Pratibha Thakur

Tragedy


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Pratibha Thakur

Tragedy


सभ्य कौन?

सभ्य कौन?

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मेरी गाड़ी शहर से दूर एक खाली स्थान से गुजर रही थी,अचानक बंजारों की टोली देख कर मुझे वर्षों पुरानी बंजारन लड़की मलीहा की याद आ गई।

मलीहा का मासूम हंसमुख चेहरा में अभी भी नहीं भूल पाई हूं।एक दिन कहीं से घूमते घूमते मेरे सामने आ पहुंची मै उसे जानती नहीं थी। जाड़े के मौसम में खानाबदोश लोगों के समूह में वह भी अपने परिवार के साथ अाई।उसकी वेश भूषा ने(हालांकि ये उन बंजारों की विशेषता थी) मुझे बेहद आकर्षित किया। आर्टिफिशियल गहनों से लदी फदी वो कमसिन मासूम लगभग पंद्रह सोलह वर्षीय लड़की जब तब नजर आ जाती।एक दिन मैंने उसे अपने पास बुलाया और उसके बारे में जानना चाहा।

उसने अपना नाम मलीहा बताया।उसकी चंचल आँखें और बेतकल्लुफ़ अंदाज मुझे बेहद आकर्षित करती।उसके बोलने का लहज़ा और चलने फिरने का अंदाज उसे बंजारन शब्द को पूरी तरह परिभाषित करता था।चलती फिरती दुनियां ही उनका घर बार थी। सारा सुख दुःख उसी में समाहित था।वे लोग थोड़े अक्खड़ एवम् स्पष्टवादि स्वभाव के होते हैं।झूठा आरोप लगने पर कुछ भी कर गुजरने का माद्दा रखते हैं।

अचानक मलीहा में कुछ शारीरिक परिवर्तन दिखाई देने लगा।मेरी दिलचस्पी उसमें बढ़ने लगी(जो कि मेरे स्वभाव में नहीं है) लेकिन मुझसे रहा नही गया और मैं पूछ बैठी । उसका जबाव सुनकर मैं अवाक रह गई। उसने बताया "दीदी ...!मुझे उस बाबू का नाम नहीं मालूम लेकिन वो रोज ही मेरे पास छुप छुप कर आता मुझे तरह तरह के गहने और कपड़े शहर से लाकर दिया करता और कहता था कि मैं तुम्हारा दोस्त हूं तुम्हें कभी कोई तकलीफ़ नहीं होने दूंगा ।हम दोनों साथ मिलकर खेलेंगे ,मैं तुम्हें बहुत सारे तोहफे लाकर दिया करूंगा ।सिर्फ तुम किसी को बताना मत कि हम दोनों मिलते है।

इधर दो महीने से ज्यादा हो गए अब तो बाबू आ ही नहीं रहा ।मैं परेशान हो गई हूं।अगर मेरे लोगों को पता चला तो वे मुझे मार डालेंगे।मेरी समझ में नहीं आ रहा मै क्या करूं, तुम कुछ पता तो करो दीदी , तुम लोग तो पढ़े लिखे हो मै उसे कहां खोजूं अब तो हम सब यहां से चले भी जायेंगे"।उसकी आंखे नम हो आईं. मदद के लिए का तर नज़रों एवम् एक आशा से मेरी तरफ देखा। उसकी नज़रों में मै पढ़ी लिखी थी तो कुछ भी कर सकती थी उस ये मालूम ही नहीं था कि हम जायज लोग विद्या की आड़ में सर्वाधिक कमजोर होते हैं।उस समय मैंने उसे समझा बुझा कर भेज दिया उसके जाने के बाद भी मेंमैंउन्हीं उलझनों में खोयी रही ... भला क्या मिला मिला किसी को एक सीधी सादी सी लड़की का जीवन बर्बाद करके ।

एक तथाकथित सभ्य व्यक्ति ने उसके भोलपन का फायदा उठा कर उसके जीवन की सारी खुशियां चुरा ली।जबकि लोग बंजारों को चोरी चाकरी के लिए बदनाम किये फिरते हैं। आखिर हम किस सभ्यता के दौर में जी रहे हैं।मेरे मन मस्तिष्क में ये सवाल अनुत्तरित ही रहा।



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