PRAGYA VAANI

Inspirational Others


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सच्ची आज़ादी

सच्ची आज़ादी

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अम्मा! अम्मा!.... आंखें खोल, आंखें खोल..... हम बस पहुंच ही गए... कहते हुए चार हट्टे-कट्टे जवान आदमी गोद में बुढ़ी औरत को उठाते हुए अस्पताल के गलियारे में घुसे चले आ रहे थे।


हटो हटो भाईसाहब, जल्दी....। डाॅ. साहब.. डाॅ. साहब... मैडम जी डाक्टर साहब कहां हैं??? हमारी अम्मा की हालत बिगड़ती जा रही, जल्दी कुछ कीजिए।


रुकिये रूकिये... पहले इन्हें स्ट्रैचर पर लिटाईये और फार्म भरिये। डाॅ. साहब आ रहे हैं।


हम सब कर देंगे... बस आप उन्हें जल्दी बुला लें।


अरररररे...! आप फार्म तो भरिये, डाक्टर साहब अस्पताल में ही हैं। अभी राउंड पर गए हैं।


ये क्या हंगामा मचा रखा है.... कहते हुए डॉक्टर साहब पिछे से आए। कैसा शोर है? कौन हो तुम लोग?


साॅरी सर (अपनी सीट से उठकर रिसेप्शनिस्ट खड़ी हो गई) ये लोग अभी आये हैं और आते ही शोर मचाने लगे।


डॉक्टर (रिसेप्शनिस्ट से पूछते हुए) :- बात क्या है?


रिसेप्शनिस्ट :- सर पेशेंट की हालत सीरियस है। सर से खून आ रहा है।


वाॅट, तो मुझे बुलाया क्यों नहीं......?


लेकिन सर आप तो राआआ....


ओ जस्ट शट अप यू ईडियट (रिसेप्शनिस्ट को बीच में टोकते हुए)... तुम लोगो की वजह से ही हाॅस्पिटल की इमेज खराब होती है। कहां है पेशेंट?


सर वो, वहां... स्ट्रेचर पर।


डॉ :- जल्दी वार्ड में शिफ्ट करो और डाॅ. मेहरा को कहना इमरजेंसी है, कम फास्ट...।


साहब हमारी अम्मा को बचा लीजिए (दोनों हाथों को जोड़े हुए चेहरे पर उदासी और निराशभाव से)। हम तो जीते जी मर जायेंगे।


डाॅक्टर :- रिलैक्स रिलैक्स.. हम पूरी कोशिश करेंगे।


अम्मा! डरना मत... हम बाहर ही हैं। तू बिल्कुल ठीक हो जायेगी। 


डॉ :- आप बाहर ही रुकिए, भीड़ मत लगाइए। पेशेंट को अंदर ले आओ... (वार्ड बॉय से कहते हुए)


इमरजेंसी वार्ड के बाहर खड़े चारों आदमी बाहर आते हुए हर वार्ड बॉय और नर्स से अपनी मां की तबीयत पुछते। 40 मिनट के बाद डॉक्टर बाहर आए...


आपकी मां की हालत नाज़ुक है। वो आप सब से मिलना चाहती हैं। कोशिश कीजिएगा उन्हें कोई परेशानी ना हो... (कहते हुए डॉक्टर के पीछे सभी, वार्ड बॉय, नर्से और दूसरे डॉक्टर चले गए)


अम्मा.. अम्मा... आंखें खोल अम्मा, देख हम सब यहीं हैं...।


(हल्के से आंखें खोलकर, दर्द में कराहते हुए) अम्मा बोली... हम्मम लल्ला, मुझे कुछ बताना है..।


बता देना...(उम्र में बड़े दिख रहे आदमी ने कहा), अभी तेरी तबीयत ठीक नहीं है, तू आराम कर।


नहीं नहीं बेटा... मेरा अब कोई भरोसा नहीं, मुझे भगवान का बुलावा आ गया है..।


चुप हो जाओ मां, ऐसी बातें मत करो। बड़े भैया ने कहा न... हम सब देखभाल करेंगे तो तुम जल्दी ठीक हो जाओगी(दूसरे आदमी ने टोका)


अच्छा अच्छा... ठीक है! नहीं करती ऐसी बातें...। मेरी बात ध्यान से सुनो...। तुम चारों को मैंने चार न समझ कर, एक समझा। हमेशा कलेजे से लगा के रखा। सारी दुनिया कहती रही "भामा" तो पागल है, जो बेटों से इतना लाड लगाती है। यही बेटे "भामा" को इक दिन दर-दर की ठोकरें खिलवायेंगे। पर मैंने एक न सुनी और तुम्हारी सौ लड़ाईयों के बाद भी हमेशा जोड़ने की कोशिश की। अपने खेतों को खून पसीने से सींचा ताकि हमारे घर आया एक भी मेहमान भूखा न लौटे। 


हां हां, यह सब तो हम जानते ही हैं पर तुम दुनियावालों की बातें मत सुना करो, कितनी बार कहा है (तीसरे आदमी ने गुस्सा करते हुआ कहा)। अभी बस तुम आराम करो...।


भामा :- नहीं मुझे बोलने दे बेटा..। मैं तुम सबको पढ़ा लिखा तो नहीं पाई पर हां मैंने तुम पर कभी कोई आंच न आने दी। मेहनत मज़दूरी करके तुम सब को पाला पोसा। आज मेरे भाग्य खुल गए कि भगवान का दिया सब कुछ है। तुम चारों हो, बहुए हैं और नाती-पोतों से भरा घर परिवार।

आज तुम्हें वो बताना चाहती हूं, जो बात मैंने तुमसे हमेशा छुपाई। हम हमेशा से गरीब नहीं थे। मैं बहुत अच्छे परिवार से थी। मां-बाप, भाई बहन, सब के लाड़ प्यार में पली-बड़ी। फिर तुम्हारे पिता के साथ मेरी शादी हो गई। 1 दिन अचानक तुम्हारे पिता की तबीयत बिगड़ी और वो हमें अकेला छोड़ गए।

तुम्हारे पिता के जाने के बाद उनके साथी ने पूरा व्यापार हड़प लिया। मैंने बहुत कोशिश की कि बच्चों के भाग्य से मुझे कुछ हिस्सा मिल जाए। पर देखते ही देखते हमारी ज़मीन, हमारे खेत, हमारा घर सब कुछ उसने धोखाधड़ी से छीन लिया।

कंगाल होकर मैं तुम सबको लेकर कहां जाती इसलिए यहां, इस छोटे से गांव में आकर बस गयी। मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं तुम सबको पढ़ा पाती। जैसे तैसे घरों में काम करके मैंने तुम्हें पाला।

नियति का खेल देखो कि तुम सब ने मेरा साथ दिया और हमारे दिन फिर गये। मैं सब देखकर खुश हुई ही थी कि "बॉर्डर" हमारे गांव आ गया।

तुम सब को मैंने बहुत टोका पर तुम्हें "बॉर्डर" में कोई कमी ना दिखती। उसने हमारे खेतों में अच्छी-महंगी दवाइयां लगवाई तुम्हें ये तो दिखा, पर उससे हमारे खेतों की सब्जी में ज़हर फैल गया, वो तुम्हें ना दिखा बेटा?

हमारी दुकान पर सोना दुगनी कीमत पर बिकवाया उसने। वो तो तुम्हें दिखा पर, उससे कितने ग्राहक कम हुए, जे न दिखा...?

मेरे लाख मना करने पर भी तुम चारों ने मेरी एक न सुनी। तुम्हें तो जेयी लगता है ना कि अब अम्मा बुढ़ा गई है। उसे अब समझ ना है...। पर ऐसा ना है लल्ला, जे बाल धूप में सफेद ना किए। आज भी इंसान को देखकर नियत भाप लेती हूं और जे "बॉर्डर" तो मुझे कतई पसंद न है। तुम लोगों की मति पर तो जैसे पत्थर पड़ गए...।


अम्मा जे तू का लेकर बैठ गई है? जे बातें तो बाद में भी हो सकती है ना..? तू एक बार घर आजा। फिर जितना चाहे हमें डांट लिए..(बड़े बेटे ने कहा)


ननननना... मैं कतई उस घर में ना जाऊंगी...। उस घर में जब तक "बॉर्डर" रहेगा मैं उस घर में पैर भी न रखूंगी..।


ऐसा मत बोल अम्मा, तेरा ही घर है। तू कहेगी तो हम "बॉर्डर" को दूसरी जगह दे देंगे...।


अब क्या फ़ायदा बेटा? अब तो हमारी दुनिया लुट गई। कारोबार में इतना नुकसान हो गया कि हम जहां से चले, फिर वही आ गए।


तू ऐसा क्यों सोचती है अम्मा? तू है तो हम फिर से पैसा कमा लेंगे।


बात पैसे की ना है बेटा...। बात इज्जत की है। गांव में जो इज्जत मैंने बनाई, उसकी तो कोई लाज ना रही। मुझे हमेशा से इस "बॉर्डर" पर शक था। तुम लोगों को कहा भी था पर तुमने ध्यान ना दिया।


आज जब तुम सब बहुअन के साथ बाज़ार को निकले तो "बॉर्डर" कमरे में किसी से बात कर रहा था। जब मैंने उसकी पुरी बात सुनी तो पता चला, वो उसी कारोबारी का भेजा हुआ है, जो हम सब में फूट डाल हमें बर्बाद करने आया है। जिसने कभी तुम्हारे बाबा को धोखा दिया। मुझे ना पता था कि वो अचानक पलट जाएगा जैसे ही उसने मुझे देखा हड़बड़ाहट में मुझे धक्का दे दिया और मैं फर्श पर गिर पड़ी। मुझे उसके बाद होश न....।


अम्मा की बातें सुन के चारों बेटे सन्न रह गये। जिस "बॉर्डर" की बात अम्मा कर रही थी। उन चारों को ही उस पर बहुत भरोसा था। कुछ साल पहले उनके गांव में मेला देखने आया था और उसके बाद उन्हीं के साथ उसी गांव में बस गया। उन्हीं के घर रहता और सब के साथ खूब घुल-मिल गया। अब चारों बेटों को समझ नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें। इतने में बड़े बेटे की आंखों से आंसू छलक गए, हाथ जोड़ते हुए अम्मा के बिस्तर पर घुटने टेक दिए.... अम्मा हमें माफ कर दे, हमसे बहुत बड़ी गलती हो गईईई...।


माफी न मांग लल्ला। तू तो मेरा सब कुछ है पर हां मेरे जाने के बाद तू बाकी के भाइयों का ध्यान रखना।


ऐसा मत बोल अम्मममा...। तुझे कुछ न होगा। तू बिल्कुल ठीक हो जाएगी।


अम्मा हल्का सा मुस्कराई और बेटे के सर पर हाथ सहलाते हुए बोली....बेटा मुझे और जीने की इच्छा और शक्ति न है। पर तुम चारों इस घर की, इस गांव की ऐसी रक्षा करना कि लोग मिसाले दें। अपने भाइयों में इतना प्रेम भरना कि कोई तुम्हें तोड़ ना पाए। अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देना, जो मैं तुम्हें ना दे पाई। हमेशा सबकी मदद करना बेटा।


इतना सुनते ही बाकी के तीन बेटे भी फूट-फूट कर रोने लगे। ऐसा मत बोल... हमें डॉक्टर पर पूरा भरोसा है।


मुझे डॉक्टर से कोई शिकायत ना है और ना ही तुम सबसे। जे गांव मेरा है और यहां के लोग भी। इस घर को अपने खून-पसीने से सींचा। हमेशा तुम चारों में प्रेम भाव रखा। एक दूसरे की जान हो तुम सब। बस इसे कभी मत खोना इतना कहते ही मां चल बसी....


देखते ही देखते पूरा माहौल शांत हो गया। चारों ओर दुख ने पैर पसार लिए। अश्रुओं के घनघोर बादल बरसने लगे। अम्मा के कमरे से आती चीखें निरन्तर बढ़ती रहीं। 


शोर सुनकर डॉक्टर भागते हुए कमरे में आए। देखा तो "भामा" बेसुध बिस्तर पर पड़ी, सफेद साड़ी में गंगा सी पावन लग रही थी। "भामा" के चेहरे की हल्की मुस्कान मानो अब भी जीवन्त थी। उसके चेहरे पर कोई पश्चाताप, कोई दुःख नहीं था।

बड़े सुकून के साथ वो तो चली गई और पीछे रह गये "भामा" के चार बेटे- हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और उनकी जातिरूपी संतानें.....!


ऐसा माना जाता हैं कि आत्मा हमेशा जीवित रहती है। आत्मा का कोई रूप नहीं होता। सिर्फ और सिर्फ भाव होता है। जो सदैव लोगों के हृदयों में जीवित रहता है। मैं आशा करती हूं कि "भावरूपी भामा" हम सब में रहे और उन्हीं के आदर्शों पर हम बड़े। तब हमें धर्म नहीं बल्कि "अपने बेटे" दिखेंगे। अनेकों जातिया नहीं बल्कि "अपनत्व से सराबोर अपने अंश" मिलेंगे और उस दिन हम यक़ीनन "सच्ची आज़ादी" मनायेंगे।


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