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Swapnil Srivastava (Ishhoo)

Comedy


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Swapnil Srivastava (Ishhoo)

Comedy


पॉकेट रेडियो -छोटी उम्र की खुराफात का एक नमूना

पॉकेट रेडियो -छोटी उम्र की खुराफात का एक नमूना

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पिछले पंद्रह मिनट से हम तीन फिट की दीवार पर कान पकड़े खड़े थे और माता जी गुस्से से हाथ में हमारा ही प्लास्टिक का बैट लिए इंतजार कर रहीं थी कि ज़रा हिले तो दो चार लगा दें। हमें तो समझ ही नहीं आ रहा था कि ऐसा भला क्या हो गया जो इतनी ज़बरदस्त सजा दे दी गई थी, पर माता जी का पारा गरम था, एक तो उनके आदेश का उल्लंघन ऊपर से एक बड़ा कांड…..

 बातउन दिनों की है जब हम शर्ट और हाफ पैंट पहना करते थे, वैसे हाफ पैंट तो अब भी पहनते है पर शौखिया, उस समय वो हमारा ऑफिशियल ड्रेसकोड हुआ करता था। जी हाँ उमर होगी कोई आठ या नौ साल। इलाहाबाद में हम अपने माता पिता और छोटी बहन के साथ किराये के मकान में रहा करते थे। पिता जी टेलीफोन डिपार्टमेंट में टेक्निकल इंजिनियर थे और माता जी ने घर परिवार का बीड़ा उठा रखा था।

 ज़िन्दगी सुकून भरी थी, घर से स्कूल और स्कूल से घर, न मोबाइल था न केबल टीवी। लकड़ी के शटर वाले ब्लैक एंड वाइट टीवी पर दूरदर्शन और लगभग उतने ही बड़े रेडियो में बिनाका गीतमाला। घूमने के लिए गर्मियों की छुट्टीयों में कानपुर अपनी दादी – नानी का घर।

 सितम्बर या अक्टूबर की बात होगी, मौसम ने करवट लेना शुरू ही किया था कि एक रोज़ कानपुर से हमारे बड़े पापा के ज्येष्ठ पुत्र और हम सब में सबसे बड़े, भाई साहब अपने घनिष्ट मित्र के साथ इलाहाबाद आए। एस.एस.सी. का इम्तहान था और सेंटर इलाहाबाद पड़ा था। घर में मेहमान आए तो कौन खुश नहीं होता, न खेलने जाने की रोक-टोक, न डांट का डर और पूड़ी-पकवान अलग से। हमारा भी हाल वही था, इन बातों से एक अलग ही ख़ुशी थी मन में।      

 देर शाम हुई तो खाना खाने के बाद सभी एक साथ बैठे पुरानी बातें कर रहे थे, पर मेरा मन कहीं और था, बड़े भाई साहब के मित्र, सुर्ख लाल रंग का छोटा सा अजूबा हाथ में पकड़े बैठे थे, उसमे तीरनुमा चमकदार डंडी भी लगी थी और उसमे धीरे- धीरे ‘फौजी भाइयों का रंगारंग कार्यक्रम’ चल रहा था। यह आवाज़ तो हमने पहले भी सुनी थी पर हमारे बड़े से लकड़ी के रेडियो में…। हमारा शरीर तो कमरे में चहलकदमी कर रहा था पर आँखे थी कि घूम- फिर कर उसी लाल अजूबे पर टिक जाती। देर रात हुई तो सोने की तैयारी शुरू हो गई। हमने यह जुगत भिड़ाई कि आज भाई साहब के साथ सोएंगे, आखिर अजूबे की खोज़ – खबर भी जो लेनी थी।

 चारपाइयां बिछ गईं, चादर पड़ गए और हाथ पंखे भी बगल में सजा दिए गए, उन दिनों लाइट जाना आम बात थी, तो हाथ पंखे ज़िन्दगी का अभिन्न अंग हुआ करते थे।

 अगलेकमरे से जैसे- जैसे बिनाका गीतमाला की आवाज़ आ रही थी, वैसे- वैसे हमारा मन विचलित हो रहा था, हमने माता जी को पटियाते हुए बोला, “मम्मी आज बड़े भाई साहब के साथ सोऊंगा, कानपुर की बातें सुननी है।” शुरू में तो माता जी ने मना किया कि थके- मांदे आए होंगे, आराम करने दो, सुबह परीक्षा भी है पर हमारा मन न माना, जिद्द करते रहे। किस्मत अच्छी थी, भाई साहब ने हमारा भुनभुनाना सुन लिया और आवाज़ लगा कर बुला ही लिया। माता जी ने जब हामी भरी तो हमारी आँखें चमक उठीं, योजना सफल होती सी दिख रही थी।

 अगलेकमरे में जैसे ही पहुंचे, लपक कर भाई साहब की चारपाई पकड़ ली और फालतू के सवाल पूछ कर असल मुद्दे की भूमिका बनाना शुरू कर दिया। मौका पाते ही बड़े भाई साहब के मित्र के मुख़ातिब हुए और बोले, “भईया, ये क्या है?” भाई साहब के मित्र को उस छोटे से अजूबे पर बड़ा गुमान था, पूरे कॉन्फिडेंस से बोले, “ट्रांजिस्टर है….,पॉकेट रेडियो।” रेडियो तो हमने पहले भी कई देखे थे पर इतना छोटा वह भी सुर्ख लाल हमारी कल्पना के परे था। “अच्छा….भईया, दिखाइए तो ज़रा….”, हमने कौतुहल वश उसे टटोलने का निर्णय किया। भाईसाहब के मित्र समझ गए, अब यह, क्या?, क्यूँ? कैसे? जैसे प्रश्नों की झड़ी लगाने वाला है, पलटते ही बोले, “बच्चे, अभी ख़राब है, हाथ लगेगा तो और बिगड़ जाएगा, कल जब हम परीक्षा देने जायेंगे तो साथ ले जायेंगे और लौटते समय ठीक करा लाएंगे।”

 हमने भी संकोच वश आगे पूछना उचित न समझा, अब ख़राब है तो क्या ही देखना। उधर भाई साहब के मित्र को लगा कि, भले ही रेडियो ख़राब होने का बहाना किया पर बेफ़ज़ूल के सवालों से छुटकारा मिल गया। किसी को क्या पता था कि हमारे छोटे से दिमाग में क्या चल रहा था। मज़ाक था क्या? एक टेक्निकल इंजिनियर का घर और कोई सामान ख़राब छूट जाए।

 अगलेदिन रविवार था, कम्पटीशन की परीक्षा थी और सेंटर भी थोड़ा दूर था, भाई साहब और उनके मित्र नहा- धो कर, नाश्ता कर, पिता जी के साथ ही निकल गए। हमें कुछ तो खटक रहा था, दिमाग पर जोर डाला तो ध्यान आया कि दोनों के हाथ तो खाली थे, पॉकेट रेडियो तो ले जाना भूल गए थे। हमने ज़िम्मेदारी पूर्वक माता जी को बताना उचित समझा, और बोले, “मम्मी, भईया के दोस्त अपना पॉकेट रेडियो तो ले जाना भूल गए।” माता जी काम में व्यस्त थीं, उन्हें लगा अब इसे क्या समझाएं इम्तेहान में रेडियो- वेडियो ले जाना वर्जित होता है। एक ज़वाब दूँगी तो पलट कर तीन सवाल और दाग देगा। सीधा रामबाण उत्तर देते हुए बोलीं, “वो ख़राब है, ले जा कर क्या करेंगे।” उनके अनुरूप तो जवाब सटीक था और बात वही ख़तम हो गई थी, पर बेचारी इंजिनियर के बेटे का दिमाग न पढ़ पाई। हमने भी इसके आगे बात बढ़ाना उचित न समझा, नाश्ता कर पड़ोस के मित्र के संग खेलने चल दिए।

 हमऔर हमारे मित्र एक ही विद्यालय की शान थे, बस वह हमसे एक क्लास ऊपर थे और उमर में भी तकरीबन एक आध साल बड़े।

 उनदिनों के वही खेल, भाग- दौड़, छुपन-छुपाई और ढेर सारी बातें। जब सारे खेल ख़तम हो गए तो बातों का सिलसिला शुरू हो गया और बातों-बातों में न जाने कब पॉकेट रेडियो का जिक्र चल निकला। “जानते हो, भईया के दोस्त के पास एकदम छोटा सा रेडियो है, लाल रंग का, बिलकुल पेंसिल बॉक्स का आधा”, हमने कहा ।

“बहुत बढ़िया”, हमारे मित्र ने बोला, “जब लौट कर आएं तो हमें भी बुला लेना, देखें तो ज़रा छोटा रेडियो।” हमसे रहा न गया, बोल पड़े, “रेडियो तो घर पर ही है, पर ख़राब हो गया है, भाई साहब के दोस्त बनवाने ले जाने वाले थे पर भूल गए।”

“अच्छा, क्या ख़राब है? लाओ तो देखें ज़रा।” हमारे मित्र ने कहा। उनकी आवाज़ में कॉन्फिडेंस लगभग शत-प्रतिशत था।  

 हमें क्या चाहिए था, थोड़ा उत्साहवर्धन और थोड़ा मार्गदर्शन, भले ही हम-उम्र से क्यों न हो। योजनानुसार दोपहर खाना खाने के बाद मिलना तय हुआ। हमने घर का हर कोना छान लिया और रेडियो की बदकिस्मती से भाई साहब के मित्र का बैग हमें तखत के नीचे दिख गया।

 योजनाबद्ध तरीके से एक आदर्श पुत्र कि तरह हमनें वही काम किए जिसमे माता जी को गुस्सा न आए और दिनचर्या सुचारू रूप से चलती रहे। ज़रा सी चूक पूरी योजना पर पानी फेर सकती थी। हमने समय पर स्नान किया, होमवर्क किया और बिना ना-नुकुर के खाना भी खा लिया था।

 सारा काम ख़तम करने के बाद माता जी जैसे ही आराम करने लेटीं, हमारी योजना के दुसरे चरण का समय हो गया था। जैसे ही माता जी और छोटी बहन नींद में आए, हमने बिना आवाज़ किए कदम बढ़ाया और सरकते हुए तखत के नीचे बैग तक पहुँच गए। थोड़ी तलाश के बाद, लाल रंग का चमकता हुआ पॉकेट रेडियो हमारे हाथ में था। बिना आवाज़ के बैग बंद किया और अपना फ़र्ज़ निभाने घर के बाहर निकल गए। थोड़ा ही समय बीता होगा कि हमारे मित्र भी आते नज़र आ गए, हम दोनों की आँखे मिलीं और इशारों में ही हमने समझा दिया कि मिशन का दूसरा पड़ाव कामयाब रहा।

 उन्होंने पेचकस निकला, और शुरुआती जांच के बाद दोनों ने मिल कर पॉकेट रेडियो खोल दिया। चने की दाल बराबर काले पीले दर्जनों टुकड़े और चांदी से चमकते सैकड़ो टांके, ऐसा लग रहा था मानों हरे रंग की सड़क पर न जाने कितनी छोटी बड़ी गाड़ियाँ खड़ी हों। खैर इधर उधर फूँक मारी पर निष्कर्ष न निकाल पाए। फिर ध्यान आया बैट्रीयों को उलट कर देखते हैं। अक्सर घर के समझदारों को टार्च की बैट्री उलटते देखा था।

 पलट कर बैट्री लगाई और कौतूहल वश जैसे ही ऑन का बटन दबाया, यह क्या….रेडियो तो चल पड़ा। पहले तो शूं- शूं की आवाज़ आई पर जब काली छोटी चकरी को घुमाया तो इंसानों की आवाज़ आना शुरू हो गई, हमें लगा हमने पॉकेट रेडियो सुधार दिया। शुरुआती कामयाबी से धड़कन बढ़ी हुई थी साथ ही दोनों की छाती भी फूल गई थी, भ्रम में ही सही आखिरकार इंजीनियर के बेटे ने पॉकेट रेडियो ठीक कर दिया था।

 अब समय था चौथे चरण का, रेडियो को बंद करके वापस अपनी जगह रखना और शाम सबको सरप्राइज दे कर बेहिसाब तारीफें बटोरना। अभी तारीफों के बारे में सोच ही रहे थे कि माता जी की आवाज़ आती सुनाई पड़ी, होश फ़ाक्ता हो गए, इससे पहले कि कुछ कर पाते, माता जी सामने खड़ी थीं और खुला हुआ लाल रंग का पॉकेट रेडियो हमारे हाथ में था।

 जितनी डर और घबराहट हमें हो रही थी उससे कहीं ज्यादा हमारी माता जी को। अब क्या होगा….एक तो भतीजे का दोस्त ऊपर से घर मेहमान, उसके अच्छे खासे रेडियो का सत्यानाश कर रख दिया था।

 इससे पहले कि हम अपनी हवाई कामयाबी बयां कर पाते, कान ऐंठ कर चाभी भरी जा चुकी थी। हमने दलील भी दी कि हम तो रेडियो ठीक कर रहे थे पर उस गुस्से पर हमारी पैरवी न चली।

 माता जी ने झट पड़ोस से किसी बड़े को बुला कर फटाफट रेडियो कसवाया और वापस रख आईं। अब सिर्फ हम थे, हमारा प्लास्टिक का बैट और हमारी माता जी।

 माता जी ने दीवार पर खड़ा किया, कान पकड़वाए और बोलीं, “बताओ, आज के बाद फिर कभी किसी के सामान को हाथ लगाओगे?” हमने सोचा भी कि माता जी को अपनी कामयाबी बता दें पर लगा, छोड़ो यार, हमारे हुनर की किसी को कदर ही नहीं।       



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