Ramswaroop Chaturvedi

Inspirational


4.5  

Ramswaroop Chaturvedi

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उल्ली की मजार

उल्ली की मजार

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दीना धोवी की पत्नी रजिया बड़े चिन्तित भाव से अपने बेटे कल्लू से बोली, बेटा दिन छिप गया लेकिन अभी तक तेरे पिताजी नहीं आये। रोजाना तो वे दिन से ही घर लौट आते थे, क्या बात है ?

कल्लू उनका इकलौता बेटा था। कल्लू की उम्र लगभग पंद्रह साल थी। घर में केवल तीन ही व्यक्ति थे और चौथी प्राणी थी उनकी एक गधैया, जिसे वे उल्ली कह कर पुकारते थे।उल्ली उनके लिए बहुत उपयोगी और महत्वपूर्ण थी। दीना धोवी सुबह ही खाना खा कर, उल्ली की पीठ पर नये कपड़ों की दो तीन गठरिया रखता और आस पास के गांवों में बेचने चला जाताऔर शाम को दिन छिपने से पहले वापस घर लौट आता।लगभग आठ दस बर्षों से उसकी यही दिनचर्या चली आ रही थी। इससे पहले वह स्वयं एक गठरी कपड़े लेकर आस पास के गांवों में बेचने जाता जिससे थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती और गरीबी में ही जिंदगी कट रही थी। गांव से दो कोस दूर पठान बाबा की मजार थी, वह अक्सर दोपहर में वहीं विश्राम करता था।पठान बाबा की मजार का खादिम मियां अमरदीन पठान, दीना धोवी से बहुत प्रशन्न रहता था क्योंकि दोपहर में जब दीना धोवी वहां विश्राम के लिए आता था तो इधर उधर झाडू भी लगा देता था और कभी कभी श्रद्धा वश मजार पर रुपए दो रुपए भी चंढा दिया करता था।

आठ दस साल पहले एक दिन मियां अमरदीन ने दीना की सेवा से प्रसन्न होकर उल्ली नाम की गधैया मुफ्त में दे दी थी।इसका एक कारण यह भी था कि मियां अमरदीन के दीना की पत्नी रजिया से नाजायज संबंध थे। मियां अमरदीन के प्रभाव में आ कर दीना ने हिन्दू धर्म छोड़ कर इस्लाम अपना लिया था और दीना से दीन मौहम्मद हो गया था लेकिन इलाके में सब उसे दीना ही पुकारते थे।जब वह हिन्दू था तब भी वह हिन्दू धर्म के बारे में कुछ नहीं जानता था और अब मजहब बदलने के बाद इस्लाम के बारे में भी कुछ नहीं जानता है लेकिन दोनों मियां बीबी अमरदीन के पक्के भक्त हैं।उल्ली गधैया मिलने पर दीना को शारीरिक आराम तो मिला ही है साथ ही आमदनी भी दुगुनी चौगुनी हो गई है क्योंकि पहले तो वह एक छोटी सी गठरी अपने कंधे पर रख कर कपड़े बेचने जाता था लेकिन अब तो तीन चार गठरिया कपड़े, उल्ली की पीठ पर रख कर दूर तक बेचने जाता है और कभी कभी तो उल्ली पर सवारी भी कर लेता है।

दीना की आमदनी बढ़ने से अब उसकी गरीबी दूर हो गयी है और वह इसे अल्ला की रहमत मानता है। दीना की टूटी झोपड़ी अब पक्के मकान में तब्दील हो चुकी है । आज अचानक समय पर घर नहीं लौटने के कारण रजिया चिन्तित हो जाती है और बार बार घर के दरवाजे की ओर देखती है। बहुत देर हो चुकी है कल्लू बेटा तेरे पिताजी नहीं आये, हमें उन्हें ढूंढने चलना चाहिए। रजिया ने कल्लू को पास बुलाकर चिन्तित भाव से कहा।

अभी तक रजिया उर्दू शब्दों का इस्तेमाल करना नहीं सीखी है, वे तीनों बचपन की आदत के कारण हिंदी शब्द ही बोलते हैं। कल्लू कभी कभी अब्बा जान कहने की कोशिश करता है।

दोनों मां बेटे टार्च लेकर दीना को ढूंढने निकल पड़ते हैं । ढूंढते ढूंढते उन्हें लगभग एक घंटा हो गया था और मां बेटे की चिंता बढ़ती जा रही थी आखिर उन्होंने दिशा बदली और पश्चिम दिशा की तरफ ढूंढने चल पड़े। अंधेरी रात में ढूंढते ढूंढते दो बज गए। कल्लू ने जोर से आवाज लगा कर पिता जी को पुकारा तो कुछ दूरी पर दीना की रुंआसी आवाज सुनाई दी। दोनों मां बेटे चल कर दीना के पास पंहुचे तो क्या देखते हैं कि दीना सिर पकड़ कर बैठा है, पास में उल्ली गधैया मरी पड़ी है और एक तरफ कपड़ों की दो गठरिया पड़ी हैं।

पास पहुंच कर जब दोनों ने यह दृश्य देखा तो रजिया और कल्लू दोनों भी रोने लगे।

वास्तव में उल्ली उनके लिए एक वरदान थी।जब से वह इस घर में आई थी तभी से उनके दिना फिरने लगे थे। वे उल्ली को बहुत प्यार करते थे।

लेकिन यह सब कैसे हुआ, रजिया ने रोते हुए दीना से पूछा।

दीना उल्ली की ओर देखकर कहने लगा कि शाम को लौटते वक्त यह कुछ अनमनी सी थी, धीरे धीरे चल रही थी। मैंने सोचा कि शायद भूखी-प्यासी है इसलिए मैं सुस्ताने के लिए सड़क के किनारे इस तरफ़ आ गया। मैं कपड़ों की गठरियों को उतारता इससे पहले ही यह ठोकर खाकर गिर गई। मैंने इसे संभाला, और गठरियों को एक तरफ पटका।इसके पैर में भी मोच आगयी थी और सांसें जोर जोर से चल रही थीं। मैं पानी लेने पास के कुये पर पहुंचा और एक बाल्टी भर कर पानी लाया। मैंने इसे पानी पिलाने की कोशिश की परंतु तब तक इसके प्राण-पखेरु उड़ गए। रजिया मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि यह सब कैसे हो गया। दीना ने रोते हुए कहा।उल्ली ने अपना पूरा जीवन हमारी सेवा में लगा दिया था।हम इसके ऋणी हैं।

तीनों प्राणी फफक-फफक कर रोने लगे।देखो जो होना था वो हो गया, लेकिन अब हम इसे ऐसे ही नहीं छोड़ सकते, इसकी लाश को जानवर क्षत विक्षत करेंगे इसलिए इसको किसी गड्ढे में दफना

देना चाहिए, रजिया ने ढांढस बंधाते हुए कहा।

दीना खड़ा हुआ और पास के कुये पर से फाबडा लेकर आया तथा सड़क किनारे से चंद फीट दूर गड्ढा खोदने लगा।जब गड्ढा खुद कर तैयार हो गया तो तीनों ने उल्ली गधैया को उसमें सरका दिया और मिट्टी डालकर उसपर एक लम्बा सा मिट्टी का ढेर कर दिया। बाल्टी के पानी को उस पर छिड़क कर फाबडे से थाप दिया। ऐसा लगा जैसे कि कोई कच्ची मिट्टी की मजार हो।

मायूसी हालत में दीना ने एक गठरी को खोला और उसमें से एक चादर नुमा नीले कपड़े को निकाल कर उल्ली के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उस मिट्टी के ढेर पर डाल दिया।यह सब करते हुए सुवह के छः बजने को आ गये। उजाला हो गया था। तीनों वापस घर लौटने को तैयार हो गये। अंतिम बार तीनों उस मिट्टी के ढेर के पास बैठ कर आंसू वहा रहे थे। रजिया अब क्या होगा। कैसे मैं इतनी बड़ी बोझिल गठरी को कंधे पर रख कर दूर दूर तक बेचने जा सकूंगा। अब तो पहले जैसी ताकत भी नहीं है शरीर में। दीना ने रुआंसे होते हुए कहा। अल्ला सब ठीक करेगा, रजिया ने ढांढस बंधाया।

इतने में एक कार सड़क से गुजरी, कार वाले ने इन की तरफ देखा और सोचा कि शायद ये किसी पंहुचे हुए फकीर की मजार है और उसने कार की रफ़्तार धीमी की तथा एक पचास का नोट उस नीले कपड़े पर फेंक कर चला गया। वे तीनों ही विस्मय से यह सब देखने लगे। तभी एक और कार आई और उसमें से भी दो व्यक्तियों ने सौ, सौ, के दो नोट नीले कपड़े पर फेंके, और चले गए। तीनों ही एक टक यह सब देख रहे थे और धीरे-धीरे माजरा भी समझने लगे। रजिया ऐसा लगता है कि उल्ली हमें छोड़ कर कहीं गई नहीं है और ये मरी हुई भी हमारा पालन-पोषण करेगी।जरा इधर तो आ। और वे तीनों आपस में कानाफूसी करने लगे। दीना और रजिया दोनों को ही यह अनुभव था कि पठान बाबा की मजार पर किस तरह भारी चंढावा आता है, बर्षों से दोनों देखते आ रहे थे। दोनों ने मिलकर योजना बनाई और कल्लू से कहा कि जा दो बाल्टी पानी ला। कल्लू तुरंत पानी ले कर आ गया। रजिया ने तुरत फुरत में उस मिट्टी के ढेर को सही करकें लीप दिया और एक मजार का रूप दे दिया जब तक कल्लू और दीना ने उस मजार के आस पास अच्छी तरह से सफाई कर दी। दीना ने एक और कपडा निकाल कर मजार के पास बिछाकर बैठ गये। कल्लू और रजिया को घर भेज दिया और वे दोनों भोजन आदि करकें लगभग तीन चार घंटे में वापस जब मजार पर पहुंचे तो साथ में दीना को भोजन लाये थे और कुछ अगरबत्ती के पाकिट, मोरपंखों की मोरछली, मिट्टी के बर्तन में आग, और एक विशेष प्रकार की धूप, जो कि पठान बाबा की मजार पर उपयोग में लाई जाती है, ये सब साथ ले कर आये थे।

रजिया ने आते ही इधर उधर देखा और चुपके से दस बीस, दस-दस के नोट नीली चादर पर डाल दिये, जिससे ऐसा लगे कि बहुत से लोगों ने आ कर चंढावा चंढाया है।

धीरे-धीरे दिन बीतते गए और उल्ली की मजार प्रसिद्ध होती गई।खूब चंढावा चंढाया जाने लगा। रमजान के महीने में बहुत बड़ा मेला भरने लगा। हजारों की संख्या में हिन्दू श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी। रजिया बड़े गर्व से, मजार की ओर इशारा करते हुए कहती है कि अल्ला कसम हमारे तो इसकी कृपा से ही दिना फिरे हैं। बड़े बड़े घरानों के पढ़ें लिखे हिन्दू मनौती मानते हैं और अपनी मुराद पूरी होने पर मजार पर चादर भी चंढाते हैं।उल्ली शब्द का अपभ्रंश होकर अब औलिया हो गया है और औलिया बाबा की मजार के नाम से यह स्थान काफी प्रसिद्ध हो गया है।

कल्लू अब बड़ा हो गया है और वह औलिया बाबा की मजार पर खादिम है।आस पास हिन्दुओं में चर्चा है कि औलिया बाबा बहुत बड़े दरवेश हुए थे।उनका आशीर्वाद कभी खाली नहीं गया।वो जो कह देते थे वही होता था।

शुक्रवार का दिन था, औलिया बाबा की मजार पर हिन्दुओं की भारी भीड़ थी तभी एक कार आकर रुकी और उसमें से मियां अमरदीन पठान उतरे।

रजिया की नजर उस पर पड़ी तो मुस्कुरा कर बोली, आइये आइये पठान साहब बहुत दिनों में मुलाकात हो रही है। अमरदीन ने मुस्कुराते हुए पूछा कि दीना कहां है।तब तक दीना भी आ गया और अमरदीन की कदमवोसी की। विस्मय से देखते हुए अमरदीन पठान ने कहा, बड़े ठाठ हो गये हैं रजिया, क्या बात है ?

रजिया और दीना ने कहा कि ये सब आपकी मेहरबानी का नतीजा है।आपकी दी हुई उल्ली गधैया ने जीते जी, भी खूब कमाया और अब मरी हुई भी खूब कमा रही है। रजिया और दीना ने फिर पूरी घटना सुनाई। सुनकर अमरदीन पठान खूब हंसा और बोला, जानते हो दीना ? जिस पठान बाबा की मजार पर मैं रहता हूं, वह कौन है ? कौन की मजार है पठान साहब , दीना और रजिया ने उत्सुकता से पूछा।वह मजार भी इस उल्ली गधैया की मां की है। अमरदीन ने ठहाका लगाते हुए कहा। मैं पठान हूं, मैंने मजार बनबाई है इसलिए वह पठान बाबा की मजार कहलाई।

देख दीना तेने मजहब बदल लिया, बहुत अच्छा किया। ये हिन्दू लोग बिल्कुल मूर्ख और अंधविश्वासी होते हैं। इन्हें अपने धर्म और संस्कृति का कुछ भी ज्ञान नहीं है क्योंकि ये सदियों से गुलामी सहते आये हैं।आज भी इनकी मानसिकता गुलामी की है। एक पढ़ा लिखा हिन्दू आफीसर, तेरी उल्ली गधैया को ढोकने आता है।

आज हिन्दुस्तान में कितनी मजार और दरगाह हैं, सब हिन्दुओं के सहयोग से ही फल फूल रहीं हैं। जितने भी मुस्लिम योद्धा हिन्दू वीरों से युद्ध करते हुए मारे गए, अधिकांशत उनकी मजार बना दी गई।उन मुस्लिम योद्धाओं ने इनके पूर्वज मारे तथा औरतों के साथ वलात्कार किया और अब ये साले काफिर उन्हीं को बड़ी श्रद्धा से पूजते हैं।

हमारे पूर्वज पाकिस्तान नहीं गये, ये उन्होंने बड़ी समझदारी का काम किया है। क्या रखा है पाकिस्तान में ? अरे यहां हिन्दुस्तान में हिन्दुओं को मूर्ख बनाओ और मौज करो।भारत में हिन्दू संगठित नहीं हो सकते लेकिन हम संगठित हैं और बड़ी शान से रहते हैं। ठीक कहते हो पठान साहब, दीना ने कहा।

उल्ली की मजार अर्थात औलिया बाबा की मजार पर आये दिन भीड़ बढ़ती जा रही है। बहुत से नेता चुनाव जीतने के बाद इस मजार पर चादर चढ़ाने बड़े लाव लश्कर के साथ जाते हैं जिससे इस स्थान की महिमा और बढ़ती जाती है।

आप भी अपनी मुराद पूरी करने के लिए औलिया बाबा की मजार पर जा सकते हैं। आजमगढ़ से 15 किलोमीटर दूर यह प्रसिद्ध स्थान है।

दीना बिल्कुल बुड्ढा हो चुका है, बतौर खादिम आपको कल्लू मिलेगा, जिसका नाम आजकल कलमुद्दीन है। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

आपकी यात्रा शुभ हो। और आपकी मुराद पूरी हो। यात्रा से वापस लौट कर आओ तो अपने अनुभव मुझे अवश्य बताना।

जय राम जी की।


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