STORYMIRROR

Santosh Goyal

Inspirational Others

3  

Santosh Goyal

Inspirational Others

पाल्यूशन चैक

पाल्यूशन चैक

8 mins
344

विदेश से लौटी ही 28 तारीख को थी। तीन महीने बाद घर और खुद को संभालने में जुटी थी। कालेज ज्वाईन करना भी जरूरी था। पहली तारीख से पन्द्रह दिन की छुट्टियां शुरू होनी थीं। अगर 29 को ज्वाईन न कर लेती तो मेरी तीन महीने की छुट्टियाँ जो ष्विदक्आउट पेएथी में पन्द्रह दिन का इजाफा और हो जाता इसलिए महीने के अन्त में लौट आना पड़ा 

था। बात न तो मेरे लौट आने के कारणों की 

थी ए न ही इतने महीनों बाद बिखरे घर की संभाल की थी वो तो हर साल का किस्सा था। धीरे धीरे उस तनाव से उबर ही आती थी। अब की बार की बार तनाव उत्पन्न हुआ

था सरकारी ऐलान 30 तारीख तक कार की नम्बर प्लेट निश्चित की गयी सीमा के अनुसार बनवाकर लगायी जानी थी और गाड़ी का पाल्यूशन चैक कराया जाना और वह सर्टिफिकेट गाड़ी में रखना था। दोनों में कुछ भी कमी रह जाने का मतलब था हजार रुपये जुर्माना। अब सारी मुश्किल हम जैसे लोगों की होती हैं। सरकारी तन्त्र में नौकरी ए नियमों का पालन करने की आदत भी और जिद भी तिस पर देश की भावी पीढ़ी का भार भी जाने अनजाने अपने कंधों पर ढोये थी। बच्चों को अगर नियमों का पालन सिखाते हो न मानने पर सजा देते हो तो भला खुद कैसे कोताही बरती जाये खैर बात थी कार की। अब इतने महीनों बाद घर के बिखराव को दूर करने और रसोई को गतिशील बनाने में जिसका सबसे बड़ा योगदान होता ए उसी कार को इस्तेमाल करने से पहले मार्किट ले जाने के लिये तैयार करना था यानी नम्बर प्लेट को बदलवाना और पाॅल्यूशन चैक करवाया जाना ए दोनों शामिल थे। एक पूरा दिन यानि 29 तारीख कालेज का ज्चाईनिंग और अन्य कार्यों में बीत गया। सांझ हुई कार लेकर मार्किट गयी नम्बर प्लेट वालों के पास सिर उठाने की फुर्सत ही न थी कोई पांच तारीख से पहले न दे सकता था। 

मैडम जी रात दिन काम कर रहे है। जी लोगों को कल से याद आना शुरू हुआ हैं अब सबको जल्दी हैं पर मैडम जी आप तो पढ़ी लिखी हैं जी आप भी, मिस्त्री मुझे जानता था। काॅलेज के पास ही तो मार्किट हैं अक्सर इसे कार के काम से घर बुला लेती थी। सही कहते हो मिस्त्री जी। मैं यहां होती तो देर क्यों करती कल रात ही आई हूँ। अब बोलो मेरी समस्या का क्या हल देते हो फिर पाल्यूशन चैक भी करवाना हैं। मिस्त्री ने कातर निगाह से मुझे देखा और बोला मैडम जी, जिनके पइसे ले लिये उनको तो देनी ही होंगे। पांच हजार नम्बर प्लेट परसों सुबह तक बननी हैं चार लोग लगे हैं पता न क्या और कैसे करेंगे फिर रूक कर बोला पता हैं मैडम जी। ये 220 रूपये में बनने वाली नम्बर प्लेट के लोग पांच सौ और हजार रूपये तक दे गये हैं। पता नहीं लोगों के पास पइसा बहुत हैं वक्त बहुत कम हैं शायद।

तो आपने लिये क्यों वो हंस पड़ा। मैडम जी पइसा आता किसे बुरा लगै हैं। पर ये तो मेहनत का पइसा है जी रात भर जाग के अपना खून पसीना एक करके काम कर रहे हैं जी फिर हम क्यों न कमायें अब आप क्या न जानों कि पहली के बाद से ये ट्रैफिक पुलिस वाले कितना कमावैगें। चाँदी न जी सोना हौवेगा उनका। रोकेंगे पैसे खावैंगे और छोड़ देंगे। बहुतैरे ऐसे भी हैं जी जो अभी भी आराम से बैठे हैं। पुलिस को खिला पिला के चलते रहेंगें।

मिस्त्री बोलता जा रहा था वह गुस्सा था पता नहीं किससे लोगों की गलतियों से या पुलिस के खाने .पीने से। यूं खुश भी था कि उसकी भी अतिरिक्त कमाई हुई हैं। पाँच हजार प्लेट मैं सोच रही थी। अगर औसतन 300.400 रुपया प्रति प्लेट भी पड़े तो दो दिन में उसकी कमाई का अंदाजा लगाया जा सकता था एक मैं बेचारी लेक्चरार ब्लैक में कुछ न करवाने की कसम खाना जितना मेरी जीवन पद्धति का नियम था वहीं मेरे पैसे खर्च करने की सीमा भी दर्शाता था। पर अब मैं क्या करूॅ मिस्त्री ने इशारें इशारे में प्लेट की कीमत तो बता ही दी थी वो तो मैं दूंगी नहीं फिर क्या करूँ सोचती खड़ी रही कि मिस्त्री ही बोला . 

मैडम जी द. चार दिन घर से बाहर न निकलें ए फिर देखती रहिये सरकारी सारे ऐलान धीरे धीरे ढीले पड़ ही जाते हैं फिर आपकी प्लेट पाँच तारीख को जरूर बना दूंगा वायदा करता हूं। 

अच्छा। मैं गाड़ी उठा कर चल दी। चलो पाल्यूशन चैक ही करवा लेती हूं सोचा और पेट्रोल पम्प की तरफ चल दी।

अरे। बाप रे। मलका गंज की तरफ मुड़कर थोड़ा आगे ही गयी थी कि ट्रैफिक जाम। कार रोक देनी पड़ी। तो ये जाम पाल्यूशन चैक करवाने वालों का हैं। अब क्या करूँ ज्यादातर ड्राइवर लोग गाड़ियाँ लिये लाइन में लगे थे ए बाहर निकलकर गपिया रहे थे मस्ती का आलम था। कार हाथ में थी दोस्तों का साथ देरी के लिए माकूल कारण भी था। कहीं झुण्ड में चाय की चुस्कियां ली जा रहीं थीं ए कहीं पास ही गरम गरम बनते ब्रेड पकौड़ों का मजा लिया जा रहा था साथ ही अपने मालिकों की आदतों और उनके बिजनैस की सूचना का आदान प्रदान और मजाक बनाने वाले भाव से आलोचना प्रत्यालोचना हो रही थी। 

अजीब देश हैं हमारा। इस पर हम गर्व करते हैं। विदेशों में कितना आराम हैं ए कितनी नियमबद्वता हैं ए कितनी सुविधाएँ हैं। असल में तो वहाँ जनसंख्या हैं ही इतनी कम कि दिक्कतें पैदा होने का सवाल ही नहीं होता जितना सच ये हैं उतना ये भी हैं कि वहाँ लोगों की मानसिकता ही यहाँ से फर्क हैं यहाँ हर आदमी मौके का फायदा उठाना चाहता हैं कैसे भी ज्यादातर दूसरे की मजबूरी का मूल्य लेकर वो चाहे पैसे या कोई काम साध कर ।

मैं बैठी सोचती रही थी साथ ही कार वापिस कैसे कर लूं इस पर भी विचार कर रही थी कि एक ड्राईवर उस झुण्ड से उठकर आ गया बोला मैडम जी यहाँ तो रात भी हो सकती हैं। ड्राईवर को गाड़ी लेकर भेज दीजिये आप कहां खड़ी रहेंगी या फिर .। 

क्हते.कहते वह चुप हो गया। या फिर क्या हो सकता हैं मैं जानने को बेचैन हो उठी। मैडम ड्राईवर कर लेगा।आप नहीं कर पायेंगी ये सब। आप ड्राईवर को भेजें। वहीं कोई जुगाड़ कर लेगा।  

जुगाड़ का मतलब मैं खुब समझ रही थी ए यानि पैसे देना दिलाना ए खिलाना पिलाना आदि। पर तुम लोग लाइन में क्यों खड़े हो तुम लोग क्यों नहीं लगाते ये जुगाड़ ये छोड़िए मैडम जी आप रहने दें इस बात को बस। आप तो हमारी बतायी तरकीब को आजमाये आपका काम हो जायेगा किसी ड्राईवर को भेज दें पैसे दे दीजियेगा गाड़ी लाने की भी जरूरत नहीं हैं। 

तो . मैं हकला गयी थी। अगर किसी ड्राइवर को पैसे देकर ही भेजना हैं गाड़ी भी न चाहिए तो आप भी तो ड्राईवर ही हैं न आप ही क्यों नहीं कर सके ये काम 

नहीं मैडम जी। हमारे साहब को ये पेट्रोल पम्प वाले जानते हैं हम नहीं कर पायेंगे। मैं हैरान परेशान हो गयी अजब किस्सा था सारे का सारा सरकारी नियम एक तरफ ये सारा नियम कानून दूसरी तरफ। आम आदमी को क्या फर्क पड़ता हैं इसके पास तो हर कानून का हल हैं। बल्कि कानून बनाने वाले ही सेवानिवृत्त होकर कानूनी दाॅवपेंच बताते हैं। सोचकर मैं मुस्करा उठी थी। मेरे टैक्स सलाहकार रिटायर्ड इन्कमटैक्स आफिसर सारे लूप ही लूप जानते हैं और बताते रहते हैं। लाॅ मेकरज आर आलवेज दा लाॅ ब्रेकर कहा जाता ही हैं। 

आखिर मैंने ड्राइवर से गाड़ी बैंक करवा ली ए वापिस यूनिवर्सिटी आ गयी। घर आकर पस्त सी पड़ गयी। मन ढेरों द्वन्द्व से भरा था क्या हमारा हिन्दुस्तान कभी बदल पायेगा आजादी से पहले तो फिर भी एकता का ज़ज़्बा एक खास मकसद के लिए बना था आजादी मिलते ही सारी एकता रेत सी बिखर गयी आज तक बिखर रही हैं। बल्लभभाई पटेल द्वारा एकत्रित छोटे छोटे राज्य फिर बंटते चले जा रहे हैं पन्द्रह से पैंतीस आगे और भी। कभी भारत का बँटवारा कभी जाति ए रिजर्वेशन आदि जाने कितने ही हिस्सों में बंटता जा रहा हैं देश। और आज तो पैसा ही भगवान बन बैठा हैं। धर्म के लिए होने वाली लड़ाइयों से ज्यादा लड़ाइयां अब धन के लिए होने लगी हैं औद्योगिकरण का ये परिणाम होना था लाभ हानि का व्यापार हैं ये तो तिस पर पूरा विश्व एक गाँव में बदल गया हैं तो डॅालर और पाउँड जैसी हार्ड करेंसी का आकर्षण भी तो हैं। मानवीय कमजोरी कैसे बचा जाये  

कितना भी सोचते रहें होता तो वहीं है जो चारों और आग की तरह फैला होता हैं देश भर में 60 प्रतिशत काला धन हैं ए केवल 40 प्रतिशत सफेद धन यानि हम ब्लैक होते जा रहे हैं क्या होगा हमारी भावी पीढ़ी का और देश का भविष्य। तीस तारीख आ गयी थी आखिरी दिन था। यूँ ये भी सोच रही थी कि मुझे कौन सा मार्किट हर रोज जाना होता हैं ए फिर ज्यादातर सामान तो बहादुर ही लाता हैं ए छोड़ो पाँच तारीख के बाद देखी जायेगी मन शान्त हो गया था। खुद ही खुद से बात की और शान्त हो लिये वाला हाल था। अब जो होगा भुगतेंगे देखा जायेगा। 

शाम को बाहर निकली तो मेरा पुराना ड्राईवर अर्जुन सामने था। नमस्ते की। 

कब आई मैडम जी, तो मैडम जी आपकी कार की नम्बर प्लेट और पाॅल्यूशन चैक का क्या सरकार का अजब हाल मैडम जी उससे भी अजब हैं लोगों का अब महीना भर पहले आर्डर निकले थे पर लोग सोये रहे जी पर लोगों का भी क्या कसूर कितनी बार सरकार आर्डर वापिस ले लेती हैं न। 

 ये तो हैं अर्जुन।हाँ मुझे भी आने के बाद पता चला। कल गयी थी मार्किट। न नम्बर प्लेट बनी ए न पाॅल्यूशन चैक। पाल्यूशन का सर्टिफिकेट तो मैं यहीं ला दूँगा सौ रूपये में आज रात को ही और नम्बर प्लेट गत्ते की बना कर टांक देंगे अभी तो फिर धीरे धीरे सब शान्त हो जायेगा। तो मुझे बता दें मैं बनवा दूंगा। 

मेरी तो जान में जान आई। जरूरत इजाद की जड़ हैं क्या इजाद हैं सरकार बनाती रही पाॅल्यूशन चैक के नियम ए पर हमारे घरों बाजारों मनों के कोने कुचीलों में जो पाल्यूशन फैला हैं उसे कौन चैक करेगा उसका कौन सा सर्टिफिकेट बनेगा सोचती कितना भी रहूं पर हल तो नहीं मिलता।



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Inspirational