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Santosh Goyal

Others

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Santosh Goyal

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एक दिन का महिला दिवस

एक दिन का महिला दिवस

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‘‘ वह बहुत - बहुत सुन्दर थी । उसकी सुन्दरता का बखान किया ही न जा सकता हैं मां । ‘‘ जब वह उसके सौन्दर्य को याद कर रहा था , उसकी आँखों में ढली सुन्दरता का चमक देखी जा सकती थी । ऐसा लग उठा था कि वह सुन्दरता पिघलकर उसकी ओर - छोर भीगा गयी हों , वह उसी में डूब कर निखर गया हों । इतना निखार कि उसके चेहरे की चमक गालों का रंग और आॅखों से बिखरता किरणे मुझ तक पहुॅच रही हैं। 

मैं भी उसके अनुपस्थित सौन्दर्य में डूब - तिरने लगी थी । ‘‘ अच्छी -- अच्छा ! सुन्दर तो थी - अतीव सुन्दर पर -- तुम तो उसकी क्था सुना रहे थे । मैं ‘ केवल बीच ‘ पर लहरों का मजा लेती बैठी थी । गीता और उषा भी साथ थे । उस दिन महिला दिवस ‘ था जिस पर हमारी गरमागरम बहस चल रही थी । मैं इस एक दिन के महिला दिवस से इतफाक न रखती थी । मेरा कहना था , ‘‘ छोड़िये । यह महिला दिवा का शोशा । अबल ज्यादासर महिलाएं उसके बारें में जानती ही नहीं हैं जो दो - चार प्रतिशत जानती भी हैं , उनकी भी अधिक प्रतिशत उस दिन भी हर रोज वाले काम करती हैं। यदी कुछ कहें तो प्राय सुनने को मिल जाता हैं -- ‘‘ महिला दिवस मनने लगा तो मतलब ये नहीं कि तुम और तुम्हारा ओहदा बदल गया हैं वहीं - की वहीं खड़ी हो जहाॅं पर शुरू से थी -- अब हम कहेंगे , तभी तो आगे बढ़ोगी । ‘‘ एक प्रतिशित मेरे जैसी हैं जो एक दिन के महिला दिवस का विरोध करती हैं । शेष कुछ आजादी के नाम पर पुरूष बनने के चक्कर अपने गुण त्याग

रहीं हैं। पता नहीं -- इस सबका क्या मतलब हैं। ‘‘" उषा और गीता मेरी बात से सहमत तो थी पर साथ हीं , ‘‘ अरे यार । कम से कम एक दिन के लिए ही नहीं ‘ महिलाओं के अधिकारों के बारें में बात चीत तो शुरू हुई -- फिर हमारी भी तो कमजोरी हैं । हम कौन सा अपने अधिकारों के बारें में उस तरह हैं जैसे कर्तव्य के बारें में । ‘‘ सच ही । ‘‘ गीता श्री बोल उठी , ‘‘ बिलकुल हमे पता हैं हमारा बेटी के रूप में बहन पत्नी बनकर माॅ बनकर -- सब रूपों में कर्तव्य क्या -2 हैं और उन्हें सजग - सचेत होकर निभाती हैं न । ‘‘ ‘‘ बिल्कुल । , उस सब में यह भूल जाती हैं कि हम कौन हैं , हमे क्या चाहिए , हमारी कोई माॅंग हैं भी या नहीं । ‘‘ तर्क - वितर्क का क्या ? सागर की लहरों के मजे को तर्क - वितर्क की लहरों ने दबा दिया । अपने अधिकारों के प्रति सजग हम तीनों के भीतर क्रोध की लहर उठी तो -- पर उॅचाई पर पहॅुच कर जमीन के गुरूत्वाकर्षण से बंधी उसी तेजी से नीचे आ गयी । 

वह थोड़ी दूर पर बैठा था । बहस करते समय हमारी आवाज की बुलन्दी ने उसे हमारी बाते सुनने को विवश किया होगा , तभी तो वह उठ कर हमारे पास आ गया , ‘‘ प्रणाम माॅ ! आपकी बातें सुन रहा था । कुछ बताना चाहता था -- यहाॅ की बहुत जानकारी हैं -- अगर आप लोग सुनना चाहें तो ।‘‘ तभी उसने किसी महिला के अतीव सौन्दर्य का मनभावन लुभावन चित्र खीचा था उसके ‘ माॅं ‘ कहने पर हम चैके तो , किन्तु पिछले तीन दिन दक्षिण में हर छोटी बड़ी स्त्री या लड़की सभी का माॅ ‘ सम्बोधन मिलता हैं 

यह बात अब तक जान गये थे अतः बोल उठे , ‘‘ यहाॅ की कोई दिल चस्प घटना हैं तो जरूर सुनाओं भई । किसी भी प्रदेश के बारे में भीतरी तथ्यों को जानने की हम सब में ललक हैं । तुम सुनाओं । हम सुनेंगे ।‘‘ इस तरह अत्याधुनिक ढंग से सजाधजा को बलम बीच, इस के सामने बनी नव सुसज्जित तथा आधुनिक उपकरर्णो से भरपूर होटलों की कतार को देखकर आनन्द में डूबने वाले हम लोगों में वहाॅ के व्यक्तित्व का इतिहास को जानने की इच्छा भी रखने वाला पक्ष उभर कर आ रहा था । सीढ़ियों पर बैठे हम लोग उठकर सामने लगे बैच पर बैठ गये । उसके बैठ जाने पर मैं अचानक पूछ बैठी -- ‘ क्या आप यहाॅ के बारें में कुछ बता सकते हैं ? ‘‘ कुछ जानता हॅू । -- परन्तु और जानकारी की छोड़िये । आप अभी महिला दिवस की चर्चा कर रही थी । मैं सुन रहा था -- उसी से खिंचा यहाॅ आ गया हॅू -- औरत की आजादी की लड़ाई अनेक वार्षो से चलती आ रही हैं। भारत में अलग - अलग स्टेट में अलग तरीके से -- आपने सरकार या राजा द्वारा लगाये गये अनेक करों के बारें में सुना होगा माॅ , परन्तु आप अपने स्तन ढाॅप कर मार्किट में निकलें तो आपको कर देना पड़ेगा , यह तो नहीं सुना होगा न । ‘‘ क्या -- आ ? ऐसा भी कोई कर होता हैं , जो यहाॅ लगाया गया हो ? हम तो नहीं जानते । ‘‘ उन्नीसवी सदी में ट्रावकोर राज्य में निन्म स्तर की महिलाओं को बाहर मार्किट में जाते समय अपने स्तन ढापने की इजाजत नहीं थी । केवल ब्राहम्ण महिलाये को ही यह सुविधा मिलती थी 

ळमारे चेहरे मुंह आॅखे सभी से झताक रही थी । अवनों के साथ ये कैसा व्यावहार व चेहरे पर यही प्रश्न लटका पड़ा था । उसी को देखते हुए वह

बोला था ,

‘‘ हैरान न हों माॅ । केरला के चेरथला नगर के पास का एक गांव मुलाची परम्बु ‘ के नाम से आज तक जान जाता हैं। मुलाची ‘ का मतलब जानती हैं क्या होता हैं ? ‘ मुलाची ‘ का अर्थ हैं ‘ औरत जिसकी बड़ी - बड़ी ‘ ब्रेस्ट‘ हों । ‘ ब्रेस्ट का मतलब जानती हैं न आप ?‘‘ उसकी नजरें कही। और थी पर वह पूछ हमसे रहा था । ‘‘ हाॅ -- हाॅ -- जानते हैं। अगे्रजी र्का ब्रेस्ट‘ ना । -- यानी स्त्री के सवन । ‘‘ हमने भी उससे नजरें मिलाये बिना कह दिया । और की अजीव कहानी -- भगवान के दिये शरीर का ऐसा मजाक ‘ बनाने का हक किसी सरकार को , राजा को , पुरूष को किसने दिया और क्यों ? मन झंझावात बना । जानने की इच्छा प्रबल से प्रबल तर हो गयी थी । ‘‘ तो क्या ? इस नाम के गाॅव की कोई क्था हैं जो इतिहास के पन्नों से या आजादी की लड़ाई से जुड़ी हाॅ? ‘‘ जी । माॅ । आपको बताया था न 19 वीं सदी के शुरू की शायद 1803 की रही होगी बात हैं । वहीं नांगेली या नाचेली नाम की एक स्त्री रहती थी , जो अन्यन्त सुन्दर थी । नांगेली ‘ का अर्थ होता हैं । अतीव सुन्दरी ‘ । ‘‘ 

18 वी सदी में ही ट्रविनकोर को गारथंडा वर्या ने राजसी राज्य बनाया , उसकी सीमा बढ़ाई , अनेक पड़ौसी राज्य उसने मिलाये और अनेक अजीब - अजीव टैक्स लगाये 100 से अधिक टैक्स अवर्णो पर लगाये गये । मसालों पर लगाया गया टैक्स ‘ पधनाम मन्दिर में जमा किया जाता था । ‘‘ पर -- आप तो नांगेली के बारे में बता रहे थे । ‘‘ मेरे साथियों की दिलस्पी ‘ ब्रेस्ट टैक्स ‘ के बारे में जानने के लिए बेचैन हो रही थी । ‘‘ जी । पर -- टैक्स के बारे में तो बताना होगा । अवर्ण महिलाओं को घर से बाहर निकलने अपनी ब्रैस्ट ं

को उघाड़ कर रखना होता था उसी से अवर्ण और सवर्ण की जानकारी मिलती थी । केरला में ऐसी मानवीयता विरोधी परम्परा थी , शायद कोई जानता होगा सवर्ण जाति के लोग अवर्णाे के साथ जंगल और शर्मनाक व्यवहार करते थे । ‘‘ --- वह थोड़ा रूका । क्रोध उसके माथे की लकीरों में देखा जा सकता था । क्रोध इस प्रथा के विरोंध में था , पर शायद वह अपने प्रदेश के शर्मनाक इतिहास को बता रहा था , इस कारण भी हो सकता था , हालांकि असल में तो वह स्त्रियों की आजादी की लड़ाई में भागी दारी की बात कर रहा था । ‘‘ हाॅ -- हाॅ-- अजीब शर्म सार कर देने वाला टैक्स था -- अगर कोई औरत स्तन ढाॅप ले तो -- तो क्या होता था ? स्त्री का स्तन तो भावी पीढ़ी की जन्मदासी माॅ के होते हैं। ‘‘ जी। माॅ ! जिसकी जितनी बर्ड़ी ब्रेस्ट ‘ हो , उतना ही ज्यादा टैक्स लगाया जाता था 

-- नांगेली या नांचेली , का यह बात स्वीकार न था । और भी बहुत सी महिलाएं विरोध करना चाहती थी , पर हिम्मत न जुटा पा रही थी । -- यह ऐसा टैक्स था जो धर्म और जाति भेद के नाम से लगाया जाता था । ‘‘ ‘‘ क्या उस समर्य मानव अधिकार ‘ के लिए लड़े ,ऐसी कोई संस्थाएं न होती थी ?‘‘ होती भी पर माॅ , पर इतनी शक्तिशाली न थी । 19 वी शती में हैं दक्षिण के कायम कुलम र्में मानव अधिकार ‘ के लिए ‘ अरातुपुजहा वेलायुद्ध पत्नि कर ‘ ने एक संस्था बनायी भी जिसने स्कूल , लायब्रेरी , मन्दिर बनाये जो विशेषतया अवर्णो के लिए थे किन्तु इस प्रथा का विरोध नहीं हुआ । -- नांचेली अवर्ण थी । बाहर जाने से पूर्व स्वयं को ढाॅप कर जाती थी । परिणाम , उस पर टैक्स लगा दिया गया । ‘‘ फिर -- उसने टैक्स दिया क्या ?‘‘ नहीं । कहाॅ से देती ? मजदूर लोग खाने पीने - जीने का जुगाड़ 

ही कठिनता से करते थे , टैक्स देने का सवाल ही न था । ‘‘ तब तो उसे जेल में डाल दिया होगाा ? ‘‘ हम तीनों आपस में बात करने लगें था । ‘‘ शायद पकड़ कर अपने घर में वधुआ मजदूर बना कर काम पर लगा दिया होगा । ‘‘ गीता का कथन था , ‘‘ नहीं ! उन दिनों तो और भी शर्मनाक सजाएं होती थी । शायद नंगा कर नगर में घुमाया भी जाता रहा होगा । ‘‘ उषा जीने अपना मत दिया । ‘‘ आप ठीक कह रहीं हैं गीता और उषा जी । ये तब ही नहीं आजकल भी होता हैं , दूर दराज के गाॅवों में तो होता ही हैं। कोई कोई खबर तो अखबार में छप भी जाती हैं । अभी पिछगीता और उषा जी । ये तब ही नहीं आजकल भी होता हैं , दूर दराज के गाॅवों में तो होता ही हैं। कोई कोई खबर तो अखबार में छप भी जाती हैं । अभी पिछेले दिनों एक खबर एक खबर अखबार में पढ़ी तो थी --कहीं की थी , याद नहीं । ‘ ‘‘ अजब हैं सब । औरत में शर्म - हया हानी चाहिएं , उसे ढाॅप कर रहना चाहिएं , अपनी पवित्रता की रक्षा करनी चाहिए --- जाने कितनी , परिभाषाएं और कितनी शर्मनाक सजाये और टैक्स -- लगो वाले कौन ? ‘‘ गीता जी भड़क उठी थी । ‘‘ ये जाति , धर्म , शक्ति के नाम पर अत्याचारी समाज के रखवाले ?‘‘ आप सही कह रही हैं माॅ ? नांचेली के साथ वह सब तो न हुआ -- पर एक दिन गाॅव का टैक्स लेने वाला , उस पर लगा टैक्स लेने उसके घर पहुॅच गया और टैक्स माॅंगने लगा । ‘‘ -- नांचेली ‘ टैक्स कहाॅ से देती बोली , रूको यही । वह अन्दर गयी । अपनी ब्रेस्ट काट डाली उन्हें थाली में रख , बहते खून में थप थप बाहर आई कर्मचारी को देते हुए कहाॅ , ‘‘ लो टैक्स और वहीं दम तोड़ दिया ।‘‘ हम सबऔरत की आजादी का नारा लगाने वालें --

अचम्भित , आश्चर्यचकित और भैचक बैठे थे -- सन्नटा छाया था -- बाहर भी और भीतर भी । सामने के सागर में उठती लहरों की आवाज जो पहले संगीत बिखेरती लग रही थी, अब रोती - बिलखती लग उठी थी । नांचेली के भीतर का उबाल , उफान , शर्म का अहसास स्तन काट देने का दुःख दर्द हमारें अन्दर था तो लेकिन एक गले - सड़े टैक्स के विरोंध करने की शक्ति के प्रति मस्तक झुका था । नांचेली नमनीय थी । कौन कहता हैं महिला आज सजग - सचेत हुई हैं -- वह तो सदा से जगी हैं , औरों को जगाती हैं , उसी के कारण संसार चैतन्य होता हैं । हम लोगों की चुप्पी को तोड़ता हुआ वह बोला , ‘‘ अगले दिन ही महाराजा ट्रावनकोर नेये टैक्स खत्म कर दिया । नांचेली का पति कन्दापन जब काम से घर लौटा तो पत्नी की स्थिति , देखकर विषाद और गर्व दोनों प्रतिक्रियाओं के साथ पत्नी के दाह संस्कार की आग में कूद गया । किसी पुरूष के पत्नी के साथ जल मरने (सती हो जाने की ) शायद ये पहली और एकमात्र घटना होगी तभी ये गाॅर्व मुलाची परम्बु ‘ कहलाता हैं । महिलाओं की आजादी की लड़ाई में ऐसी घटना अपने - आप में अनोंखी और अकेली होगी । है न माॅ । ‘‘ सच कह रहे हो भाई । तुम तो आज ऐसे इतिहासकार के रूप में मिले हो जिसने केरला का प्राचीन इतिहास के पन्ने पलट कर हमारे सामने रख दिये हो। । आज तो सचमुच ही हमर्ने महिला दिवस ‘ अच्छे से मनाया ही नहीं जान - समझा - परखा भी । यह भी समझे कि हर कण में का अपना महत्व हैं , हर बूंद का अपना तथ्य । कंण ‘ अगर ‘‘ समूचा ‘ हैं र्तो बूंद ‘ पूरा सागर ‘ तब एक दिन ‘ एक युग क्यों नहीं हो सकता । थैक यू भाई । ‘‘ 


केरल का तीन दिन की वह यात्रा युगों की यात्रा बन गयी । महिलाओं की आवाज उनकी अपनी हो , उनका निर्णय उनका अपना , उनकी सांसे उनकी अपनी और जीवन उनका अपना हो , इस लक्ष्य को पाने के लिए एक दिन र्का महिला दिवस ‘ एक सुखद प्रारम्भ तो है ही । 

मन को कितना सुख , कितनी शान्ति तसल्ली मिली उस दिन - कोवलम बीच की ठंडी , सागर के पानी के झोंकों के बीच । अस्तितव ज्ञान का ये सफर सचमुच ‘ आई ओपनर था।


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