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आखिरी खत !

आखिरी खत !

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“दिल में मेरे है दर्द डिस्को... दर्द डिस्को.....दर्द डिस्को....”

“बोल रवि!”

“जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ मेरे यार तू जिये हजारों साल।“

“शुक्रिया यार”

“क्या कर रहा था?”

“कुछ नहीं बस सोने ही जा रहा था”

“ओके! कल मिलते है फिर मनाते है तेरा हैप्पी बर्थडे मनाते हैं, अब सो जा गुड नाईट”

“ओके शुभ रात्रि”

११ अक्टूबर की रात थी और मेरे दोस्त के जीवन की सुबह होने वाली थी| यह मेरा सबसे अच्छा दोस्त है | इसके बारे में क्या बताऊ, समझ से बाहर है| इसकी जिन्दगी, अपने आप में जीने वाला| इसकी अपनी अलग ही दुनिया है लेकिन मुझे उस दुनिया का भी सबसे अच्छा दोस्त मानता है । मेरे साथ ही पढता है, ज्यादतर वक्त भी साथ में बिताते है, लेकिन उसके नाम और उसके हँसमुख स्वाभाव के अलावा मै कुछ नहीं जानता।  

ठक ठक ! “अबे सो रहा है क्या ? अभी भी, दरवाजा खोल।“ कोई जवाब नहीं आने पर मैं खिडकी से झांककर देखा तो आलम जमीन में पेट के बल पड़ा था पूरे कमरे कागज बिखरे हुए थे मैने जोर से फिर से आवाज लगायी

“आलम ! आलम !”

मेरी आवाज सुनकर वह तो नहीं जगा लेकिन पडोसी जमा हो गये जैसे कोई अनहोनी हो गयी हो।

“क्या हुआ ! क्यू चिल्लाये जा रहे हो ?”

“अंकल जी आलम जग क्यूं नहीं रहा है ? देखिए कमरे की हालत भी सही नहीं लग रही है कही !”

“ओह भगवान इसके मुंह से तो झाग भी बह रहा है जल्दी से पुलिस को फोन लगाओ।“ कहकर वह दरवाजा तोड़ने लगें

दरवाजा के टूटने तक मैं आवाज लगाता रहा लेकिन वह बेसुध पड़ा रहा जैसे वह जा चुका हो। मेरी बेचैनियाँ मुझे कमजोर बना रही थी और दरवाजा टूटने का नाम ही ले रहा था जैसे वह किसी राज को अपने अन्दर ही कैद करना चाहता हो लेकिन कब तक !

मैंने पूरी ताकत से एक और जोरदार धक्का मारा दरवाजा टूट कर उसके ही ऊपर ऐसे गिरा जैसे अब भी हार मानने को तैयार नहीं, उसका ठंडा शरीर बता रहा था कि वह बहुत पहले ही विदा ले चुका है उसके पास पड़े वह ख़तो में अभी भी गर्मी बची थी। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं कभी उसके बेनूर सा चेहरा देखता तो कभी उन ख़तो को जो ऐसे उड रहे थे जैसे उसके मरने का उन्हें भी शोक हो। वहाँ पड़ी हर वस्तु अपने आप में एक राज दबाये हुए खमोश थी।

एक ख़त उठाया पढने लगा- " तुम अभी तक आयी क्यूं नहीं? मैं तुम्हारा कब से इन्तजार कर रहा हूँ। तुम हमेशा लेट हो जाती हो। क्या तुम नहीं चाहती मैं वहाँ जाऊँ? मैं नहीं जाऊँगा अगर तुम नहीं आओगी। तुम्हें आना ही पड़ेगा। मैं सोया नहीं हूँ। मेरी आँखें खुली हुयी हैं, आकर झाँक लेना"

इस ख़त का क्या मतलब हुआ, वह किससे बात कर रहा था, कहाँ जाने की बात कर रहा था, कुछ समझ में नहीं आया। मेरी धडकने बढने लगी थी। मैं राज की उस अंधेरी पाइप में घुस चुका था जिसका अन्तिम छोर ढूंढ कर मुझे अपने दोस्त के मौत का पता लगाना था।

दूसरा ख़त- " आज तुम मुझे देख रही थी लेकिन मैंने तुम्हें नहीं देखा। तुम मुझे क्यूं देखती हो, कौन हो तुम ? मै तुम्हे नहीं जानता। तुम मेरे रास्ते में मत आया करो। मुझे पता है तुमने ही मेरी डायरी चुराई है, उसे वापस कर जाओ"

मैं अब तक आठ ख़त पढ़ चुका था लेकिन सब समझ से बाहर थे। हर ख़त अपने में एक राज था जो अपना मुँह सिले हुये सिर्फ निहार रहे थे। मेरी बेचैनी ने इस राज को ढूंढते-ढूंढते एक डायरी को पाया जो उसके पेट के नीचे दबी थी।

डायरी के कवर पेज में खून से कुछ लिखा था जिसे पढ़ा नहीं जा सकता था क्योकि वह भाषा उसके अलावा कोई जानता ही ना था। वह डायरी उसके द्वारा बनाये गये छायाचित्रो का संग्रह था। हर छायाचित्र में बड़े को छोटे से हारते हुए दिखाया गया था जैसे पेड़ अपने बाजुओं से इन्सान को दबोचे हुए, नदी का छोटे बच्चे का पीछा करते हुए, आसमान से निकलते हुए  हाथ .....कुछ चित्र पर उसने पेन से बाद में क्रास का चिन्ह लगा रखा था।

“तू कौन है ? इससे तेरा क्या सम्बन्ध ?”

पुलिस वाले आ चुके थे

“दोस्त है मेरा”

यह सब कैसे हुआ? क्या जानता है तू इसके बारे में ?

“मुझे नहीं पता लेकिन रात को हमारी जब बात हुई थी तब तक यह ठीक था।“

“ठीक है। गाड़ी में जा के बैठ” कहते हुए वहाँ पड़े कागजो, डायरी और संदिग्ध वस्तु जो चोर कातिल नजर आती थी का गट्ठर बनने लगा, सभी राज गट्ठर में कैद हो गये थे।

मैं गट्ठर के साथ थाने में और दोस्त पोस्टमार्डम हाउस जा रहा था। दोनों से सवाल जवाब होने वाले थे मुझसे पूँछकर और उससे चीर फाडकर, वह जानता हुआ बोल ना सकता था और मैं सच जानता ना था।

शाम तक मैं थाने में रहा और मुझसे वही सवाल किये गये जो मैं खुद जानना चाहता था। इसी सवाल-जवाब की कक्षा में मुझे उसके परिवार का वह चेहरा भी देखना पड़ा जो करूणा और दुखो का लिबास पहने हुए मुझें देखने आये थे। शाम हो गयी थी मेरी जांच पड़ताल हो चुकी थी मैं थके मन से घर की ओर चल पड़ा। मेरे मन मे बस उसका ही चेहरा घूम रहा था जो मुझसे बस यही पूछ रहा था क्या मैं मर चुका हूं ? अब मेरा शोक क्यूं !

रात को 8 बज चुके थे। मैंने उसके सारे दोस्तों को फोन करके अपने कमरे में पार्टी के लिए बुलाया। मैं अपने दोस्त के जाने के ग़म और उसके नये जन्म की खुशी में पार्टी मना रहा था हर एक ज़ाम उसके नाम था।

सारे दोस्त आ चुके थे। शायद वह भी  हमें देख रहा था क्योकि उसके यादें उसका जिक्र सबके जुबान में थी सभी को मैंने यह बोल दिया था कि आवश्यक काम की वजह से उसे बाहर जाना पडा और वह सब जश्न में डूबे हुए मेरी बात पर तुरन्त विश्वास कर लिया।

रात ११ बजे रहे थे। सब जा चुके थे मैं अकेला नशे में चूर बेड पर जा गिरा और मन फौरन मुझसे निकल कर उस कमरे में जाकर तफ्तीश करने लगा जहां मेरा दोस्त अपनी पहचान छोड़ गया था। मेरा मन उस कमरे में भौंरे की तरह हर चीज को छूता, सूंघता आकर मुझे बताता फिर वापस लौट जाता। यह क्रम चलता रहा और मैं ना जाने कब सो गया।

अगली सुबह उसकी मौत की खबर अखबारो में शायराना अंदाज में छपी-

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र ने प्रेम में पागल होकर की खुदकुशी

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"प्रेम जाल की गिरफ्त मे रहकर पागल हो चुके दिल्ली के मुनिरका गांव में रहने वाले आलम जो स्नातक के छात्र थे खुदकुशी कर ली। उनकी खुदकुशी किसी फिल्मी कहानी से कम ना थी जिस कमरे मे वह मृत पाये गये वह किसी म्यूजियम से कम ना था। प्यार ने ली जान यह हैरान करने वाली बात है क्यूंकि प्यार तो जीवन देता है लेकिन किसके प्यार के लिये कुर्बानी हुई अभी भी एक राज है  "

यह खबर पढकर मैं भी सोचने लगा कि वाकई केस को सुलझाने मे पुलिस वाले कामयाब हो गये हैं, क्या किसी के मौत की खबर ऐसे ही छपनी ही चाहिए?

सुबह सुबह ही थाने पहुँचकर मैंने उस गट्ठर को मांगा जिसने सारे राज दफन थे लेकिन मेरे पहुचने तक वह कूडेदान के मुँह में जा चुके थे पुलिश ने प्यार मे आत्महत्या कहकर मुझें वहाँ से भगा दिया।

पापा फिर क्या हुआ ? क्या पता चला कि वह मौत किसलिये और किसके लिए हुयी ?

मैं २ साल तक उसके बारे में खोजबीन करता रहा उसके बन्द कमरे में जाकर दीवारों से पूंछता, यह क्रम तब तक चलता रहा जब तक मुझें यह पता नहीं चल गया कि वह कौन थी ?

कौन थी ? पापा!

वह तुम्हारी मम्मी थी हम तीनों एक साथ ही पढते थे वह उसे प्यार करता था लेकिन मुझें इसलिए नहीं बताया कि कहीं मुझें भी उससे प्यार ना हो।

उन दोनों में क्या बाते होती थी हुयी भी या नहीं यह सब मैं नही जानता हूँ । मैंने तुम्हारें मम्मी से उसके बारे में कभी कुछ नहीं पूछा ना उन्होने बताया । इस तरह मैंने अपना दोस्त खो दिया यह घटना आज भी मुझें ताजी लगती है जब भी तुम्हारीं माँ को खामोश या ग़म में देखता हूं और मुझें आज भी उस आखिरी ख़त या कहूं सुसाइड नोट्स की तालाश है कि उसमें क्या लिखा ? मौत की वजह क्या लिखी है ? क्या उसने तुम्हारी माँ को बेवफा करार दिया ? और भी बहुत से जवाब जो उस आखिरी ख़त में दफन थे।

 

 


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