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सफर मे साथी कौन?

सफर मे साथी कौन?

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तू मेरा जानी है मैं तेरा दिलबर.... बन्द करो गाना दिखता नहीं मैं फोन पे बात कर रहा हूं। तू मेरा............! हैलो समीर कैसा है मेरे यार?
ठीक हूं तू बता कहाँ पहुचाँ ?
अभी अमानी से निकला हूं २ घण्टे लग जायेगे चमनपुर पहुंचने में, यार बहुत बोरिंग सफर है और गाड़ी की चाल माशल्लाह।
क्युं कोई कम्पनी नहीं मिली क्या?
कम्पनी! यहाँ तो ऐसे ऐसे लोग बैठे हैं क्या बताऊँ । एक चचा है मुंह सिकोड कर ऐसे बात करते है जैसे कोई राग अलापने जा रहे हों ऊपर से उनकी बार बार पान की पिचकारियाँ जो सड़क का पर यूं गिरती जैसे बारिश की छीटें।
तीन औरतें जो बाते कर रहीं हैं या लड रही हैं पता ही नहीं चलता, हां एक लड़की है जो खिड़की से बाहर के नजारे देख रही है कमाल की दिख रही पर सूरत नहीं देख पा रहा हूं।
सुनों! आप सफर पे हैं और सफर के साथी हम अनजान मुसाफ़िर होते है हमारे साथ दौड़ते यह खूबसूरत नजारे होते है अगर तुमने इनके साथ दोस्ती नहीं की इनसे मिले नहीं तो फिर सफर कैसा!
अपने हुस्न का दीदार कराते हुए वह लड़की बोली उसे देखा तो दोस्त अनदेखा हो गया मैं फौरन फोन काटकर उसे देखने लगा ।
वह अपने बाल सही कर रही थी जो हवा ने उसके चेहरे पे बिखेर दिए थे
आप भी चमनपुर जा रहीं हैं? मैंने पूछा
नहीं मैं विक्रमपुर जा रहीं हूं वहाँ मेरे 
नाना रहते है। 
मैं चमनपुर जा रहा हूं वहां मेरा दोस्त रहता है कुछ दिन उसके साथ  घूमने जाऊँगा।
हां बेटा खूब घूमना चाहिए सेहत और मन दोनों तंदुरुस्त रहते हैं।
पिच्च! पिच्च! हम तो कहते है घूमोंगे तो सबको जानोगे कौन क्या कर रहा है? कहाँ क्या है?
चचा मुझको खुद में शामिल करने लगे थे लेकिन मेरी नजर तो उन लबों पे टिके हुए थे जिसने सफर का मतलब सिखाया था।
आपका नाम भी तुम्हारे जैसा ही खूबसूरत होगा?
हां, ऊर्वसी। बहुत प्यारा नाम है
आपका ?
आलम।
मैं दिल्ली में रहकर स्नातक कर रहा हूँ मुझे कविता, कहानियाँ लिखने का शौक है जिसके लिए घूमता रहता हूँ प्रकृति की खूबसूरती उसके अल्हड़ मिजाज को चुराकर अपनी दुनिया में लाना और कागज मे उकेरना काम है मेरा।

बहुत अच्छा! मैं भी स्नातक कर रहीं हूं लोगों की मदद करना और फिल्मी गाने 
अपनी आवाज में गाना शौक है मेरा।
तब तो आपसे एक आरजू है अपने बैग से एक कागज जिस पर मेरी एक ग़ज़ल लिखी हुई थी देते हुए बोला।
इन बेजुंबान शब्दों को आवाज दे दीजिए
शायद जान आ जाएं
मैं?
हां मना मत करना
कोशिश करती हूं 
न दुनिया का मोह न जन्नत की आरज़ू
हूँ मैं आवारा न कोई ग़मख्वार है ..................
....कलम 'फिरोज' की लिखे रोज मोहब्बत-ए-दास्तान
तो क्या हुआ जो उसे भी फ़िराक-ए-यार है।
पिच्च! अरे ओय छोरे बन्द कर तनिक गाना दिखता नहीं बिटिया गा रहीं चचा बोलें
मेरी बहु भी बहुत गाना गाती है पर तुमसे मधुर आवाज में नहीं बेटा अपनी बहस बन्द करती हुयी वह औरत बोली जो अभी तक आपस में अपनी डींगे हाँकने में लगी थी।
वाकई अब सब उसे देखने और सुनने लगे जो मुझे अच्छा नहीं लग रहा था।
सब मेरी बाजी मार ले गये थे पहली तारीफ मुझे जो करनी थी।
मैंने खुद के लिए परेशानी बढा ली अब ये कान इस आवाज को सुने बिना इन्हें चैन ना मिलेगी मै बोला
मान जाएगे मुसाफ़िरो की जिन्दगी है तुम्हारी सफर मे साथी मिलते रहेगें आवाज भी मिलती रहेगी वह हसती हुयी बोली।
उसकी हसी के भाव ऐसे उकरे जैसे कोई छोटा बच्चा मगन होकर खेले मैं उसे कैसे बताऊँ उसकी आवाज और हसी मेरे दिल में उतर गयी है।
विक्रमपुर विक्रमपुर!
लगता है मेरा गांव आ गया गया है वह अपना समान उठाते हुयी बोली और उतर गयी।
गाडी अभी भी खडी पर वह जा रही थी एक बार दिल किया जाकर बोलूं इस तरह सफर मे साथी को अकेला छोड कर नहीं जाते पर उसका सफर तो खत्म हो चुका था फिर साथी कैसा?
सफर तो मेरा शुरू हुआ कभी ना खत्म होने वाला सफर, उससे फिर से मुलाकत और आगे का सफर, उसको हमसफर बनाने का सफर।
मेरे दोस्त का फोन आ रहा था पर मैं उठा नहीं पा रहा था कहीं सफर के साथियों को भूल ना जाऊं उन्हें तन्हा करके खुद को खुदपरास्त ना बना लूँ ।
गाडी में अब सन्नाटा था हर कोई उसके जाने के बाद ना जाने किस दुनिया में खो गये लेकिन मैं उसमे खोया जिसने मुझे आगे का सफर दिया।
ऊर्वसी वह आसमां की परी जो गगन पे अपनी अदाओं और हुस्न से तारों को चाँद बनने का हुनर सिखाया करती होगी।
मेरा भी स्टाप आ चुका था मैनें अपना बैग उठाते हुए सबको खुदा हाफिज बोला और चमनपुर के बागों के रास्ते से होते हुए चलने लगा।
मेरी चाल बदल चुकी थी मैं कभी कदम्ब के डाली छूता तो कभी फूल के पास जाकर उन्हें सूंघता तो कभी चलते चलते झूम जाता।
सामने गांव दिख रहा था पर मेरे और गांव के दरमियान में बहुत से नजारें जो मेरे साथ चल रहे थे उनके एहसास मेरे कदम को रूक रूक चलने पर मजबूर कर रहे थे।

 साथी रे तेरे बिना क्या जीना इसी गाने को गुनगुनाता हुआ मैं एक सफर खत्म कर चुका था।
दिल्ली से चमनपुर का सफर!


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