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Amrita Pandey

Inspirational


4.6  

Amrita Pandey

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तुमसा कोई नहीं

तुमसा कोई नहीं

4 mins 320 4 mins 320

आज मान्या बहुत खुश थी। फेसबुक में एक पुरानी सहेली की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई थी। उसने प्रारंभिक जांच पड़ताल के बाद आश्वस्त होने पर स्वीकार कर ली। फोन नंबर का आदान-प्रदान हुआ। फिर शुरू हुआ निरंतर बातों का सिलसिला। यह संयोग ही था कि प्रीति भी उसी शहर में रहती थी लेकिन पहले ना कभी मुलाकात हुई और ना ही कभी इस बात का पता चला। दोनों बचपन की अच्छी सहेलियां थी। कुछ देर फोन पर बात हुई। प्रीति कामकाजी थी अतः थोड़ा ज्यादा व्यस्त...।


फोन रखने के बाद मान्या न जाने क्यों उदास हो गई। आज उसे अपने सुख वैभव सब गौण प्रतीत हो रहे थे। पिछली सारी यादें एक एक कर तस्वीर की तरह उसके सामने उभर रही थीं। वह भी अच्छी पढ़ी लिखी थी। शादी से पहले नौकरी करती थी। यूं कहना चाहिए कि सर्वगुण संपन्न थी। विवाह हुआ और पति दूसरे शहर में सरकारी विभाग में बड़े अफसर थे अतः मिलजुल कर यही फैसला लिया गया कि मान्या कुछ समय बाद फिर कोई दूसरी नौकरी नीलेश के शहर में ही देख लेगी। और बस फिर समय बीतता रहा। निलेश भी मान्या में आए इस परिवर्तन को कुछ दिनों से महसूस कर रहा था परंतु कुछ बोला नहीं।

कुछ दिनों के बाद, नीलेश ऑफिस गया हुआ था। घर में अकेली मान्या फिर पुरानी यादों के ताने-बाने में उलझी हुई थी। तभी डोर बेल बजी। दरवाजा खोला तो सामने प्रीति खड़ी थी। बिंदास स्वर में 'सरप्राइज' बोलकर वह मान्या के गले लग गई। दोनों अंदर बैठे। बातों का सिलसिला शुरू हुआ। चूंकि दोनों बहुत ही प्रगाढ़ मित्र रही थीं अतः सहज होने में दोनों को ज्यादा वक्त ना लगा। शादी, परिवार, बच्चे सब से गुजरते हुए बातों का सिलसिला निजी जीवन तक आ पहुंचा। मान्या कुछ अंतर्मुखी थी जबकि प्रीति बहिर्मुखी।


बातों का सिलसिला आगे बताते हुए प्रीति ने बताया कि वह घर ऑफिस दोनों संभालती है पर पति से घर के किसी भी काम में मदद की उम्मीद नहीं कर सकती। परिवार के साथ घूमना फिरना भी उन्हें ज्यादा पसंद नहीं है। अच्छा पैसा कमाती है लेकिन यदि अपने किसी शौक पर पैसा खर्च करें तो राहुल को यह फिजूलखर्ची लगता है। चाह कर भी वह अपने मायके में किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं कर सकती क्योंकि राहुल को यह नागवार गुजरता है। किसी जमाने में सुंदर सी दिखने वाली और चुलबुली प्रिया की आंखों के नीचे गहरी कालिमा उसकी उदासी को अनकहे भी बयां कर रही थी।

भारतीय समाज में नारी की यह विवशता है कि वह विवाह बंधन को बचाए रखना चाहती है। कितना ही कटु रिश्ता क्यों ना हो, टूटने पर दर्द होता है उसे। वह आखिरी क्षण तक प्रयास जारी रखती है इस बंधन को बचाने का।

‌ इन्हीं बातों में काफी समय बीत गया। अचानक प्रीति ने घड़ी देखी और बोली, "मान्या तेरे साथ बात करते हुए समय का पता ही नहीं चला। अब मुझे घर जाना होगा। राहुल के भी आने का वक्त हो जाएगा। मुझे घर पहुंचने में अगर देर हो जाए तो वह काफी नाराज हो जाते हैं।"


प्रीति के जाने के बाद मान्या की सारी गलतफहमी दूर हो गई। उसे महसूस हुआ कि वह कितनी खुशनसीब है। उसे एक समझदार और सुलझा सुधा पति मिला है। वह तो ऑफिस भी नहीं जाती, फिर भी नीलेश ऑफिस से लौटकर उसके साथ रसोई में हाथ बंटाता है और वहीं खड़े रहकर उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देता। कभी छुट्टी के दिन नाश्ता भी बना देता है। अगर वह कहीं घूमने फिरने को कहे तो अपने व्यस्त रुटीन से समय भी निकाल लेता है।

रही बात आर्थिक रूप से निर्भर होने की तो नीलेश अच्छी तरह जानता था कि पहले मान्या के पास भी अपना वेतन होता था, जिसे वह अपने मनमाफिक खर्च कर सकती थी। उसने मान्या को कभी इस बात का एहसास होने ही नहीं दिया कि वह नीलेश पर निर्भर है। मान्या का जन्मदिन भी वह कई दिनों पहले से याद रखता था। उसके घरवालों को भी भरपूर इज्जत देता था। हां उसे पढ़ने लिखने का शौक ज्यादा था तो क्या हुआ...? मान्या ही तो चाहती थी कि उसे धीर, गंभीर और अकादमिक अभिरुचि वाला जीवन साथी मिले। हर विषय पर उसका मंझा हुवा ज्ञान देखकर कई बार मान्या आश्चर्यचकित हो जाती थी कि एक व्यक्ति इतने सारे विषयों में कैसे पारंगत हो सकता है...?


यहां सोचते सोचते एक निश्चल मुस्कान फैल जाती है उसके चेहरे पर। वह बोल उठती है ....."नीलेश तुमसा कोई नहीं।" आज अपने वैवाहिक जीवन, अपनी इस प्रेम गाथा पर गर्व हो रहा था उसे जिसमें 'आई लव यू' जैसे शब्द बेसक नहीं थे पर प्यार की ऊष्मा थी, विश्वास था, हरदम हाथ थामने वाला एक साथी था। बेसब्री से नीलेश के आने का इंतजार करते हुए वह गुनगुना रही थी...... मुझे तुम मिल गए हमदम, सहारा हो तो ऐसा हो....।



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