हुए कहा—
“हाँ, मैं उसे मना लूँगी। वो बहुत अच्छी और समझदार है। मुझे पूरा विश्वास है कि वो आपकी बच्ची को अच्छी तरह पढ़ा पाएगी।”
डॉक्टर ने कहा—
“अच्छा... अगर चित्रा जी मान जाती हैं, तो मुझे कोई परेशानी नहीं है।”
लता मुस्कुराई और बोली—
“ठीक है डॉक्टर साहब। मैं आज ही उससे बात करती हूँ।”
लता के मन में अब एक उम्मीद थी। उसे पता था कि चित्रा इस समय बहुत मुश्किल दौर से गुजर रही है, लेकिन शायद यह काम उसके लिए एक नई शुरुआत बन सके।
चित्रा के घर के पास आते ही लता ने देखा कि काकी कुछ उदास-सी खड़ी थीं।
“अरे काकी, क्या हुआ? कुछ उदास-सी लग रही हैं?”
“कुछ नहीं बिटिया, बस चित्रा की चिंता सताए रहती है।”
“हाँ काकी, जितनी प्यारी और अच्छी इंसान है वो, उतनी ही तकलीफ़ें भगवान ने उसके नसीब में लिख दी हैं।”
“हाँ बिटिया...”
“लेकिन काकी, परेशान मत होइए। कुछ न कुछ हल ज़रूर निकलेगा।”
लता ने कुछ पल रुककर कहा,
“डॉक्टर साहब को अपनी बेटी के लिए एक ट्यूशन टीचर चाहिए था। मैंने चित्रा के लिए बात की है। बस, उसे वही बताने आई हूँ।”
“अच्छा बिटिया?”
“हाँ काकी।”
लता ने घर के अंदर देखते हुए आवाज़ लगाई,
“चित्रा... चित्रा!”
अंदर चित्रा चुपचाप बैठी थी। उसे देखते ही लता उसके पास गई और बोली—
“ये क्या? तू हर वक़्त बस ये सुंदर-सा चेहरा लटकाकर बैठी रहती है।”
चित्रा ने उसकी ओर देखा।
“अच्छा सुन, डॉक्टर साहब की बेटी के लिए एक टीचर चाहिए। क्या तू जाएगी उसे पढ़ाने?”
“लता, वो मैं...”
चित्रा अपनी बात पूरी कर पाती, उससे पहले ही काकी बोल पड़ीं—
“हाँ, क्यों नहीं जाएगी! कह दो अपने डॉक्टर साहब से, मेरी बिटिया जाएगी।”
“पर काकी...”
“हमका कुछ नहीं सुनना। तू बस जाएगी।”
“लेकिन निरंजन...”
“अरे, तेरी काकी है ना हम! हम देख लेब सब।”
फिर काकी ने लता की ओर देखकर पूछा,
“कब से जाना है?”
“कल से। यहीं पहाड़ी मोड़ वाला पहला घर है ना, उसी में रहते हैं डॉक्टर साहब।”
चित्रा ने कुछ पल सोचा और फिर धीरे से बोली—
“ठीक है लता, मैं चली जाऊँगी।”
फिर उसने काकी की ओर देखते हुए कहा—
“पर काकी, आप निरंजन का ध्यान...”
तभी निरंजन ने उसकी बात सुनकर कहा—
“तुझे बस काम न करना पड़े! कामचोर कहीं की, बस घर में पड़ी रहे।”
“नहीं निरंजन, वो मैं...”
“चुप कर तू। ये कल से जाएगी।”
चित्रा चुप हो गई। उसके चेहरे पर चिंता अब भी थी, लेकिन अब उसके सामने एक छोटा-सा रास्ता खुल चुका था।
अगली सुबह चित्रा अपने सारे काम समय से निपटा लेती है। शाम होते ही वह डॉक्टर साहब के घर जाने के लिए तैयार होने लगती है।
पीली साड़ी, माथे पर छोटी-सी बिंदी और बिल्कुल सादा-सा रूप… चित्रा की खूबसूरती जैसे उसकी सादगी में ही छिपी थी। उसे सजने-सँवरने का कोई शौक नहीं था, फिर भी उसकी सादगी में एक अलग ही आकर्षण था।
चित्रा डॉक्टर साहब के घर पहुँचकर बेल बजाती है।
दरवाज़ा खुलते ही सामने एक महिला खड़ी थी।
“आप चित्रा जी हैं?”
“जी… आप?”
“मैं मालती हूँ, परी बेबी की केयरटेकर। डॉक्टर साहब ने आपके बारे में बताया था। आप कुछ लेंगी?”
“नहीं-नहीं, आप मुझे परी के पास ले चलिए।”
मालती चित्रा को परी के कमरे तक ले जाती है। दरवाज़े के पास पहुँचकर वह मुस्कुराते हुए आवाज़ लगाती है—
“परी बेबी, देखो कौन आया है… आपकी नई ट्यूशन टीचर।”
अंदर से परी की आवाज़ आती है—
“मुझे किसी से नहीं मिलना। मुझे नहीं पढ़ना किसी ट्यूशन टीचर से। जाओ यहाँ से।”
इतना कहकर परी अपना कुशन उठाकर मालती की ओर फेंकती है, लेकिन वह कुशन जाकर चित्रा को लग जाता है।
परी तुरंत अपना चेहरा दूसरे कुशन से छिपा लेती है।
मालती चित्रा की ओर देखकर कहती है—
“देखा ना परी, कह रही है कि वो पढ़ना नहीं चाहती।”
चित्रा हल्का-सा मुस्कुराती है और परी की ओर देखते हुए कहती है—
“पर मैं तो उसके साथ खेलने आई थी।”
परी कुशन के पीछे से चुपचाप चित्रा की ओर देखने लगती है।
चित्रा आगे कहती है—
“मुझे तो परी के साथ दोस्ती करनी थी।”
यह सुनकर परी धीरे-धीरे अपने चेहरे से कुशन हटा देती है।
“सच्ची मिस? आप मुझे पढ़ाएँगी नहीं?”
चित्रा मुस्कुराते हुए कहती है—
“नहीं… ये तुमसे किसने कहा कि मैं तुम्हें पढ़ाने आई हूँ?”
परी के चेहरे पर पहली बार हल्की-सी मुस्कान आ जाती है।
वह चित्रा को ध्यान से देखने लगती है।
चित्रा भी धीरे से परी के पास जाकर बैठ जाती है।
फिर चित्रा मालती की ओर देखकर उसे जाने का इशारा करती है।
मालती मुस्कुराकर वहाँ से चली जाती है।
कुछ ही देर में चित्रा और परी के बीच बातें शुरू हो जाती हैं। कभी दोनों खिलौनों से खेलतीं, तो कभी छोटी-छोटी बातों पर हँसतीं।
धीरे-धीरे परी का संकोच दूर होने लगा और चित्रा के साथ उसकी अच्छी दोस्ती हो गई।
परी को अब चित्रा के आने का इंतज़ार रहने लगा था और चित्रा को परी की मासूम-सी मुस्कान बहुत अच्छी लगने लगी थी।
चित्रा तो जैसे परी को देखते ही अपनी सारी तकलीफ भूल जाती थी और परी को भी चित्रा से माँ सा लगाव हो गया था।
दिनभर निरंजन का ध्यान रखते हुए उसे शाम को परी से मिलने का बड़ा इंतज़ार रहता था।
डॉक्टर साहब के घर पर पहुँचते ही परी दौड़कर चित्रा के पास आई।
“मिस, आप आ गईं!”
“हाँ परी।”
“देखो, मैंने ड्राइंग में क्या बनाया है।”
“अच्छा! दिखाओ तो मुझे।”
परी ने खुशी से अपनी बनाई हुई पेंटिंग चित्रा के हाथ में दे दी।
पेंटिंग देखते ही चित्रा की नजर उसमें बने तीन लोगों पर ठहर गई।
“ये…?”
परी मासूमियत से बोली—
“मम्मा, पापा और मैं।”
“मम्मा…”
चित्रा के मुँह से बस इतना ही निकल पाया।
तभी मालती वहाँ आ गई। चित्रा ने चुपचाप उसकी तरफ देखा।
मालती ने धीरे से चित्रा को बताया—
“एक कार दुर्घटना में डॉक्टर साहब की पत्नी की मृत्यु हो गई थी। तब से परी अपनी माँ के बिना ही है।”
चित्रा की आँखें भर आईं। उसने परी को प्यार से अपनी बाँहों में भर लिया।
परी ने चित्रा की ओर देखते हुए पूछा—
“क्या हुआ मिस? आपकी आँखों में आँसू क्यों हैं?”
चित्रा ने अपने आँसू छिपाते हुए मुस्कुराकर कहा—
“कुछ नहीं… बस यूँ ही।”
धीरे-धीरे चित्रा परी को बहुत प्यार करने लगी थी और परी भी चित्रा के बिना नहीं रह पाती थी। अब तो वह घड़ी में बस चित्रा के आने का समय देखती रहती थी।
चित्रा के आते ही उसके चेहरे पर एक अलग ही खुशी दिखाई देती थी।
एक दिन परी प्यार से चित्रा की गोद में बैठी उसकी सुनाई हुई कहानी सुन रही थी। चित्रा बड़े प्यार से उसके बालों पर हाथ फेर रही थी।
कुछ दूरी पर खड़े डॉक्टर साहब चुपचाप दोनों को देख रहे थे।
उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।
वह मन ही मन सोचने लगे—
“कुछ तो बात है चित्रा जी में… इतनी जल्दी उन्होंने परी को अपना बना लिया।”
“कितनी सुलझी-समझदार हैं आप… तभी तो।”
तभी चित्रा की नज़र डॉक्टर साहब पर पड़ती है। उन्हें देखते ही वह थोड़ी-सी घबरा जाती है और ठीक से बैठने लगती है।
तभी डॉक्टर साहब अंदर आते हैं।
“कैसी हैं आप?”
“मैं… मैं ठीक हूँ।”
डॉक्टर साहब मुस्कुराते हुए बोले,
“आपने तो थोड़े ही समय में परी को अपना बना लिया है।”
चित्रा हल्का-सा मुस्कुराकर बोली,
“नहीं… वो है ही इतनी प्यारी बच्ची, सबको अपना बना लेती है।”
“अच्छा, अब मैं चलती हूँ।”
परी तुरंत बोली,
“मैम, थोड़ी देर और रुको ना।”
चित्रा ने प्यार से उसकी ओर देखते हुए कहा,
“मैं कल आऊँगी, परी।”
और वह परी के सिर पर हाथ फेरकर वहाँ से उठ गई।
चित्रा के कमरे से बाहर निकलते ही डॉक्टर साहब ने पीछे से आवाज़ दी—
“चित्रा जी…”
चित्रा ने पलटकर देखा,
“जी, डॉक्टर साहब?”
“Thank you so much… आप परी का इतनी अच्छी तरह ध्यान रखती हैं।”
चित्रा हल्के से मुस्कुराई,
“इसमें धन्यवाद की क्या बात है? यह तो मेरा फ़र्ज़ है… और फिर परी है ही इतनी प्यारी बच्ची।”
तभी परी भी पास आ गई और चित्रा का हाथ पकड़कर खड़ी हो गई।
डॉक्टर साहब कुछ पल चुप रहे, फिर बोले,
“चित्रा जी, कल मैं और परी पिकनिक पर जा रहे हैं… क्या आप भी हमारे साथ चलेंगी?”
चित्रा ने तुरंत मना करते हुए कहा,
“नहीं-नहीं डॉक्टर साहब… आप तो जानते ही हैं, मेरे पति की तबीयत ठीक नहीं है। मैं उन्हें इस हालत में अकेला छोड़कर कैसे जा सकती हूँ?”
तभी परी ने चित्रा का हाथ पकड़कर मासूमियत से कहा,
“प्लीज़ चित्रा मैम… आप भी चलिए ना। आपके बिना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा।”
“लेकिन परी…”
“प्लीज़ मैम… बस थोड़ी देर के लिए। आप चलेंगी तो मुझे बहुत खुशी होगी।”
परी की मासूम ज़िद देखकर चित्रा उसे मना नहीं कर पाई। उसने डॉक्टर साहब की ओर देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली—
“अच्छा… मैं कोशिश करूँगी।”
परी खुशी से उछल पड़ी,
“येस! मैम हमारे साथ चलेंगी!”
चित्रा परी की खुशी देखकर मुस्कुरा तो दी, लेकिन उसके मन में कहीं न कहीं निरंजन की चिंता भी बनी हुई थी।
घर आते ही चित्रा ने कमरे में प्रवेश करते हुए पूछा—
“निरंजन, तुमने दवाई खा ली?”
तभी काकी कमरे से बाहर आती हुई बोलीं—
“हाँ बिटिया, दवाई दे दी है।”
“अच्छा काकी, अब आप जाइए। मैं देख लूँगी।”
“ठीक है बिटिया, हम चलत हैं।”
काकी के जाने के बाद चित्रा निरंजन के पास आकर बैठ गई और उसकी दवाइयाँ ठीक करने लगी।
तभी निरंजन ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा—
“चित्रा… आजकल तुम डॉक्टर के यहाँ कुछ ज़्यादा देर नहीं रुकने लगी हो?”
चित्रा ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ बोली नहीं।
निरंजन ने फिर हल्के व्यंग्य में कहा—
“पढ़ाने ही जा रही हो या… कहीं डॉक्टर तुम्हें पसंद तो नहीं आ गया?”
“निरंजन!” चित्रा की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई।
वह कुछ पल के लिए चुप रही, फिर उसकी आँखों में देखते हुए बोली—
“आप ऐसा कैसे सोच सकते हैं? मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ। आपके अलावा मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता।”
निरंजन कुछ नहीं बोला।
चित्रा ने उसकी दवाइयाँ एक-एक करके ठीक जगह पर रखते हुए मन ही मन सोचा—
“परसों हमें अस्पताल भी जाना होगा… डॉक्टर साहब से निरंजन की तबीयत के बारे में भी बात करनी है। पता नहीं उनकी हालत कब ठीक होगी…”
अपने मन की चिंता छिपाते हुए चित्रा ने दवाइयाँ व्यवस्थित कीं और फिर प्यार से निरंजन की ओर देखने लगी।
अगले दिन सुबह से ही चित्रा के मन में परी की बातें घूम रही थीं।
“निरंजन को पिकनिक के बारे में कैसे बताऊँ? पता नहीं कितना नाराज़ होंगे… आज भी तो डॉक्टर साहब को लेकर न जाने क्या-क्या सोच रहे थे। अगर मैंने उन्हें बता दिया तो शायद वह मुझे जाने ही नहीं देंगे।”
कुछ पल बाद उसके मन में परी का मासूम चेहरा आ गया।
“लेकिन अगर मैं नहीं गई तो उस बिन माँ की बच्ची का दिल टूट जाएगा। उसने कितनी उम्मीद से मुझसे चलने के लिए कहा है।”
चित्रा कुछ देर सोचती रही, फिर मन ही मन तय किया—
“मैं निरंजन को पिकनिक के बारे में बाद में आकर बता दूँगी। समय से वापस भी आ जाऊँगी… तब शायद उन्हें बुरा भी नहीं लगेगा।”
आज चित्रा ने हल्की गुलाबी रंग की साड़ी पहनी थी। सादगी के बावजूद वह बहुत खूबसूरत लग रही थी। उसने आईने में खुद को देखा और फिर बिना कुछ सोचे घर से निकल गई।
डॉक्टर साहब के घर पहुँचकर जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला, एक पल के लिए उनकी नज़र चित्रा पर ठहर गई।
वह कुछ कह पाते, उससे पहले ही परी खुशी से बोल उठी—
“मैम! आप तो बहुत सुंदर लग रही हैं!”
फिर उसने अपने पापा की ओर देखकर कहा—
“है ना पापा?”
डॉक्टर साहब थोड़ा झिझकते हुए मुस्कुराए—
“हाँ बेटा…”
फिर चित्रा की ओर देखते हुए बोले—
“चित्रा जी, सच में… आप पर यह रंग बहुत खिल रहा है।”
चित्रा हल्का-सा मुस्कुराई और बोली—
“धन्यवाद।”
परी ने दोनों का हाथ पकड़ लिया।
“अब चलिए ना, हमें देर हो जाएगी!”
तीनों पिकनिक के लिए निकल पड़े।
पिकनिक की जगह पहुँचते ही परी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह कभी चित्रा का हाथ पकड़कर इधर जाती, तो कभी उसे अपने साथ लेकर कुछ दिखाने लगती। चित्रा भी उसकी खुशी देखकर मुस्कुराती रही।
लेकिन परी की हँसी के बीच भी चित्रा का मन बार-बार निरंजन की ओर चला जाता।
“पता नहीं उन्होंने दवाई समय पर ली होगी या नहीं… काकी उनके पास हैं, फिर भी मुझे उनकी चिंता हो रही है।”
वह बार-बार घड़ी की ओर देखती।
उधर डॉक्टर साहब भी चुपचाप चित्रा को देखते रहते। उन्हें खुद समझ नहीं आ रहा था कि कब चित्रा की सादगी, उसकी जिम्मेदारी और परी के प्रति उसका अपनापन उनके मन में उसके लिए एक अलग जगह बना चुका था।
लेकिन वह अपनी भावनाओं को समझने और उनसे दूर रहने की कोशिश कर रहे थे।
कुछ देर बाद चित्रा ने घड़ी देखते हुए कहा—
“डॉक्टर साहब, अब हमें घर चलना चाहिए। मुझे देर हो रही है।”
डॉक्टर साहब ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा—
“जी, चलिए।”
परी थोड़ी उदास हुई, लेकिन चित्रा ने प्यार से उसका हाथ थाम लिया।
“आज बहुत मज़ा आया ना?”
“हाँ मैम… लेकिन अगली बार आप फिर मेरे साथ चलेंगी ना?”
चित्रा मुस्कुराई—
“हाँ परी, बिल्कुल।”
और फिर तीनों वापस घर की ओर चल पड़े।
घर आते ही चित्रा सीधे निरंजन के पास पहुँची। वह कुछ कह पाती, उससे पहले ही—
“चित्रा… चित्रा, सुन!”
चित्रा ने पलटकर देखा।
“हाँ लता, क्या हुआ?”
लता मुस्कुराते हुए उसके पास आई और बोली—
“क्या बात है? डॉक्टर साहब तो आजकल तुम्हारी तारीफ़ करते नहीं थकते।”
फिर वह थोड़ा और पास आकर धीरे से बोली—
“मुझे तो लगता है… कहीं डॉक्टर साहब तुम्हें पसंद करने तो नहीं लगे?”
लता की बात सुनते ही चित्रा गुस्से में बोल पड़ी—
“लता!”
लता तुरंत हँसते हुए बोली—
“अरे, गुस्सा क्यों होती हो? मैं तो बस मज़ाक कर रही थी।”
चित्रा गंभीर होकर बोली—
“लेकिन आगे से ऐसा मज़ाक मत करना। मैं बस निरंजन से प्यार करती हूँ… और उनके अलावा मेरे मन में किसी के लिए ऐसी कोई जगह नहीं है।”
लता ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा—
“हाँ बाबा, मुझे पता है। अच्छा, अब माफ़ कर दे। आगे से कभी ऐसा मज़ाक नहीं करूँगी।”
चित्रा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ बात वहीं खत्म कर दी।
कुछ पल बाद उसे अचानक कुछ याद आया।
“लता…”
“हाँ?”
“कल हमें निरंजन के साथ अस्पताल जाना है।”
लता ने सहजता से कहा—
“हाँ, मुझे याद है।”
चित्रा ने एक बार निरंजन की ओर देखा। उसके चेहरे पर चिंता की हल्की-सी रेखा उभर आई।
कल अस्पताल में डॉक्टर से मिलने के ख्याल से ही उसके मन में कई सवाल उठने लगे थे।
चित्रा निरंजन के प्रति अपने हर उत्तरदायित्व को पूरी ईमानदारी से निभा रही थी, पर न जाने निरंजन कब चित्रा की भावनाओं को समझेगा।
अगली सुबह—
“निरंजन, जल्दी करिए… लता आती ही होगी।”
“मुझे कहीं नहीं जाना है।”
चित्रा कुछ पल चुप रही। फिर उसकी आँखों में आँसू भर आए।
“मेरी खातिर चलिए… अगर कभी भी मुझसे सच्चा प्यार किया है, निरंजन, तो आपको मेरी कसम है।”
चित्रा की बात सुनकर निरंजन ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में छिपा दर्द शायद पहली बार उसे दिखाई दिया।
तभी बाहर से लता की आवाज आई—
“चित्रा! तू तैयार है?”
“हाँ लता, बस थोड़ी देर रुक… निरंजन भी तैयार हो रहे हैं।”
कुछ देर बाद तीनों अस्पताल के लिए निकल गए।
अस्पताल पहुँचते ही लता डॉक्टर साहब के पास गई।
“डॉक्टर साहब, चित्रा और निरंजन आ गए हैं।”
डॉक्टर साहब ने दोनों को अंदर बुलाया।
चित्रा और निरंजन के अंदर आते ही डॉक्टर साहब ने चित्रा की ओर देखा और बोले—
“आइए चित्रा जी, बैठिए।”
निरंजन का चेकअप करने के बाद डॉक्टर साहब कुछ परेशान दिखाई दिए।
चित्रा ने उनकी चिंता भाँपते हुए पूछा—
“क्या हुआ डॉक्टर साहब?”
डॉक्टर साहब ने कुछ क्षण चुप रहने के बाद गंभीर स्वर में कहा—
“निरंजन ने अपनी शराब नहीं छोड़ी है ना, चित्रा जी?”
चित्रा ने नजरें झुका लीं।
“वो… डॉक्टर साहब…”
“यही वजह है कि इनकी हालत लगातार खराब होती जा रही है। मुझे बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि जिस तरह से ये शराब पी रहे हैं, इन पर दवाइयों का भी कोई असर नहीं होगा।”
चित्रा की आँखों में आँसू आ गए।
वह कुछ कह नहीं पाई।
डॉक्टर साहब ने कुछ दवाइयाँ लिखते हुए कहा—
“मैं कुछ दवाइयाँ लिख रहा हूँ। आप इन्हें समय पर दीजिएगा। लेकिन सबसे जरूरी है कि निरंजन शराब पूरी तरह छोड़ें। अगर इन्होंने अपनी आदत नहीं बदली, तो सिर्फ दवाइयों से इनकी हालत सुधरना बहुत मुश्किल होगा।”
चित्रा ने काँपती आवाज में कहा—
“डॉक्टर साहब… मैं पूरी कोशिश करूँगी।”
डॉक्टर साहब ने उसकी ओर देखते हुए कहा—
“कोशिश आपको नहीं, निरंजन को करनी होगी, चित्रा जी। आप अपना उत्तरदायित्व निभा रही हैं… अब उन्हें भी अपने उत्तरदायित्व को समझना होगा।”
चित्रा ने एक बार निरंजन की ओर देखा।
निरंजन चुपचाप बैठा था।
उसकी नजरें झुकी हुई थीं।
शायद डॉक्टर की बातें उसके कानों तक तो पहुँच रही थीं, लेकिन क्या वे उसके दिल तक भी पहुँचेंगी?
चित्रा के मन में बस यही सवाल था—
“आखिर कब समझेगा निरंजन कि उसकी जिंदगी सिर्फ उसकी अपनी नहीं… उससे किसी की पूरी जिंदगी जुड़ी हुई है?”
घर आते ही चित्रा ने ऐसे जताया, जैसे सब कुछ बिल्कुल ठीक हो, ताकि निरंजन को उसकी परेशानी का एहसास न हो।
“निरंजन, क्या खाएँगे?” चित्रा ने सामान्य स्वर में पूछा।
निरंजन ने चित्रा की ओर देखा, लेकिन बिना कुछ कहे दीवार पर लगी पुरानी तस्वीरों को देखने लगा।
“अच्छा... समझ गई। आज आप कुछ स्पेशल खाएँगे। मैं अभी बनाती हूँ।”
चित्रा रसोई में चली गई।
खाना खाने के बाद चित्रा निरंजन को सुलाती हुई उसके पैरों के पास कुर्सी पर बैठ गई। दिनभर की थकान के कारण बैठे-बैठे ही कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला।
सुबह निरंजन की आँख खुली तो उसने देखा कि चित्रा अभी भी वहीं कुर्सी पर सो रही थी।
“अरे... चित्रा, यहीं पर सो गई?”
निरंजन कुछ देर उसे देखता रहा।
“क्या मैं इतना बुरा हो गया हूँ? कितना ध्यान रखती है चित्रा मेरा... मैं खुद को बदलने की कोशिश करूँगा।”
तभी चित्रा की आँख खुली।
“अरे, आप उठ गए? मुझे आवाज दे देते।”
निरंजन कुछ नहीं बोला, बस उसे देखता रहा।
“क्या हुआ?”
निरंजन ने हल्की-सी मुस्कान के साथ चित्रा का हाथ थाम लिया।
“क्या तुम्हारे हाथ की चाय मिलेगी?”
यह सुनते ही चित्रा के चेहरे की चमक से मानो पूरा कमरा रोशनी से भर गया हो।
“हाँ निरंजन, क्यों नहीं।”
मन ही मन सोचते हुए चित्रा रसोई की ओर चली गई—
आज निरंजन ने शराब नहीं... चाय के लिए कहा है।
थोड़ी देर बाद चाय लेकर चित्रा आई।
“ये लीजिए, निरंजन।”
“चित्रा... चित्रा...”
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
चित्रा ने दरवाजा खोला।
“हाँ काकी!”
“देख, आलू भरे पराठे लाई हूँ। तुझे पसंद हैं ना मेरे हाथ के?”
“हाँ काकी! मुझे भी खाने हैं। बहुत समय हो गया आपके हाथ के आलू भरे पराठे खाए।”
“क्यों नहीं बिटवा।”
खुशी से चित्रा ने काकी का हाथ पकड़कर गोल-गोल घूमते हुए तीन-चार चक्कर लगा दिए।
“अरी चित्रा, रुक जा शैतान! क्या मेरी बूढ़ी हड्डियाँ तोड़कर ही मानेगी?”
निरंजन दूर बैठे यह सब देख रहा था।
कितनी खुश है चित्रा... मेरे लिए तो क्या कुछ नहीं करती। तो क्या मैं उसके लिए इतना भी नहीं कर सकता?
कैसे मैं इतना पत्थरदिल बन गया? उस बेचारी को कितना परेशान किया है मैंने।
उस दिन चित्रा ने पूरे मन से घर का काम किया। सारे घर की सफाई करते-करते कब शाम हो गई, उसे पता ही नहीं चला।
अचानक उसे परी का ध्यान आया।
“अरे... परी इंतजार कर रही होगी। मुझे जल्दी से निकलना होगा।”
तैयार होते ही चित्रा ने निरंजन से कहा—
“निरंजन, मैं परी को पढ़ाने जा रही हूँ।”
“चित्रा...”
चित्रा रुक गई।
“क्या हुआ, निरंजन?”
“वो... अगर आज तुम न जाओ तो?”
“क्या हुआ निरंजन?”
“नहीं... बस ऐसे ही।”
इतने समय बाद निरंजन की आँखों में वही पुराना प्यार देखकर चित्रा का मन भर आया। उसने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया।
“हाँ निरंजन, मैं रुक जाती हूँ।”
“पर चित्रा, वो बच्ची...”
निरंजन अपनी बात पूरी करता, उससे पहले ही चित्रा ने उसके होंठों पर हाथ रख दिया।
“तुमने कुछ कहा और मैंने न माना हो, ऐसा कभी हुआ है क्या?”
निरंजन ने भी उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
उधर...
“मालती... मालती...”
“जी डॉक्टर साहब?”
“एक कॉफी लाइए।”
मालती कॉफी लेकर आई तो डॉक्टर साहब ने पूछा—
“मैंने देखा, परी कुछ उदास है। क्यों?”वो अभी तक चित्रा जी भी नहीं आई
“उन्होंने कुछ बताया था क्या?”
“नहीं डॉक्टर साहब, उन्होंने कुछ नहीं कहा था।”
डॉक्टर साहब के चेहरे पर चिंता उतर आई।
“कहीं किसी परेशानी में तो नहीं हैं चित्रा जी? वरना ऐसा नहीं करतीं। कहीं निरंजन की तबीयत तो...”
उधर परी अपने पिता के पास आकर बोली—
“पापा... पापा! आज मेरी मिस क्यों नहीं आईं? मुझे उनसे मिलना है।”
डॉक्टर साहब ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा—
“कोई नहीं... आज पापा आपके साथ खेलेंगे।”
लेकिन चित्रा का ख्याल बार-बार उसके मन में आने लगा।
मुझे बार-बार चित्रा जी का ख्याल क्यों आ रहा है? कहीं मुझे उनसे प्यार तो नहीं...
“नहीं... नहीं। मुझे पता है कि वो सिर्फ अपने पति से प्यार करती हैं।”
कुछ पल रुककर उसके मन में एक और सवाल उठा—
पर क्या निरंजन उनके लायक हैं? चित्रा जी को तो दुनिया की सारी खुशियाँ मिलनी चाहिए। और निरंजन... वो तो जैसे उन्हें पसंद ही नहीं करता।
“क्या सोच रहे हो, पापा?”
परी की आवाज सुनकर वह अपने ख्यालों से बाहर आये।
“नहीं, कुछ नहीं। चलो, ड्रॉइंग बनाते हैं।”
परी मुस्कुराते हुए अपनी ड्रॉइंग की कॉपी लेकर उसके पास बैठ गई।
परी को कहानी सुनाते-सुनाते काफी देर हो चुकी थी।
“पापा, अब एक और कहानी सुनाइए ना।”
डॉक्टर साहब मुस्कुराए।
“नहीं बेटा, अब बहुत देर हो गई है। चलो, आज पापा आपको कहानी सुनाते-सुनाते सुला देते हैं।”
“ठीक है पापा।”
डॉक्टर साहब कहानी सुनाने लगे। कुछ ही देर में परी गहरी नींद में सो गई।
उन्होंने धीरे से उसकी चादर ठीक की और उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा—
“सो गई मेरी गुड़िया...”
फिर वह भी बिस्तर पर लेट गए।
“अब मुझे भी सो जाना चाहिए।”
लेकिन जैसे ही उन्होंने आँखें बंद कीं, उनके सामने चित्रा का चेहरा आ गया।
वही शांत चेहरा... वही सादगी... और वही आँखें, जिनमें जाने क्यों आजकल उन्हें एक अलग ही अपनापन दिखाई देने लगा था।
उन्होंने करवट बदली।
“मैं बार-बार चित्रा जी के बारे में क्यों सोच रहा हूँ?”
दूसरी करवट ली, लेकिन विचारों का सिलसिला नहीं रुका।
कभी चित्रा की मुस्कान सामने आती, कभी उसका परी का ध्यान रखना
“क्या हो रहा है मुझे?”
इन्हीं विचारों की उधेड़बुन में कब रात बीत गई, उन्हें पता ही नहीं चला।
सुबह जब घड़ी पर नजर पड़ी तो वह चौंक गए।
“ओह... सुबह के चार बज गए!”
उन्होंने आँखें मलते हुए घड़ी की ओर देखा।
“आज अस्पताल जाते ही लता से पूछता हूँ। शायद उसे कुछ पता हो।”
उस सुबह जैसे समय रुक-सा गया था।
डॉक्टर साहब बार-बार घड़ी देखते रहे।
आखिरकार उन्होंने आवाज लगाई—
“मालती! मालती!”
“जी डॉक्टर साहब?”
“मेरा नाश्ता लगा दीजिए।”
“जी डॉक्टर साहब।”
नाश्ता करते हुए भी उनके मन में वही सवाल घूम रहा था।
नाश्ता खत्म करके
“परी अभी सो रही है?”
“जी डॉक्टर साहब।”
“आप उसका ध्यान रखिएगा। मैं अस्पताल जा रहा हूँ।”
“जी डॉक्टर साहब।”
डॉक्टर साहब जल्दी से अस्पताल के लिए निकल गए।
---
अस्पताल
अस्पताल पहुँचते ही उन्होंने अपने केबिन का दरवाजा खोला।
लेकिन दरवाजे के ठीक सामने लता खड़ी थी।
अचानक उन्हें देखकर लता घबरा गई और संतुलन बिगड़ने पर डॉक्टर साहब की बाँहों का सहारा लेना पड़ा।
“अरे... लता, तुम!”
लता तुरंत संभलकर पीछे हट गई।
“वो... डॉक्टर साहब, मैं आते समय आपके लिए ये फूल लाई थी। इन्हें आपके केबिन में रखने आई थी।”
उसने फूलों का छोटा-सा गुलदस्ता आगे बढ़ा दिया।
फूलों को पकड़ते हुए लता, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।”
“जी डॉक्टर साहब।”
डॉक्टर साहब कुछ क्षण चुप रहे, फिर सीधे पूछ बैठे—
“चित्रा जी और उनके पति... ठीक तो हैं?”
लता ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
“क्यों डॉक्टर साहब?”
“कल चित्रा जी यहाँ नहीं आई थीं। मुझे लगा... शायद कोई परेशानी हो।”
लता हल्के से मुस्कुराई।
“नहीं डॉक्टर साहब, आप परेशान मत होइए। उसेशायद घर पर कोई काम आ गया होगा।”
डॉक्टर साहब ने राहत की साँस ली, लेकिन उनके चेहरे की चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
“हाँ... शायद।”
लता ने उन्हें ध्यान से देखा।
डॉक्टर साहब, कितने अच्छे हैं उन्हें सब की कितनी चिंता है
उसी शाम
“उफ़्फ़... आज कितना काम था!”
लता ने थककर घड़ी की ओर देखा।
“अरे, बहुत समय हो गया। अब मुझे निकलना चाहिए।”
वह अस्पताल से बाहर निकल ही रही थी कि अचानक सामने डॉक्टर साहब आ गए।
“अरे डॉक्टर साहब, आप?”
“चलो लता, मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ।”
“वो डॉक्टर साहब... मुझे रास्ते में थोड़ा काम भी है। मैं चली जाऊँगी।”
“ठीक है, मैं तुम्हें रास्ते तक ही छोड़ देता हूँ।”
लता ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन डॉक्टर साहब ने गाड़ी की ओर इशारा कर दिया।
“आओ।”
लता चुपचाप गाड़ी में बैठ गई।
पूरे रास्ते वह कभी खिड़की से बाहर देखती तो कभी चुपके से डॉक्टर साहब की ओर।
उनकी सहज मुस्कान, दूसरों के लिए चिंता और हर किसी की मदद करने की आदत आज लता को कुछ अलग ही नजर आ रही थी।
कुछ देर बाद डॉक्टर साहब ने पूछा—
“लता, क्या तुम्हें यहीं उतरना है?”
लता जैसे अचानक अपने ख्यालों से बाहर आई।
“जी... जी डॉक्टर साहब।”
वह गाड़ी से उतर गई।
गाड़ी आगे बढ़ गई तो लता कुछ पल वहीं खड़ी उसे देखती रही।
“ये मेरे मन में डॉक्टर साहब के लिए...”
वह अचानक चुप हो गई।
“ये मुझे क्या हो रहा है?”
फिर उसके मन में एक और ख्याल आया—
“पर कहीं डॉक्टर साहब चित्रा जी को तो पसंद नहीं करते?”
“ये मैं क्या सोच रही हूँ! चित्रा तो निरंजन से कितना प्यार करती है... और ये बात डॉक्टर साहब भी समझते हैं।”
तभी पीछे से आवाज आई—
“कहाँ ध्यान है तेरा?”
लता ने मुड़कर देखा।
“काकी! वो... मैं...”
“क्या मैं-मैं लगा रखी है? क्या हुआ है? अपना ध्यान रखा कर।”
“जी काकी।”
काकी चलिए चित्रा से मिलते हैं।”
“चित्रा! कहाँ है तू?”
अंदर से चित्रा की आवाज आई—
“हाँ लता, आ जा। मैं अंदर ही हूँ।”
लता अंदर गई तो चित्रा को देखते ही मुस्कुरा दी।
“क्या बात है? आज तो तू बड़ी प्यारी लग रही है।”
फिर लता ने उसके चेहरे को ध्यान से देखते हुए कहा—
“तेरे चेहरे की खुशी बता रही है कि कुछ तो बात है।”
चित्रा शर्माते हुए मुस्कुरा दी।
“हाँ लता... निरंजन खुद को बदल रहे हैं।”
“सच?”
“हाँ। वो पहले वाले निरंजन बनने की कोशिश कर रहे हैं।”
चित्रा की आँखों में खुशी साफ झलक रही थी।
“आज उन्होंने मुझसे चाय माँगी... फिर मुझे रुकने के लिए भी कहा।”
लता ने मुस्कुराकर उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैंने कहा था ना चित्रा, शायद एक दिन उन्हें तुम्हारे प्यार और तुम्हारे उत्तरदायित्व की कीमत समझ आएगी।”
चित्रा ने धीमे से कहा—
“बस... अब मैं चाहती हूँ कि हमारा घर फिर से पहले जैसा हो जाए।”
मैं कितना गलत सोच रही थी
मतलब डॉक्टर साहब और चित्रा एक दूसरे को ......
वो खुशी से मतलब मैं डॉक्टर साहब को
मुझे खुद नहीं पता मुझे क्या हो रहा है
“डॉक्टर साहब हैं ही इतने अच्छे, किसी को भी उनसे प्यार हो जाये
“लता, ज़रा मेरी मदद कर।”
“लता... कहाँ खो गई? ये बॉक्स पकड़ ज़रा।” एक काकी को दे देना
“क्या है इसमें?”
“इसमें मैंने दही के फुलके तेरे लिए रखे हैं।”
“अरे वाह! तुझे कैसे पता, मेरा यही खाने का मन था?”
दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई। सच्ची दोस्ती की खूबसूरती ही यही थी कि बिना कहे भी एक-दूसरे के मन की बात समझ आ जाती थी।
“अच्छा सुन, अब मैं परी को पढ़ाने जा रही हूँ।”
“ठीक है चित्रा, मैं भी चलती हूँ। फिर मिलती हूँ तुझसेl
“निरंजन, मैं परी को पढ़ाने जा रही हूँ। आपकी दवाई सामने ही रख दी है। जल्दी आ जाऊँगी, परेशान मत होना।”
“हाँ चित्रा, आराम से जाओ। मैं ठीक हूँ।”
निरंजन को गले लगाकर चित्रा चली गई। उसके मन में एक ही संतोष था कि वह अपने हर उत्तरदायित्व को पूरी ईमानदारी से निभा रही है।
उधर डॉक्टर साहब की नजर बार-बार दरवाजे की ओर उठ रही थी। वह खुद भी नहीं समझ पा रहे थे कि चित्रा के आने का इंतजार अब उन्हें इतना बेचैन क्यों करने लगा था।
“क्या हुआ डॉक्टर साहब? किसी का इंतज़ार कर रहे हैं?”
“हाँ मालती, मैं सोच रहा हूँ कि चित्रा जी अभी तक नहीं आईं।”
“आ रही होंगी डॉक्टर साहब। इसी समय ही आती हैं।”
तभी दरवाजे की घंटी बजी।
“रुको मालती, मैं देखता हूँ।”
डॉक्टर साहब ने जल्दी से दरवाजा खोला। सामने चित्रा को देखकर उनके चेहरे पर अनायास ही खुशी आ गई।
“चित्रा जी, कल आप क्यों नहीं आई थीं? सब ठीक तो है?”
“जी डॉक्टर साहब, कुछ काम आ गया था। मैं परी के पास जाती हूँ।”
चित्रा आगे बढ़ गई, लेकिन डॉक्टर साहब उसे जाते हुए देखते रह गए।
मन में उठती भावनाओं को शब्द देना उनके लिए आसान नहीं था।
मैं कब आपसे अपने मन की बात कह पाऊँगा?”
उधर चित्रा परी को ढूँढ़ते हुए उसके कमरे में पहुँची।
“परी... परी, कहाँ हो तुम?”
परी रूठते हुए बोली, “मैं आपसे बात नहीं करूँगी।”
चित्रा समझ गई कि उसकी प्यारी परी उससे नाराज़ है। उसके चेहरे पर एक प्यारी-सी मुस्कान आ गई।
“अच्छा! तो मेरी गुड़िया मुझसे नाराज़ है? पर मुझे तो पता है, उसे कैसे मनाना है।”
चित्रा ने परी को प्यार से अपनी बाँहों में लेकर दुलारना शुरू कर दिया। परी का सारा गुस्सा धीरे-धीरे पिघलने लगा।
कुछ रिश्ते खून के नहीं होते, फिर भी दिल के इतने करीब होते हैं कि उनकी नाराज़गी भी अपनी और उनकी मुस्कान भी अपनी लगने लगती है।
परी ने मासूमियत से पूछा, “आप क्यों नहीं आई थीं कल?”
चित्रा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“मेरी गुड़िया, कल मुझे कुछ काम था, पर अब से मैं रोज़ आऊँगी।”
परी के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। चित्रा उसे देखकर मन ही मन खुश हो गई। उसे परी के साथ बिताया हर पल अपने जीवन की भागदौड़ के बीच एक छोटी-सी खुशी जैसा लगता था।
सब कुछ कितना अच्छा लग रहा है, बिल्कुल एक सपने जैसा... बस निरंजन की तबीयत भी ठीक हो जाए, फिर सब अच्छा हो जाएगा।
“क्या हुआ मिस? क्या सोच रही हो?”
“कुछ नहीं परी, बस यूँ ही।”
“अच्छा, बहुत देर हो गई। अब मुझे चलना चाहिए।”
“कल आप आओगी न?”
“हाँ, मेरी गुड़िया। तुम्हारे बिना मुझे भी अच्छा नहीं लगता।”
“फिर आप यहीं रुक जाओ न, मिस।”
“हाँ परी, जरूर रुकूँगी, पर अभी घर पर भी कुछ जरूरी काम रहते हैं। उन्हें भी तो करना है।”
“अच्छा, कल आप ज़्यादा देर रुकोगी? प्रॉमिस?”
“पक्का वाला।”
“अच्छा, अब चलती हूँ।”
तभी डॉक्टर साहब ने आवाज़ लगाई,
“चित्रा जी, सुनिए... कल आप निरंजन जी को अस्पताल ले आइए। कुछ जाँच करवानी हैं।”
“जी, डॉक्टर साहब।”
डॉक्टर साहब मन ही मन सोचने लगे—
“क्या कभी मैं आपको बता पाऊँगा कि मैं आपसे कितना प्यार करता हूँ?”
चित्रा जल्दी-जल्दी घर की ओर चल पड़ी।
“निरंजन मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे...” वह मन ही मन सोच रही थी।
आधे रास्ते में आते ही चित्रा ने एक जानी-पहचानी आवाज़ सुनी।
“बिटिया...”
“अरे काकी, आप?”
“कहीं गई थीं?”
“हाँ बिटिया, बाजार तक गई रही। तोहार लिए साड़ी लाई हूँ।”
“काकी, आप मेरे लिए कुछ न कुछ करती ही रहती हैं।”
चित्रा ने काकी को गले लगा लिया और भावुक होकर बोली,
“अगर मेरी माँ होतीं, तो बिल्कुल आप जैसी होतीं।”
“अच्छा, अब बस कर। घर जा। निरंजन बिटवा तोहार इंतज़ार करत है।”
“जी, काकी।”
घर पहुँचते ही चित्रा ने आवाज़ लगाई—
“निरंजन, सुनिए...”
“तुम आ गई, चित्रा?”
“हाँ, मैंने कहा था न कि समय से आ जाऊँगी।”
चित्रा ने निरंजन को गौर से देखा।
“क्या हुआ आपको? तबीयत कुछ खराब लग रही है।”
“बस, थोड़ी कमजोरी लग रही है।”
“हम कल ही अस्पताल चलेंगे। आप परेशान मत होइए।”
“हाँ... जब तक तुम मेरे साथ हो, मैं बिल्कुल परेशान नहीं हूँ।”
चित्रा ने मुस्कुराकर कहा,
“मैं हमेशा आपके साथ हूँ, निरंजन।”
अगली सुबह...
“आज मैं डॉक्टर साहब से अपने मन की बात कह दूँगी। जाने कैसे मुझे उनसे प्यार हो गया...”
तभी लता को कुछ याद आया।
“अरे, आज तो चित्रा को भी अस्पताल जाना है। जल्दी करती हूँ।”
लता जल्दी-जल्दी चित्रा के घर की ओर चल पड़ी।
चित्रा घर के बाहर ही खड़ी थी।
“चित्रा, अरे तू घर के बाहर ही है!”
“और निरंजन?”
“वो भी यहीं हैं।”
अस्पताल पहुंचते ही
बस सब कुछ अच्छा हो।
“सब अच्छा होगा। तू घबरा मत।”
अस्पताल पहुँचकर लता ने डॉक्टर साहब से कहा,
“डॉक्टर साहब, चित्रा आई है।”
“हाँ लता, अंदर ले आओ उन्हें।”
जाँच के बाद डॉक्टर साहब का चेहरा गंभीर हो गया।
“लता, तुम निरंजन जी को बाहर ले चलो। मुझे चित्रा जी से कुछ रिपोर्ट के बारे में बात करनी है।”
“जी, डॉक्टर साहब।”
लता निरंजन को बाहर ले गई।
चित्रा घबराकर डॉक्टर साहब की ओर देखने लगी।
“क्या हुआ, डॉक्टर साहब? सब ठीक तो है?”
डॉक्टर साहब कुछ क्षण चुप रहे, फिर गंभीर स्वर में बोले—
“नहीं चित्रा जी... कुछ भी ठीक नहीं है। निरंजन जी की हालत बिल्कुल भी ठीक नहीं है।”
चित्रा की आँखों में डर उतर आया।
“ऐसा मत कहिए, डॉक्टर साहब...”
डॉक्टर साहब ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“चित्रा जी... काश ऐसा न होता...”
“पर मैं अपनी पूरी कोशिश करूँगा।”
“निरंजन, तुम ठीक हो जाओगे। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती। कितनी मुश्किलों के बाद मैंने अपने पुराने निरंजन को वापस पाया है। अब मैं तुम्हें खुद से दूर नहीं होने दूँगी,” चित्रा मन ही मन सोचती हुई बाहर आ गई।
लता ने चित्रा के चेहरे पर चिंता की लकीरें देखीं तो पूछा, “क्या हुआ चित्रा? तू इतनी परेशान क्यों है?”
“कुछ नहीं लता,” चित्रा ने निरंजन की ओर देखते हुए कहा, सब ठीक है निरंजन डॉक्टर साहब ने कहा है कि आप जल्दी ठीक हो जाओगे
“अच्छा लता, अब हम घर चलते हैं।”
“ठीक है चित्रा, मैं शाम को तुझसे मिलने आती हूँ।”
चित्रा के वहाँ से जाते ही डॉक्टर साहब कुछ पल तक उसी दिशा में देखते रहे। उनके मन में कई भाव उमड़ रहे थे।
“चित्रा जी अपने पति से कितना प्यार करती हैं… पर मैं इस स्थिति में उनसे अपने मन की बात नहीं कह सकता। मैं बस उन्हें खुश देखना चाहता हूँ। शायद यही मेरे मन की सच्ची खुशी होगी। हाँ, परी के जन्मदिन पर मैं उनसे अपने मन की बात कहूँगा,” डॉक्टर साहब ने मन ही मन तय किया।
तभी लता उनके पास आई।
“डॉक्टर साहब, मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी है।”
डॉक्टर साहब ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “लता, हम बाद में बात करें। अभी मुझे कुछ जरूरी काम है।”
लता कुछ कहती, उससे पहले ही डॉक्टर साहब बोले, “मुझे पता है कि तुम क्या कहना चाहती हो। तुम चित्रा जी के लिए परेशान हो न? मैं पूरी कोशिश करूँगा कि सब ठीक हो जाए।”
लता ने कुछ नहीं कहा, बस उनकी ओर देखकर हल्का-सा सिर हिला दिया। शायद ये सही समय नहीं है अपनी बात कहने का मन ही मन सोचते हुए मै परी के जन्मदिन पर अपने मन की बात डॉक्टर साहब को बता दूंगी
घर पहुँचते ही चित्रा ने निरंजन से कहा, “आप आराम करिए, मैं आपके लिए चाय लेकर आती हूँ।”
निरंजन ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन चित्रा ने प्यार से उसे रोक दिया।
“आपको अभी बस आराम की जरूरत है। बाकी सब मैं संभाल लूँगी।”
चित्रा रसोई की ओर चली गई। उसके मन में एक ही प्रार्थना थी—जिस इंसान को उसने इतनी मुश्किलों के बाद वापस पाया है, वह अब उससे कभी दूर न जाए।
तभी बाहर से आवाज आई—
“बिटिया… बिटिया!”
“जी काकी, आई।”
चित्रा बाहर आई तो काकी उसके चेहरे को देखते ही समझ गईं कि कुछ ठीक नहीं है।
“का हुआ? अस्पताल मा डॉक्टर ने का कहा?”
चित्रा कुछ पल चुप रही। फिर धीमी आवाज में बोली, “काकी… निरंजन की हालत ठीक नहीं है।”
काकी ने तुरंत उसके सिर पर हाथ रखा।
“हे भगवान! तू परेशान न हो बिटिया। भगवान सब सही करिहैं। तू हिम्मत रख। सब ठीक होई।”
चित्रा की आँखें नम हो गईं।
“हाँ काकी… अब उन्हीं का सहारा है। बस भगवान से यही प्रार्थना है कि वे उन्हें मुझसे दूर न करें।”
काकी ने उसे अपने पास बैठाते हुए कहा, “रो मत बिटिया। जब तक उम्मीद है, तब तक हिम्मत भी रखनी चाहिए। भगवान देर कर सकत हैं, पर तेरी प्रार्थना जरूर सुनिहैं।”
चित्रा ने आँसू पोंछे और धीरे से कहा—
काकी बस आई निरंजन को चाय देकर
आप भी चाय पी लीजिए काकी।
काकी ने चाय का कप हाथ में लिया और चित्रा की ओर देखते हुए मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगीं। उस छोटे-से घर में उस समय हर किसी के मन में एक ही उम्मीद थी—निरंजन ठीक हो जाए और चित्रा की दुनिया फिर से पूरी हो जाए।
“काश मैं यह कह पाता कि चित्रा जी, निरंजन ठीक हो जाएँगे... पर सच तो यही है कि अब निरंजन के पास ज़्यादा समय नहीं है।”
डॉक्टर साहब के मन में यह बात जैसे कोई भारी पत्थर बनकर बैठ गई थी। वह जानते थे कि सच कितना कड़वा है, फिर भी उसे स्वीकार करना चित्रा जी लिए आसान नहीं था।
“डॉक्टर साहब, क्या सोच रहे हैं आप?”
“कुछ नहीं, लता... बस...।”
“अच्छा डॉक्टर साहब, परसों परी का जन्मदिन है। आपने कहा था न कि आपको उसके लिए कुछ शॉपिंग करनी है?”
“हाँ लता, करनी तो है...।”
“फिर आज शाम आप मेरे साथ चलिए। पास में ही एक अच्छा-सा मॉल है। वहाँ बच्चों का सामान बहुत अच्छा मिलता है।”
“ठीक है, शाम में चलते हैं। और थैंक यू सो मच, लता... मेरे लिए इतना कुछ सोचने के लिए।”
“नहीं डॉक्टर साहब, इसमें थैंक यू की कोई बात नहीं है। परी मेरी भी बच्ची जैसी ही है।”
चित्रा के घर पहुंचने के कुछ देर बाद अचानक कमरे से निरंजन की आवाज़ आई—
“क्या हुआ, निरंजन? क्या चाहिए आपको?”
“तुम पास बैठो, चित्रा... बस बहुत बेचैनी-सी हो रही है।”
चित्रा तुरंत उसके पास आकर बैठ गई। उसके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी, लेकिन वह अपनी घबराहट निरंजन से छिपाने की पूरी कोशिश कर रही थी।
“हाँ निरंजन, मैं पास ही हूँ आपके। कुछ मत सोचिए... सब ठीक होगा। और परसों तो हमारी शादी की सालगिरह भी है।”
निरंजन ने चित्रा की ओर देखा। उसकी आँखों में जैसे बीते हुए वर्षों की सारी यादें एक साथ उतर आईं।
“तुम्हें याद था, चित्रा?”
“ये भी कोई पूछने की बात है? कैसे भूल सकती हूँ भला मैं?”
“चित्रा, मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया न?”
चित्रा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ उसका हाथ थाम लिया।
“नहीं निरंजन, आप ऐसा क्यों सोचते हैं? मैंने आपको सिर्फ़ आपके अच्छे समय में नहीं, आपको हर परिस्थिति में अपना माना है। मैं बहुत प्यार करती हूँ आपसे।”
कुछ पल के लिए दोनों के बीच ख़ामोशी छा गई। उस ख़ामोशी में न जाने कितनी बातें थीं, जिन्हें कहने की अब शायद ज़रूरत ही नहीं थी।
“अच्छा, अब आप आराम करिए। कुछ मत सोचिए।”
चित्रा की गोद में सिर रखकर निरंजन ने अपनी आँखें बंद कर लीं। चित्रा उसके बालों पर धीरे-धीरे हाथ फेरती रही। उसकी आँखों में नमी थी, मगर होंठों पर वही मुस्कान थी, ताकि निरंजन को उसकी चिंता का एहसास न हो।
अचानक चित्रा की नज़र घड़ी की ओर गई तो उसे परी की भोली-सी आँखें याद आ गईं।
“मेरी गुड़िया... मुझे माफ़ करना। आज मैं आ नहीं पाऊँगी। कल जाते ही उसे गले लगाकर मना लूँगी। निरंजन को मेरी ज़रूरत है... मैं उन्हें अकेला छोड़कर नहीं जा सकती।”
उसका मन परी के पास जाने के लिए बेचैन था, लेकिन इस समय निरंजन को छोड़ना उसके लिए उससे भी मुश्किल था। कभी-कभी इंसान के सामने ऐसे फैसले आ जाते हैं, जहाँ सही और गलत नहीं, बल्कि दो अपने लोगों में से किसी एक को चुनना पड़ता है।
“मालती! मालती! परी कहाँ है?”
“डॉक्टर साहब, वो अपने कमरे में है। आज चित्रा जी नहीं आईं, तभी थोड़ा गुस्से में है।”
डॉक्टर साहब ने परी के लिए लाया हुआ सामान उठाया।
“लता, तुम क्या लोगी?”
“कुछ नहीं डॉक्टर साहब। बस, मैं चलती हूँ।”
“ठीक है लता, आराम से जाना मैं परी को मनाता हूं कल अस्पताल में मिलते हैं।”
जी डॉक्टर साहब
डॉक्टर साहब परी के कमरे में गए।
“परी, देखो पापा तुम्हारे लिए क्या-क्या लाए हैं।”
परी ने सामान की ओर देखा, लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं आई। उसने मुँह फुलाकर पूछा—
“आज चित्रा मिस क्यों नहीं आईं?”
डॉक्टर साहब ने उसके मासूम चेहरे को देखा। बच्चों की नाराज़गी भी कितनी मासूम होती है—उन्हें बस अपने किसी खास इंसान का साथ चाहिए होता है।
“बेटा, आज तुम्हारी मिस को बहुत ज़रूरी काम था। कल वो ज़रूर आएँगी।”
“ठीक है...।”
परी ने धीरे से सामान अपने पास रख लिया, लेकिन उसकी आँखों में अब भी चित्रा के आने का इंतज़ार था। उसे क्या पता था कि आज चित्रा भी कहीं दूर बैठी उसी मासूम चेहरे को याद कर रही थी।
किसी तरह रात कटी। चित्रा की आँखों में एक पल के लिए भी नींद नहीं आई। पूरी रात वह बस निरंजन के पास बैठी उन्हें निहारती रही। कभी उनके माथे पर हाथ रखती, तो कभी चुपचाप उनकी साँसों को महसूस करती।
“ओह... सुबह हो गई।”
खिड़की से आती हल्की रोशनी देखकर चित्रा ने जल्दी से उठकर खुद को संभाला।
“नहीं... मुझे जल्दी से तैयार होना है। निरंजन ने कल से कुछ भी नहीं खाया है। पहले उनके लिए कुछ बना देती हूँ।”
मन ही मन यही सोचते हुए चित्रा रसोई में चली गई। उसने निरंजन के लिए हल्का-सा गर्मागर्म सूप बनाया। सूप बनाते समय उसकी आँखों में न जाने कितनी बार आँसू आए, जिन्हें वह हर बार अपने हाथ की पीठ से पोंछ देती।
“उन्हें कुछ तो खाना ही होगा... इतनी कमजोरी में दवा भी कैसे लेंगे?”
कुछ देर बाद वह सूप लेकर कमरे में आई।
“निरंजन... उठिए। दवाई खा लीजिए। देखिए, कल भी आपने कुछ नहीं खाया था। कम से कम थोड़ा-सा सूप ही पी लीजिए।”
निरंजन ने धीरे से आँखें खोलीं। चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी।
“चित्रा... मेरा मन नहीं है।”
चित्रा कुछ पल उन्हें देखती रही। उसका गला भर आया, लेकिन उसने अपनी आवाज़ में मजबूती बनाए रखने की कोशिश की।
“मन नहीं है, तो क्या हुआ? मेरी खातिर थोड़ा-सा पी लीजिए। आप जानते हैं न... आपको इस तरह कमजोर देखकर मेरा मन कितना घबरा जाता है।”
निरंजन ने उसकी ओर देखा, मगर कुछ कह नहीं पाए।
तभी बाहर से काकी की आवाज़ आई—
“चित्रा बिटिया... ये ले। बिटवा को ये धागा बाँध दे। भगवान उसकी रक्षा करिहैं।”
काकी ने काँपते हाथों से एक धागा चित्रा की हथेली पर रख दिया।
चित्रा ने उस धागे को देखा तो उसकी आँखें भर आईं।
“जी काकी...”
वह धीरे-धीरे निरंजन के पास बैठ गई। काँपते हाथों से उसने निरंजन की कलाई थामी और वह धागा बाँधने लगी l
धागा बाँधकर चित्रा ने उनकी कलाई को दोनों हाथों से थाम लिया। आँखों से आँसू बह निकले।
निरंजन ने उसकी ओर देखा और धीमे से कहा—
“चित्रा...”
चित्रा ने तुरंत अपने आँसू पोंछ लिए।
“कुछ नहीं... बस आप ठीक हो जाइए। बाकी सब मैं संभाल लूँगी।”
उसकी आवाज़ में एक ऐसा विश्वास था, जिसके पीछे न जाने कितने डर छिपे हुए थे।
“चित्रा, तुम जाकर परी से मिल आओ। मैं थोड़ा आराम कर रहा हूँ। वो बच्ची है... तुम्हें याद कर रही होगी।”
“नहीं निरंजन, मैं आपको छोड़कर नहीं जा सकती। आपकी तबीयत बिल्कुल ठीक नहीं है। ऐसे में मैं आपको अकेला कैसे छोड़ दूँ?”
निरंजन ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,
“मैं आराम ही तो कर रहा हूँ। तुम जाओ... परी तुम्हारा इंतज़ार कर रही होगी।”
“पर निरंजन...”
“कुछ मत कहो, चित्रा। बस थोड़ी देर के लिए जाकर आ जाओ। मेरी चिंता मत करो।”
चित्रा कुछ पल चुपचाप उन्हें देखती रही। मन बिल्कुल नहीं मान रहा था, लेकिन निरंजन की बात भी टाल नहीं सकती थी।
“अच्छा... मैं जाकर तुरंत आती हूँ। आप अपना ध्यान रखिएगा।”
निरंजन ने बस धीरे से सिर हिला दिया।
चित्रा भारी मन से वहाँ से निकल पड़ी। उसके कदम आगे बढ़ रहे थे, लेकिन मन बार-बार पीछे मुड़कर निरंजन के पास लौट जाना चाहता था।
कुछ देर बाद वह डॉक्टर साहब के घर पहुँची। उसने दरवाज़े की घंटी बजाई।
कुछ ही पल बाद डॉक्टर साहब ने दरवाज़ा खोला।
“अरे... चित्रा जी, आप?”
“जी डॉक्टर साहब...”
“कैसी हैं आप?”
चित्रा ने हल्की-सी मुस्कान लाने की कोशिश की, लेकिन चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
“डॉक्टर साहब, माफ़ करिएगा... मैं ज़्यादा देर रुक नहीं पाऊँगी। बस परी से मिलकर चली जाऊँगी। निरंजन की तबीयत बिल्कुल ठीक नहीं है, इसलिए उन्हें अकेला छोड़कर आने का मन नहीं था।”
डॉक्टर साहब ने उसकी चिंता समझते हुए कहा,
“ठीक है चित्रा जी। आप जाइए, परी अपने कमरे में है।”
चित्रा धीरे-धीरे परी के कमरे की ओर बढ़ी।
दरवाज़ा खोलते ही उसकी नज़र परी पर पड़ी और उसके चेहरे पर बरबस मुस्कान आ गई।
“परी मेरी बच्ची... देखो, तुम्हारी मिस आ गई।”
परी ने जैसे ही चित्रा को देखा, उसकी आँखों में खुशी चमक उठी। वह दौड़कर चित्रा के पास आई।
“पर आप कल क्यों नहीं आई थीं?”
चित्रा ने उसे अपने पास खींच लिया और उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोली,
“सब बताऊँगी बेटा... बस अपनी मिस को थोड़ा समय दो। मैं आज तेरे पास ज़्यादा देर रुक नहीं पाऊँगी, लेकिन फिर आऊँगी... पक्का आऊँगी।”
परी ने मासूमियत से पूछा,
“पर आप कल आओगी न? कल मेरा बर्थडे है।”
चित्रा कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसकी आँखों के सामने निरंजन का थका हुआ चेहरा घूम गया। दिल में एक अजीब-सी बेचैनी उठी, लेकिन परी की मासूम आँखों को देखकर वह अपने आँसू रोकते हुए मुस्कुरा दी।
“मैं आपके बिना केक नहीं काटूँगी।”
चित्रा का दिल भर आया। उसने परी को अपने सीने से लगा लिया।
“अरे मेरी गुड़िया का जन्मदिन है... तो भला मैं कैसे नहीं आऊँगी? मैं ज़रूर आऊँगी, मेरी गुड़िया।”
परी खुशी से चित्रा से लिपट गई।
“पक्का मिस?”
चित्रा ने उसके माथे को चूमते हुए कहा,
पक्का...
“अच्छा, अब मैं चलती हूँ। परी को गले लगाकर कहना—मेरी प्यारी गुड़िया, कल मैं कुछ देर के लिए तुमसे मिलने आऊँगी। उसके बाद पूरा समय निरंजन के साथ बिताऊँगी। उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है, मेरे साथ रहकर उन्हें अच्छा लगेगा।”
चित्रा ने परी को प्यार से गले लगाया और उसके माथे पर एक हल्का-सा चुंबन देकर वहाँ से निकल गई।
घर पहुँचते ही उसने कमरे में आते हुए कहा, “मैं आ गई, निरंजन।”
निरंजन ने उसकी ओर देखा और धीमे से मुस्कुरा दिया।
चित्रा उसके पास बैठते हुए बोली, “कल हमारी शादी की सालगिरह है। मैं कल आपकी पसंद का सब कुछ बनाऊँगी। पूरा घर आपकी पसंद के सफेद गुलाबों से सजा दूँगी।”
निरंजन कुछ पल तक उसे देखता रहा। उसकी आँखों में जैसे कई भाव एक साथ उतर आए।
“तुम्हें सच में लगता है कि मैं इतना कुछ पाने के लायक हूँ?” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
चित्रा ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया। “ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?”
निरंजन बस हल्का-सा मुस्कुरा दिया।
चित्रा ने उसके चेहरे की ओर देखते हुए कहा, “आप जल्दी ही ठीक हो जाएँगे, मुझे पता है।”
अगली सुबह निरंजन के उठने से पहले ही चित्रा ने पूरा घर सफेद गुलाबों से सजा दिया। कमरे में हल्की-सी खुशबू फैली हुई थी। सब कुछ वैसा ही था, जैसा निरंजन को पसंद था।
फिर वह उसके लिए चाय लेकर कमरे में पहुँची।
“निरंजन… उठिए।”
निरंजन ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
चित्रा मुस्कुराते हुए बोली, “शादी की सालगिरह मुबारक हो आपको, निरंजन।”
“तुमको भी, चित्रा।”
निरंजन ने धीरे-धीरे कमरे में चारों ओर देखा। सफेद गुलाबों को देखकर उसके चेहरे पर एक भावुक मुस्कान आ गई।
“तुम मेरे लिए इतना कुछ करती हो, चित्रा… मेरी हर छोटी-बड़ी पसंद याद रखती हो। और मैंने तुम्हें कितना परेशान किया है।”
“ऐसा मत कहिए, निरंजन।”
“आज तो तुम्हारी परी का जन्मदिन भी है न…”
यह कहते हुए निरंजन ने उठने की कोशिश की, लेकिन कमजोरी के कारण वह उठ नहीं पाया।
चित्रा तुरंत उसकी मदद के लिए आगे बढ़ी।
“मैं मदद करती हूँ आपकी।”
“नहीं, चित्रा… बाद में चाय पी लूँगा। अभी बस थोड़ा आराम करना चाहता हूँ।”
चित्रा ने चिंतित होकर उसे देखा, फिर धीरे से बोली, “ठीक है। आप आराम कीजिए। मैं बाकी के काम कर लेती हूँ।”
निरंजन ने पलके झपकाकर हामी भर दी।
चित्रा रसोई में चली गई और काम करते हुए मन ही मन सोचने लगी—
“आज सब कुछ आपकी पसंद का बनाऊँगी, निरंजन। आज का दिन आपके लिए यादगार बनाना चाहती हूँ।”
कुछ देर बाद रसोई के बाहर से आवाज़ आई—
“सुन बिटिया…”
“जी, काकी?”
काकी मुस्कुराते हुए बोलीं, “अरे, बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है।”
चित्रा भी मुस्कुरा दी। “हाँ काकी, वो आज हमारी…”
काकी ने उसकी बात पूरी करते हुए कहा, “हाँ-हाँ, हमका पता है। आज हमारी चित्रा और बिटवा की शादी की सालगिरह है।”
चित्रा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
“अच्छा काकी, मैं शाम को थोड़ी देर के लिए परी के पास जाऊँगी। निरंजन के लिए भी कुछ सामान लाना है। मैं जल्दी ही लौट आऊँगी। आप इनके पास ही रहिएगा।”
“हाँ बिटिया, ये भी कोई कहने वाली बात है? तुम निश्चिंत होकर जाओ।”
शाम को तैयार होकर चित्रा निरंजन के पास आई।
“निरंजन, मैं बस अभी आती हूँ। आप ठीक तो हैं न?”
“मैं ठीक हूँ, चित्रा। तुम परेशान मत हो।”
चित्रा ने एक बार फिर उसे ध्यान से देखा और मन ही मन सोचने लगी—
“यहीं से सामान खरीद लेती हूँ और फिर सीधे परी के पास चली जाऊँगी। लौटते समय ज्यादा देर नहीं होगी। मुझे जल्दी से निरंजन के पास वापस आना है।”
उसने निरंजन की पसंद की नीले रंग की शर्ट, उसके पसंद के केसर पेड़े और परी के लिए एक सुंदर-सी गुड़िया खरीदी और फिर सीधे परी के पास पहुँच गई।
घर के बाहर पहुँचते ही उसने घड़ी की ओर देखा।
“कहीं मुझे देर तो नहीं हो गई?”
अंदर पार्टी चल रही थी। बच्चों की हँसी और चहल-पहल से पूरा घर गूँज रहा था।
उधर लता मन ही मन सोच रही थी—
“आज मैं डॉक्टर साहब से अपने मन की बात कहकर ही रहूँगी। पता नहीं फिर ऐसा मौका मिले या न मिले।”
तभी परी की नजर चित्रा पर पड़ी।
“मिस! आप आ गईं!”
चित्रा ने मुस्कुराते हुए हाथ फैलाए।
“हाँ, मेरी गुड़िया! मेरी गुड़िया का जन्मदिन हो और मैं न आऊँ, ऐसा हो सकता है क्या?”
उसने गुड़िया परी के हाथ में देते हुए कहा, “ये लो, मेरी प्यारी गुड़िया के लिए गुड़िया लाई है उसकी मिस।”
परी खुशी से खिल उठी और गुड़िया को सीने से लगा लिया।
डॉक्टर साहब ने चित्रा की ओर देखते हुए कहा, “आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, चित्रा जी।”
तभी लता वहाँ आ गई।
“अरे चित्रा, कैसी है तू?”
“मैं ठीक हूँ, लता। बस परी केक काटने वाली है। उसके बाद मैं निकल रही हूँ। निरंजन की तबीयत भी ठीक नहीं है।”
लता ने सिर हिलाया। “हम्म…”
चित्रा परी को प्यार से अपनी बाँहों में लेकर उसे दुलारने लगी।
लता कुछ दूर खड़ी होकर मन ही मन सोचने लगी—
“आज मैं डॉक्टर साहब से अपने मन की बात बोलकर रहूँगी।”
कुछ देर बाद उसने हिम्मत जुटाई और डॉक्टर साहब के पास जाकर बोली—
“डॉक्टर साहब, मुझे आपसे कुछ कहना है।”
डॉक्टर साहब उसकी ओर देखते हुए बोले, “हाँ लता, कहो।”
लता कुछ कहती, उससे पहले ही मालती वहाँ आ गई।
“डॉक्टर साहब, आपको मिस्टर शर्मा ढूँढ रहे हैं।”
डॉक्टर साहब ने लता की ओर देखा।
“अच्छा लता… मैं तुमसे बाद में मिलता हूँ”
लता ने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर झुका दिया।
“जी, डॉक्टर साहब।”
डॉक्टर साहब मालती के साथ वहाँ से चले गए।
लता उन्हें जाते हुए देखती रही। उसके मन में कही जाने वाली बात फिर से अधूरी रह गई।
वहीं दूसरी ओर चित्रा ने घड़ी की ओर देखा। उसके चेहरे पर अचानक चिंता उभर आई।
“अब मुझे चलना चाहिए… पता नहीं निरंजन इस समय कैसे होंगे।”
चित्रा ने इधर-उधर देखते हुए परी को ढूँढ़ा।
“अरे, परी कहाँ गई? बस उससे मिलकर जल्दी से निकलती हूँ।”
वह परी को ढूँढ़ते हुए घर के दूसरे हिस्से की ओर चली गई।
उधर लता ने देखा कि डॉक्टर साहब इस समय अकेले हैं। उसने मन ही मन सोचा—
“अभी डॉक्टर साहब अकेले हैं… अब जाकर उनसे अपने मन की बात कह देती हूँ।”
वह हिम्मत जुटाकर डॉक्टर साहब के पास पहुँची।
“डॉक्टर साहब, मुझे आपसे कुछ कहना है।”
डॉक्टर साहब ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “हाँ लता, बोलो। अब मैं कहीं नहीं जा रहा।”
लता कुछ कहने की कोशिश करती रही।
“डॉक्टर साहब… वो… मैं… ये…”
डॉक्टर साहब ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ लता, बोलो। जो कहना है, बेझिझक कहो।”
लता ने गहरी साँस ली। उसने अपने मन की बात कहने के लिए बहुत हिम्मत जुटाई थी।
उसी समय चित्रा परी को ढूँढ़ते हुए वहीं आ पहुँची। लेकिन डॉक्टर साहब और लता, दोनों का ध्यान अभी उसकी ओर नहीं गया था। चित्रा भी उन्हें देखकर वहीं कुछ दूरी पर रुक गई।
लता ने आखिरकार अपनी सारी हिम्मत समेटकर कहा—
“डॉक्टर साहब… मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ।”
डॉक्टर साहब एक पल के लिए स्तब्ध रह गए।
“क्या कह रही हो, लता?”
लता की आँखों में भाव थे, लेकिन आवाज़ में पूरा विश्वास।
“हाँ डॉक्टर साहब… यही सच है। बहुत दिनों से मेरे मन में ये बात थी। आज न जाने कैसे हिम्मत करके आपसे कह पा रही हूँ।”
डॉक्टर साहब कुछ पल चुप रहे। फिर गंभीर होकर बोले—
“लता, मुझे माफ कर दो। तुम बहुत अच्छी हो, लेकिन मैं तुमसे प्यार नहीं करता।”
लता की आँखें भर आईं।
डॉक्टर साहब ने धीरे से कहा—
“मैं… चित्रा जी से प्यार करता हूँ।”
यह सुनते ही लता की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द जैसे गले में ही अटक गए।
“लता, मेरी बात सुनो…”
लेकिन लता बिना कुछ कहे वहाँ से चली गई।
“लता… रुको, मेरी बात तो सुनो।”
तभी डॉक्टर साहब की नजर सामने खड़ी चित्रा पर पड़ी।
वह अचानक ठिठक गए।
“चित्रा जी… आप?”
चित्रा की आँखों में हैरानी और निराशा दोनों थीं।
“डॉक्टर साहब… मुझे आपसे ये उम्मीद नहीं थी। मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ और आप…”
“चित्रा जी, मेरी बात सुनिए…”
“नहीं डॉक्टर साहब,” चित्रा ने उनकी बात बीच में ही रोक दी, “आपने जो कहा, मैंने सब सुन लिया।”
डॉक्टर साहब कुछ पल चुप रहे। फिर धीरे से बोले—
“चित्रा जी, मैं आपसे इस तरह ये बात कहना नहीं चाहता था। लेकिन सच यही है। पता नहीं कब आपसे प्यार हो गया… आपकी सादगी से, दूसरों के लिए आपकी परवाह से… आपकी हर छोटी-सी बात न जाने कब मेरे दिल में जगह बना गई। मुझे खुद पता नहीं चला।”
चित्रा ने उनकी ओर देखा। उसकी आँखों में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक गहरी असहजता थी।
अपने
“लेकिन मैं आपको साफ-साफ बता रही हूँ, डॉक्टर साहब… मैं सिर्फ अपने निरंजन से प्यार करती हूँ।”
इतना कहकर चित्रा वहाँ से जाने लगी।
“चित्रा जी, मेरी बात तो सुनिए…”
चित्रा ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा और वहाँ से चली गई।
तभी अचानक फोन की घंटी बज उठी।
डॉक्टर साहब ने फोन उठाया।
“हाँ?”
दूसरी ओर से कुछ सुनकर उनके चेहरे के भाव तुरंत बदल गए।
“मालती… मालती, अस्पताल में इमरजेंसी है। मैं बस अभी आता हूँ। तुम परी का ध्यान रखना।”
“जी, डॉक्टर साहब।”
डॉक्टर साहब जल्दी से वहाँ से निकल गए, लेकिन उनके मन में चित्रा की कही हुई बात बार-बार गूँज रही थी—
“मैं सिर्फ निरंजन से प्यार करती हूँ।”
उधर चित्रा के दिमाग में बार-बार डॉक्टर साहब की बातें घूम रही थीं।
“मुझे आपसे इस तरह ये बात नहीं कहनी चाहिए थी… पता नहीं कब आपसे प्यार हो गया…”
चित्रा गहरी सोच में डूबी सड़क पर आगे बढ़ती जा रही थी। उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी।
“मैंने आपके लिए ऐसा कभी नहीं सोचा था, डॉक्टर साहब… मैं तो आपको हमेशा सिर्फ एक अच्छे इंसान और निरंजन के डॉक्टर के रूप में देखती आई हूँ।”
“अरे, बहुत देर हो गई! निरंजन मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।”
वह कदम तेज कर देती है।
घर के पास पहुँचते ही उसे काकी दिखाई देती हैं।
“काकी, आप यहाँ?”
काकी घबराई हुई थीं।
“हाँ बिटिया… हम तुमका ही बुलावे जा रहे रहे।”
“क्या हुआ काकी?”
काकी की आवाज़ काँप रही थी।
“बिटिया… निरंजन बिटवा की तबीयत बहुत खराब हो गई है।”
चित्रा का चेहरा अचानक उतर गया।
“क्या कह रही हैं, काकी?”
“हाँ बिटिया… तुम जल्दी चलो।”
चित्रा बिना कुछ पूछे घर की ओर दौड़ पड़ी।
घर के अंदर पहुँचते ही उसके पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई।
“निरंजन!”
निरंजन बिस्तर के पास फर्श पर गिरे हुए थे।
“निरंजन… निरंजन, क्या हुआ आपको?”
चित्रा तुरंत उनके पास बैठ गई। उसने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया।
“आँखें खोलिए… देखिए, मैं आ गई हूँ।”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“ये देखिए… मैं आपके लिए आपकी पसंद की चीज़ें लेकर आई हूँ। आपकी पसंद के केसर पेड़े भी हैं… और वो नीली शर्ट भी, जो आपको बहुत पसंद है।”
चित्रा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“आप ऐसा नहीं कर सकते मेरे साथ… आज हमारी शादी की सालगिरह है। आपने कहा था न कि हम साथ बैठेंगे…”
निरंजन ने बड़ी मुश्किल से आँखें खोलीं।
“चित्रा… मेरी बात सुनो…”
“हाँ, बोलिए।”
“मेरे पास… ज्यादा समय नहीं है।”
“ऐसा मत बोलिए आप।”
चित्रा ने उनके चेहरे को दोनों हाथों से थाम लिया।
आपको कुछ नहीं होगा। मैं हूँ न आपके पास l
निरंजन ने उसे देखते हुए बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“चित्रा… मुझे माफ कर दो।”
“कुछ मत बोलिए, निरंजन। बस आराम कीजिए।”
निरंजन कुछ पल तक चित्रा को देखते रहे। उनकी आँखों में जैसे बहुत कुछ था, जिसे वे शब्दों में नहीं कह पा रहे थे।
चित्रा लगातार बोलती रही—
“निरंजन… कुछ तो बोलिए। मेरी तरफ देखिए… देखिए न, मैं आपके पास हूँ।”
लेकिन अब निरंजन की आँखें स्थिर हो चुकी थीं।
“निरंजन…?”
चित्रा ने उन्हें हल्के से हिलाया।
“निरंजन… उठिए न…”
कोई जवाब नहीं आया।
चित्रा की आवाज़ अचानक चीख में बदल गई।
“काकी! देखिए न… इन्हें क्या हुआ?”
काकी दौड़कर आईं।
“बिटिया…”
चित्रा घबराकर बोली—
“मैं डॉक्टर साहब को बुलाकर लाती हूँ। आप इनका ध्यान रखिए।”
“बिटिया, सुन तो…”
लेकिन चित्रा कुछ सुनने की हालत में नहीं थी।
वह नंगे पैर ही घर से निकल पड़ी।
“डॉक्टर साहब… डॉक्टर साहब उन्हें बचा लीजिए…”
उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे और वह बिना रुके डॉक्टर साहब के घर की ओर दौड़ती जा रही थी।
लेकिन जैसे ही वह डॉक्टर साहब के घर के पास पहुँची, उसके कदम अचानक रुक गए।
घर के बाहर लोगों की भीड़ लगी थी।
“डॉक्टर साहब! डॉक्टर साहब…”
चित्रा ने भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ने की कोशिश की।
कुछ लोग आपस में धीमी आवाज़ में बात कर रहे थे।
“बेचारे बहुत भले आदमी थे…”
“पहाड़ी मोड़ पर बहुत बुरा हादसा हुआ है।”
“किसी का बचना मुश्किल था…”
“डॉक्टर साहब तो बहुत अच्छे इंसान थे। छोटी-सी बच्ची थी उनकी… भगवान इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?”
चित्रा के कानों में जैसे सब कुछ धीरे-धीरे पड़ रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि लोग क्या कह रहे हैं।
फिर उसकी नजर आँगन की ओर गई।
वहाँ सफेद चादर से ढका डॉक्टर साहब का पार्थिव शरीर रखा था।
चित्रा कुछ पल के लिए बिल्कुल जड़ हो गई।
“नहीं…”
उसके होंठों से बस इतना ही निकला।
तभी परी दौड़ती हुई आई और चित्रा के पैरों से लिपट गई।
“मिस…”
चित्रा नीचे बैठ गई।
परी रोते हुए बोली—
“मिस, पापा कुछ नहीं बोल रहे हैं। आप उनको उठाओ ना… प्लीज़। वो मेरी बात भी नहीं सुन रहे।”
चित्रा के पास उसे जवाब देने के लिए कोई शब्द नहीं थे।
उसने परी को अपने सीने से लगा लिया।
एक तरफ उसका निरंजन था, जो उससे हमेशा के लिए दूर हो चुका था…
और दूसरी तरफ उसके सामने एक छोटी-सी बच्ची थी, जिसकी दुनिया भी उसी पल उजड़ गई थी।
परी चित्रा से लिपटकर रो रही थी।
“मिस… पापा उठ क्यों नहीं रहे?”
चित्रा ने उसे और कसकर अपने सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
आज ही तो उसने सोचा था कि वह निरंजन के साथ अपनी शादी की सालगिरह मनाएगी। उसकी पसंद की चीज़ें बनाएगी, सफेद गुलाबों से घर सजाएगी…
लेकिन जिंदगी ने कुछ ही घंटों में उसके सामने सब कुछ बदल दिया था।
एक ओर उसका अपना संसार टूट चुका था और दूसरी ओर एक मासूम बच्ची उसे अपनी पूरी दुनिया समझकर उसके सीने से लगी हुई थी।
चित्रा ने परी के सिर पर हाथ फेरते हुए आँखें बंद कर लीं।
शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि आने वाला समय उससे क्या माँगने वाला है।
लेकिन उस पल परी की मासूम बाँहें उससे जैसे यही कह रही थीं कि अब उसे सिर्फ अपने लिए नहीं जीना है।
जैसे ईश्वर ने उसके जीवन से बहुत कुछ छीनकर उसके सामने एक नया उत्तरदायित्व रख दिया हो।
चित्रा ने आँसू पोंछे और परी को अपने सीने से लगाए रखा।
उसकी अपनी दुनिया भले ही बिखर गई थी, लेकिन अब उसे इस छोटी-सी बच्ची की बिखरती दुनिया को संभालना था।
शायद यही था उसका नया उत्तरदायित्व।
