बुक नेस्ट
बुक नेस्ट
वे एक बुजुर्ग से व्यक्ति थे किन्तु तनकर चलतेे, फिट-फाट स्वस्थ , मॅूछों पर ताव देते , युवाओं की तरह चलते - फिरते सज्जन थे जिनकी , ये दुकान थी । दुकान का नाम था - बुक नेस्ट किताबें थीं - ढेर सारी । चारों ओर शेल्फ लगे थे । सभी किताबों से भरे थे । सब चिभिन्न विषयों में बटे थे। विज्ञान और कम्प्यूटर का अलग , समाज विज्ञान , राजनीति शास्त्र , हस्तरेखा विज्ञान, ज्योतिष शास्त्र वास्तु शास्त्र, फेंगशुई आदि एक तरफ, उपन्यास - कहानियाॅ, कविताओं का अलग कोना - वे भी दो हिस्सों में बाॅटा - अ्रगे्रजी , व अन्य भाषएॅ हिन्दी तथा भारत की अन्य भाषाएॅ , पत्र पत्रिकाएॅ - क्या-क्या नहीं था ? लगता था सब कुछ वहाॅ मिलता हैं , मिल सकता हैं । बच्चों की पसन्द से लेकर बड़ों के लिए किताबें , स्वास्थ्य सम्बन्धी , तनाव दूर करने की , होम्योपैथी व आयुर्वेद की । किताबें - किताबें - और किताबें तिस पर लगह-जगह मूढ़े पड़े थे कहीं भी बैठें पन्ने पलटते रहें - पसंद आ गयी और जेब में पैसे हुए तो खरीद लें । वो बुजुर्ग अंकल मुझे देखते ही मुस्काते , प्या से पास बुलाते , कभी किताबों के बारे में बताते , पढ़ने का इसरार भी करते । वहीं मैंने पहली बार ‘ गुनाहों का देवता ‘ पढ़ी थी - एक बार नहीं , बहुत बार । उस समय मेरी उम्र ही ऐसी थी , जिसमें मेरी कल्पना का राजकुमार घोड़े पर बैठकर बार-बार मेरे सपने में आता और ‘ सुघा को मौत के पंजो से छुड़ा लाता । अज्ञेय रचित ‘ नदी के द्वीप ‘ भी पढ़ी ािी । मुझे वह उस उम्र में खास समझ ही नहीं आई थी । प्रेमचन्द की कहानियाॅ शरद- अंगे्रजी में ‘ मिल्स एण्ड बून्स ‘ के छोटे-छोटे उपन्यास ऐन आॅफ गी्रन गेबल्स , प्राइड एण्ड प्रेज्यूडिस आदि अनेक । ‘ बुक नेस्ट‘ के वे बुजुर्ग मुझे बहुत अच्छे लगते थे । आज सोचॅू तो शायद उन व्यक्तियों की प्रजाति अब समाप्त प्रायः हो चली हैं । - उनका व्यक्ति -बेहद प्रभावशाली - धुले-प्रस किये शर्ट और ट्राउजरज - टाई मैचिंग - काले रंग के पालिश किसे शूज , पूरे व्याकरण ष्ठि वाक्य-विन्यास बोलने का लहजा व अदब इतना साफ-स्पष्ट , उर्दू बोलें तो हमजों का ध्यान रखें - हर विषय पर बात करते , - धड़ल्ले से लगता था कि किताब शेल्फ में रखी जाने से पूर्व उनकी निगाह के कैमरे से गुजरती ।ाी सभी भाषाओं के मुहावरे - लोकोक्तियों का प्रयोग आम तौर परर करते । शेर व कविताओं की पंक्तियाॅ बात-बात में उदधृत हो जातीं। ‘‘
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"आओ मांदसाइसिल कहाॅ से तशरीफ7फरमा हैं । बहुत वक्त बाद दिखाई दिया ईद का चाॅद - क्या सुसराल जाने की तैयारी हैं ? - अरे भई अभी जल्दी हैं , 7 कुछ पढ़ ले-सीख लें - ऐसे मौके जिन्दगी कब-कब मुहया करवाती हैं । ‘‘ वगैरह , वगैरह । उनके साथ बात करना , उस ‘ किताब घोंसले में यह बुक नेस्ट ‘ का हिन्दी अनुवाद था , जो मैंने किया था जाना मेरे लिए बेहद सुखद अनुभव होता । वहाॅ पहॅुचती - फुदकती चिड़ियाॅ बनती और किताब-किताब पर मंडराती रहती । ‘ बुक नेस्ट ‘ के सामने की सड़क के पार वह मकान था जिसके चारों ओर ईटों की चारदीवारी बनी थी । दीवार हालांकि झाड़ियों से ढकी थी , पर जहाॅ-तहाॅ से झाॅक रही थी , मिल्कुल काली हो गयी थी , शायद वक्त की कोई से सनी थी । उसी मकान के इधर-उधर ढेरों कूड़ा पड़ा रहता हालाॅकि आस-पास बड़ी - बड़ी कोठीनुमा मकान थे । बड़ी कोठियों की बीच अकेला खड़ा ये पुराना कोई लगा मकान चाॅद में दाग लगता था । - पता नहीं क्यों ? किताबों के बीच से ये पुराना खण्डहरी मकान हमेशा मेरी निगाह अपनी ओर खींच लेता था । मकान के पास के कूड़े के ढेर पर गाय , कुते , सुअर, कौवे और भिखारियों के बच्चे -बड़े साथ-साथ बैठे दीखते , कूड़े के ढेर को देखते हुए मेरे मन में आता रहा था िकवह ढेर एक पूरी इन्डस्ट्री हैं जिसमें पशु- पक्षी , इंसान एक साथ काम करते हैं - बिना किसी जाति या वर्ग भेद के । एक दिन मैैं, बुक नेस्ट‘ वाले अंकल दोस्त उन्होंने मुझे ‘ नन्ही दोस्त ‘ का टाइटल दिया था से पूछ बैठी , ‘‘ मकान किसका है ? कौन रहता है ? कोई ठीक क्यों नहीं करवाता ? इसके चारों और इतने कूड़े के ढेर क्यों हैं ?- यहाॅ, इस एरिया में तो इतनी अच्छी और बड़ी-बड़ी कोठियाॅ हैं ।‘‘
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जनती हैं माॅदमाइसिल किसी भी वस्तु की खूबसूरती को अधिक उभारने के लिए इसके पास कोई गंदी चीज रख देनी चाहिए ।- यही जीवन का नियम हैं ।‘‘ उस दन उनकी बात कुछ समझ आई , कुछ नहीं पर - वे जो भी कहते , जिस लहजे में कहते , मुझे अच्छा लगता । उस दिन की बात सुन कर मुझे याद आया था अपना घर जहाॅ बिन्नी के सुनहरे रेंग - रूप् की तुलना मेरे सांवले रंग से हमशा की जाती रही थी । भैया की तुलना में मैं हमेशा गणित में पीछे रहीती थी । ये सब मेरे भीतर हीन ग्रन्थि उत्पन्न करता रहा था - पर उन बुजुर्ग दोस्त को क्या बताती , चुपचाप घर चली गयी थी । वह मलबे का ढेर मुझे हमेशा जिन्दा था क्योंकि वह लगातार बड़ा और उॅचा होता जाता था - उसका दायार बढ़ता जाता था , ही वहाॅ बैठने ेवाले पशु - पक्षी इंसानों की संख्या भी बढ़ती जाती । वह जड़ - जुगम की पनाह पाने की विचित्र जगह थी । ‘ बुक नेस्ट में किताबों के घोंसलो घुस्ते - पड़ते और उस मलबे के ढेर को दिन-व-दिन बड़ा होता देखते हुए मेरा बचपन बीता रहा था । घर पहॅुचती तो घर की उस आराम तलबी में बैठे ुए या कभी घर के बगीचे में पड़े झूले पर बैठ ठंडी हवा के झोंकों में खोये हुए मेरी निगाह में प्रायः वह ‘ मलबे का ढेर ‘ झाॅक जाता । घर की बालकनी से सामने दीखती सड़क पर चलते रिक्शे , ठेले वाले देखती तो लगता कि ये काम खत्म करके उसी ढेर पर जायेंगे , अपनी बिरादरी में बैठेगें , अपना वक्त बितायेंगे । उस दिन मैं बालकनी में बैठी थी । ठंड़ी हवा का इंतजार था , जो चलने का नाम ही नहीं ले रही थी । मौसम में नमी थी , जिस पर तेज धूप थी । बालकनी में पंखा चला लेने पर भी चैन न मिल रहा था तभी वह रिक्शा चलाने वाला दिखाइ्र दिया था माथे पर से पसीना बहता बर्दन से होता नीचे तक जा रहा था । लम्बी साूस लेने के लिए वह बार-बार मुॅह खोल रहा थ । रिक्शे पर बैठी सवारियाॅ उसे कुछ कहती जा रहीं थी। - शायद जल्दी चलने या रिक्शा तेज चलाने का इसरार कर रही थीं । रिक्शे वाला बार-बार जोर लगाता पर - रिक्शे के पहिए तेजी न पकड़ पा रहे थे। जोर से पैडल मारने के कारण उसका पैर पैडल से फिसल गया । पैडल टखने से टकराया । वह दर्द से मुड़-सा गया । तभी रिक्शे का बैलेंस बिगड़ने लगा , जिसे सॅभालने की कोशिश में वह दर्द की परवाह किये बिना दूसरी ओर झुकने लगा । रिक्शा सॅभल गया था , पर सवारियो ंके क्रोध का ठिकाना न था । वे जोर-जोर से चिल्ला रही थी । मुझे सुन तो न पड़ रहा था , पर रिक्शें वाले के पसीने टपकते चेहरे पर की बेचारगी जरूर दीख रही थी । मन तो कर रहा था क्शिे वाले के लिए ईडे पानी की बोतल लेकर जाउॅ और उसकी ओर से तर्क करूॅ- पर घर के भीतर चली गयी । अचानक कहीं से बजने की आवाज आने लगी । फिल्मी गानों की धुन भी - धम्म - धम्म - धप -धप हमारी कोठी के पिछवाड़े की झोपड़ियाॅ बनी थी । शायद वही शादी के ढोल बज रहे होंगे । मैं पीछे वाली बाल्कनी में जा खड़ी हुई । नदी के पास ही धोबी घाट था , जा कपड़े धोने के लिए जरूरी था।
वहाॅ किनारे पर ढेर से बाॅस एक दूसरे में तिरछे फॅसा कर जमीन में गड़े थोड़ी - थोड़ी दूर पर खड़े थे। बाॅसों के बीच रस्सियाॅ बॅधी थी दो रस्सियों को मिला कर बाॅट दी गयी थी । उन्हीं मेें कपड़ो के कोने फॅसा दिये जाते । कपड़े फैलते ं सूखते रहते पर कपड़े पटक-पटक कर धोते रहते । कपड़े सफेद , धुले , भक्क चमकदार थे । साफ-सुथरे भक्क सफेद कपड़े मन को भा रहे थे । चमकती कोठियों की शानो-शौकत भी उनके धुले कपड़ो के सामने आॅखे चुरा रही थी । वहीं कुछ बच्चे खेल रहे थे - लुका - छुपी का खेल । धोबियों के बच्चे रहे होंगे । सभी नंग-धंड़ग या गन्दे बनियान व कच्छे पहने थे । मुझे सोचने पर विवश होना पड़ा । दूसरों की गन्दगी को धोकर साफ करने वाले लोगों के बच्चे इतने गन्दे क्यों ? बुक नेस्ट वाले अंकल इसे ही क्या चाॅद के धब्बे कहते हैं ? ‘ बुक नेस्ट वाले आंगल से हुई बातों के बाद अब गन्दगी के सभी काले धब्बे मुझे स्पष्ट दीखने लगे थे , ठीक उसी तरह जैसे मम्मी को घर में लगे जाले या रसोई के कोने - कुचीलों में छिपी गन्दगी दीख जाती थी ं अक्सर बहादुर की डाॅट में जो शब्द बोले जाते थे , वे थे। ‘ जाले दीख रहीं रहे बहादुर ‘ - ये देख , रसोई का ये काना कितना गन्दा हैं - सिंक में कितनी चिकर्न हैं , बर्तनों पर ये विम के दाग - बिस्तर की चादर टेढ़ी चैक अब तक नहीं धुला -- । मुझे आश्वर्य होता कि मम्मी की निगाहें कभी घर में आने जाने वाले काम करते नौकरों की जिन्दगी के धब्बे न देख पाती , क्यों ? - मुझे क्यों दिख जाते हैं ? क्या ये सब बुक नेस्ट ‘ वाले अंकल का कमाल हैं , जो प्रायःकहते रहते ‘ किताबें पढ़ना बेहद जरूरी हैं बच्ची तभी साफ या गन्दे , अच्छे बुरे का अंतर पता चलता हैं । यह भी तभी स्वीकार कर पाते हो कि गन्दगी इतनी बुरी चीज भी नहीं होती , बल्कि आवश्यक हैं । जानती हो क्यों ?‘‘
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‘‘क्यों ?‘‘ मैं हैेरान होकर पूछती । मम्मी -पापा को तक गन्दगी से चिढ़ हैं । वे घर की सारी गन्दगी बाहर निकाल फैकना चाहते हैं । बहादुर को सफाई ढंग से न करने पर ढेर-सी डाॅट सहनी पड़ती हैं । सुनीता को बाथरूम दुबारा - दुबारा साफ करने पड़ते हैं । बोतल भर ‘ डिसइन्फेक्टेंट ‘ को प्र्रयोग होता हैं । धाबी को और कपड़े धोने वाली बाई को कपड़ों पर पड़े धब्बे हटाने के लिए बहुत - सी हिदायतें दी जाती हैं । फिर अंकल क्यों कहते हैं गन्दगी जिन्दबी का जरूरी हिस्सा ंहैं ? ‘‘ क्यों अंकल ? गन्दगी न हो तो सब कुछ कितना साफ लगेगा - ये तो अच्छी बात हुई न । ‘‘ ‘‘ हाॅ बिटया । पर - साफ कब होगा ? जब गन्दापन हटेगा - अब तुम रोज कपड़े पहनती हो, गन्दे हो जाते हैं तभी तो धुलते हैं - और जानती हो जिन कीटाणुओं से बीमारी फैलती हैं , उन्हीं कीटाणुओं का इंजेक्शन हमारे शरीर में देकर उस बीमारी से लड़ने की ताकत पैदा की जाती हैं । ‘‘ मैं ‘ चिकन सूप फाॅर द सोल की ओर देख रही थी । अचानक पूछ बैठी - ‘‘ अंकल चिन सूप क्यों ? ये सूप टमाटर , मअर , पालक या फिर बादाम बगैरह का क्यों नहीं हो सकता हैं - फिर ये ‘ सोल ‘ यानी ‘ आतमा ‘ के लिए कैसे होगा ‘‘ बुजुर्ग दोस्त खिलखिला पड़े । हॅसते हुए उनके चेहरे पर पड़ी लाइनें मुखार हो जाती थी , पर तब वे लगते भोले - भाले , बच्चों जैसे । बोले - ‘‘ ये पश्चिम का कल्चर हैं। वे लोग चिकन के सूप तो सबसे ज्यादा ताकत देने चाले मानते हैं । तुम अगर ऐसी किताब लिखो तो खिना ‘ आत्मा के लिए ठ्रडाई ‘ । भई ये गरम देश हैं , यहाॅ ठंडाई चाहिए । फिर ठंडाई में बादाम और मगज-ताकत वाली चीजें तो होती ही हैं । - कहते हुए वे खुद अपने मजाक पर ‘ हो - होकर हॅस पड़े । मैं भी खिलखिला उठी थी ं ‘‘ सच अंकल मैं दो किताबें जरूर लिखॅूगी - बड़ा होकर । एक तो ‘ आत्मा के लिए आदाम की ठंडाई ‘ और दूसरी - ।‘‘ ‘‘ दूसरी - ? ‘‘ अंकल मेरे करीब आ गये । उनके चेहरे की उत्सुकता मुझ तक पहुॅच रही थी । ‘‘ दूसरी - दूसरी - चाॅद के काले धब्बे ।‘‘ फिर तो बस ठहाके - ठहाके - ठहाके - हवा में गूॅज उठे ।
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डस दिन मैं घर लौटते हुए मलबे के ढेर की उॅचाई , लम्बाई - चैड़ाई मापती रही थी । हल्के बादल थे । सीलन बढ़ गयी थी । ऐसे में जरा-सी भी धूप शरीर में काॅटे चुभा रही थी । मलबे के ढेर पर एक कुता और एक भिखारी साथ- साथ सोये पड़े थे - पिछले जन्म के दोस्तों जैसे । इधर घर में सब कुछ सलीके से सजा-धजा था कुछ भी इधर-उधर कर सकने की गुंजाइश न छोड़ते हुए । इतनी सारी साज-सज्जा , नौकर-चाकरों की कतार से काम करवाती मम्ी तथा पापा , बिन्नी , भैया सब के होते हुए भी मैं केला महसूसती रही अपनी कल्पना के ढेरों घोड़ो दौड़ती पर कहीं न पहुॅचती । टी,वी, का पर्छा , रेडिया पर के गानों की आवाज , कल्पन की उॅची पींगें , कुछ में भी मन न रम पाता , खोया-खोया रहता । अपने कमरे के सारे आरामों के बीच जीते हुए मुझे सामने की झोपड़-पटटी के लोग , पीछे का वह धोबी-घाट, उनके बच्चे , रिक्शे वाला , का ढेर पता नहीं क्यों ये सब अपनी ओर खींचते रहते । क्यों , नहीं जानती एक दिन अंकल से पूछ बैठी-‘‘ कुछ नहीं बच्चे । ये तो सिर्फ जो दूर हो उसे जानने की उत्सुकता भर हैं । तुम्हें या तुम्हारे घर के लोगों को जिन्दगी की रोजमर्रा की जरूरतें जुटाने के लिए रोज7रोज युद्व नहीं झेलना पड़ता हें न । इन सुविधाओं के बीच रहेत हुए एक आश्चर्य भाव जनमता हैं उन लोगों के प्रति जिनके पास कुछ भी नहीं हैं । - ऐसे ढेर से प्रश्न हमारे मन में हमसे दूर दीखती चीजों के लिए उगते ही रहते हैं । ‘‘ अंकल और भी बहुत कुछ बोलते रहें । मैं कुछ समझ पाती , बहुत कुछ नहीं ।
वक्त का बीतना आवश्यम्भावी हैं । वह बीतता रहा मेरा विवाह हो गया । राॅल्स रायस में बैठ कर में अने घर से ज्यादा बड़े बंगले में चली गयी. बड़े घराने के वे लोग , बड़ी शानो शौकत भरी दावत और ढेर-से चढ़ावे के साथ मुझे अपने राजमहल में ले गये. जोधपुरी कारीगरी के दरवाजे , पीतल के हाथी की सूंड जैसे हैडल , अरवाजो पर लकड़ी की गोलाकार मेहराब , ड्राईगरूम में खमखाम के पर्द , ढेरों कट ग्लास के क्यूरोज , कश्मीरी कढ़ाई के कुशन , जापान चीन , अमेरिका , अरब, इटली से खरीदे गये आर्टीफेक्टस - मुझे किसी ‘ म्यूजियम ‘ में घुस पड़ने का अहसास हुआ था. वह राजमहल बेहद आकर्षक व खूबसूरत था , पर जिससे मेरा विवाह हुआ था , वह मेरी मल्पना के राजकुमार जैसा बिल्कुल न था , जिसे घोड़े पर चढ़कर आना था । यॅू भी घोड़े की टापों की आवाज ‘ राॅल्स राॅयस ‘ में तो न आ सकती थी ।
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ससुराल , के उस बड़े से राजमहल में , राजसी रीति-रिवाजों , परम्पराओं के बीच मुझे रम जाना था और खो जाना चाहिए था जो कोशिश करके भी मैं न कर पाती थी - पर बताती किसको और कैसे ? पार्टियाॅ-पार्टियाॅ और पार्टियाॅ उॅचे दर्जे की भी - उॅचे लोगों की भी - हालांकि उनकी हरकतें देखती तो मन उन्हें उॅचा मानने से इन्कार कर देता । इन पार्टियों में सर्विस करते बैरों को अपमानित करने में कोई कसर न रखी जाती , शराब की नदियाॅ बहती , नग्नता ओर सेक्स का घृणात्मक दिखावा होता जिसमें बड़ी- छोटी उम्र या रिश्ते का भेद भाव न रहता । पार्टियों की कतार लम्बी थी । एक पार्टी से दूसरी - घर आये , कपड़े बदले , आभूषणों की होड़ लगी , लम्बी - लम्बी कारें दौड़ी और शराब के नशे में चूर घर लौटे , बिस्तर पड़े और बस - दिन खत्म ।मैं इस दिनचर्या को समझ न पा रही थी दिन किसी नशे के तहत बीत रहा था । दिन - रात - दिन - बहती कथा - बीतता वक्त । इसी तरह साल बीत गया । न मुझे मलबा याद रहा , न रिक्शे वाले , न धोबीघाट , न मेरी कल्पना के घोड़े पर चढ़ कर आता राजकुमार । कठपुतली बनी थी मैं - डारे पता नहीं , किसके हाथ में थी - कठपुतली - सी चलती , मुड़ती , नाचती बोलती रहती । साल बीता - मम्मी - पापा मिलने आये । मैं मानों सपने से जाग उठी । मम्मी के बेहद इसरार पर सासु माॅ मुझे कुछ दिन के लिए मम्मा के साथ भेजने को तैयार हो गयी और मैं अपने घर - पता नहीं अ बवह घर मेरा बच रहा था या नहीं - यहीं सुनती आई थी आ गयी दिमाग में की रील उल्टी चल उठी । आगे की बाल्कनी में गयी तो रिक्शे वाले दीखे , पीछे धोबी घाट , फिर ‘ बुक नेस्ट और इसके पास पड़ा मलबे का ढेर उसी शाम मैं ‘ बुक नेस्ट ‘ में पहुॅच गयी - भागती हुई - साल भर बाद जागी डगमग करती गुड़िया - सी । अंगल दोस्त अपनी पुरानी अदा के साथ वहीं थे - किताबों को उठाते - रखते जानकारी लेते देते । मुझे देखते ही आगे आये तपाक से किले - ‘ ‘ आह माॅदमाइसिल । कैसे स्वागत करें आपका ? ‘‘ कहते हुए उन्होंने सीने पर हाथ रखा , घुटना मोड़ कर अंगे्रजी ‘ नाईट ‘ की तरह सिर झुकाया । फिर क्या था ? दोनों खिलखिला उठे । सालभर की नींद से जाग उठी मैं - । कितना जरूरी है बार-बार अपना बचपन जीना - नही तो हम असली मौत से पहले ही न मर जायेंगे । सामने निगाह स्वतः ही चली गयी । मलबे का ढेर न दीखा । दुकान के बाहर जाकर देखा । सचमुच मलबे का ढेर वहाॅ न था - न।,वह पुनाना खण्डहरी मकान बचा था । खुदाई हो रही थी - मजदूर काम कर रहे थे ‘‘ अंकल । वो सामने का ‘ चाॅद का धब्बा ‘ कहाॅ गया ? ‘‘ अंकल जरा - सा चुपा आये फिर बोले , वहाॅ एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बन रही हैं । अब लोग सिर्फ दांये - बांये नहीं फैल रहे हैं , नीचे उपर भी उनका फैलाब हैं । हब उन्हे जमीन ही नहीं आसमान भी चाहिए ।‘‘ पर - पर अंकल । ‘‘ मैं समझ न पा रही थी कि ये अच्छा हो रहा हैं या बुरा, एक वर्ष में मेरी तो दुनिया ही बदल गयी थी सालभर से मेरी निगाह किसी गन्दगी व धब्बे पर न पड़ी थी । मुझे घबराहट होने लगी । अब क्या होगा मेरी किताब का ? साफ-सुथरा , धुला चमकदार देखते - देखते मेरी नजरिया ही बदल जायेगा । फिर खूबसूरती की अहमियत बच भी रहेगी क्या ? मैं कुछ बोल न पा रही थी , पर मौन भी तो बोलता हैं । अंकल मेरे भीतर उठते प्रश्नों के सर्पो का लहनाना देख रहे थे शायद । उन्होंने मेरे कन्धे पर हाथ रखा, मुझे भीतर ले आये । अब वे नयी किताबों के बारे में बताने लगे थे और मैं उनमें ध्यान लगाने की कोशिश कर रही थी ।
