साहित्य : एक माध्यम

साहित्य : एक माध्यम

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सबों के हित में रत साहित्यसेवी पन्नों पर आँखें गड़ाये हुए थे। उसके विषय में इतना ही कहना है कि, सामाजिक तौर पर भले वह सिर्फ़ लिखने वाला नाम से जाना जाता हो, लेकिन आसपास के किसी भी समारोह में जब लाऊडस्पीकर से आवाज आती तो, स्थानीय लोग पहचान जाते कि यह लेखक मंगलम की आवाज़ है। कुछेक लोग गौरवान्वित होते तो, कुछेक यह भी कहते कि फालतू के समय बर्बाद करता है....। किंतु, किसी भी आयोजन में उनकी तूती बोलती थी। जोर-जोर से शायराना अंदाज में माइक को थामे रहते और श्रोताओं को एकत्रित करने में कामयाब हो जाते थे। मानो, जितना काम सड़क पर घूम-घूमकर प्रचारक नहीं कर पाते, उतना काम मंगलम साहब दस-पाँच मिनट में कर देते। श्रोताओं और दर्शकों को इतना भांप चुके थे कि, किसी दूसरे शहर क्यों न हो, वहाँ भी भीड़ इकट्ठी हो जाती थी। कभी गीत-संगीत के नाम पर, कभी देशभक्ति के नाम पर, तो कभी कौव्वाली के नाम पर लोगों को करीब खींच लाना, उनकी मुट्ठी की बात थी। इस बीच सैकड़ों प्रशंसक तैयार कर लिए, तो दर्जनों को अपना मोबाईल नंबर देकर अपनी ओर खींच लिया, उन्होंने। उनकी भाषा व शैली ही ऐसी थी कि, उनसे सीखने की ललक हर किसी में उफान भरने लगती।

इसी बीच फोन की घंटी बजी। घंटी की आवाज सुनकर कुछ देर के लिए झल्लाहट हुई, किंतु, तत्क्षण उन्होंने फोन रिसीव किया। 

उधर से आवाज आई, "सर, मैं मिलन हूँ। वर्षों पहले आपने एक रंगमंच पर आशीर्वाद स्वरूप पुस्तकें भी दी थीं। रिश्ते में बांधने की बात सुनकर मेरी आँसू निकल आई थी। सर, आप मंगलम सर हैं ?"

"हाँ-हाँ, मिलन ! मैंने कहा था, हर संकट में मदद करूँगा। बोलो ?"

"आदरणीय, मुझे विश्वास था, आप इंकार नहीं करेंगे। आप जैसे व्यक्ति ही संसार के संस्कार हैं।"

"अरी! बोलो तो...."

"जी। कल मिलती हूँ।" मिलन ने कहा।

"न-न! कल का छोड़ दो। कल के बाद परसों आ जाओ।"

"कल के बाद..... मुझे जरूरी है, सर।"

"ठीक है। तुम्हारी मजबूरी को समझ रहा हूँ। बिना जरूरत के लोग इतना परेशान नहीं होते हैं। ऐसा करो, समय निकालता हूँ। कल ही अपने शहर में एक भव्य साहित्य सम्मेलन है। वहाँ मेरी उपस्थिति जरूरी है। वैसे तो, समय निकालना मुश्किल है। फिर भी, संध्या पहर के बाद निकालता हूँ। होटल सायोनारा को जानती हो न... स्टेशन के आसपास ही है। आयोजक के द्वारा रात्रि विश्राम की व्यवस्था उसी होटल में है। रूम नंबर 17 में आ जाओगी।"

मंगलम साहब की बात सुनकर मिलन में ऊर्जा का संचार हुआ। पिछले तीन दिनों से परेशान थी। माँ को डॉक्टर से दिखाने के लिए बेगूसराय में ही ठहरी हुई थी। 'एक काम दो काज' वाली बात सार्थक होने वाली थी। बिना कुछ सोचे मिलन हामी भरती हुई मंगलम साहब से बोली, "ठीक है सर! आ जाऊँगी। तब तक डॉक्टर रिपोर्ट भी देख लेंगे। फिर माँ को साथ लेकर आपसे मिल लूंगी... वहीं से घर निकल जाऊँगी।"

"ओह! इतना कष्ट उठाने की कैसी आवश्यकता। माँ की तबीयत खराब है, उन्हें परेशान न करें। आप सुबह आ जाएँ, घर में ही मिलता हूँ।"


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