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Anand Mishra

Action

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Anand Mishra

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नवंबर का महीना

नवंबर का महीना

2 mins
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शिमला
वर्ष 2035

1 नवंबर।

दिल्ली के प्रसिद्ध कॉर्पोरेट रणनीतिकार आरव मेहता की दुनिया समय-सारिणियों में बँटी हुई थी।

हर मिनट का हिसाब।

हर निर्णय का लाभ।

हर संबंध का उद्देश्य।

उनके सहयोगी मज़ाक में कहते थे—

"आरव के कैलेंडर में भावनाओं के लिए कोई समय नहीं है।"

आरव मुस्कुरा देते।

उन्हें लगता था कि यही सफलता की कीमत है।

एक दिन एक व्याख्यान के लिए वे शिमला पहुँचे।

वहाँ उनकी मुलाकात हुई—

नैना से।

वह पहाड़ों में एक छोटे सामुदायिक पुस्तकालय और जीवन-कौशल केंद्र का संचालन करती थी।

वह अनाथ बच्चों, अकेले वृद्धों और मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों के साथ काम करती थी।

पहली मुलाकात में ही दोनों की बहस हो गई।

आरव बोले—

"समय सबसे मूल्यवान संसाधन है।"

नैना मुस्कुराई।

"नहीं।"

"ध्यान सबसे मूल्यवान संसाधन है।"

"समय तो सबके पास चौबीस घंटे ही होते हैं।"

बात वहीं समाप्त हो गई।

अगले दिन आरव की उड़ान खराब मौसम के कारण रद्द हो गई।

उन्हें एक महीने शिमला में रुकना पड़ा।

नैना ने सहजता से कहा—

"यदि सचमुच समय मिल गया है..."

"...तो उसे भरने की जल्दी मत कीजिए।"

धीरे-धीरे आरव उसके साथ पुस्तकालय जाने लगे।

बच्चों को गणित पढ़ाने लगे।

वृद्धों की कहानियाँ सुनने लगे।

पहाड़ों पर बिना किसी उद्देश्य के चलने लगे।

पहली बार उन्होंने बिना घड़ी देखे एक पूरा दिन बिताया।

महीने के बीच में आरव ने देखा कि नैना अक्सर अस्पताल जाती है।

वह लौटकर विषय बदल देती।

एक दिन उन्होंने पूछा—

"क्या बात है?"

नैना कुछ देर चुप रही।

फिर बोली—

"मैं एक दुर्लभ हृदय रोग के साथ जी रही हूँ।"

"डॉक्टरों ने समय नहीं बताया।"

"मैंने भी कभी पूछा नहीं।"

आरव स्तब्ध रह गए।

"फिर भी तुम हर दिन दूसरों के लिए क्यों जीती हो?"

नैना ने खिड़की से गिरती बर्फ़ को देखते हुए कहा—

"जीवन की लंबाई मेरे हाथ में नहीं है।"

"लेकिन किसी के दिन को थोड़ा बेहतर बना देना..."

"...वह आज भी मेरे हाथ में है।"

नवंबर का अंतिम सप्ताह आ गया।

आरव की वापसी का दिन भी।

उन्होंने कहा—

"दिल्ली चलो।"

"सबसे अच्छे चिकित्सकों से इलाज कराएँगे।"

नैना मुस्कुराई।

"इलाज कराऊँगी।"

"लेकिन अपने जीवन से भागकर नहीं।"

"मैंने इस जगह को अपना समय दिया है।"

"अब यह जगह मुझे अर्थ देती है।"

30 नवंबर।

आरव स्टेशन पहुँचे।

नैना उन्हें विदा करने आई।

कोई बड़ा वादा नहीं हुआ।

कोई नाटकीय संवाद नहीं।

सिर्फ़ एक छोटी-सी डायरी।

उसके पहले पृष्ठ पर लिखा था—

"हर महीने एक दिन ऐसा बिताना,
 जिसमें कोई लक्ष्य न हो।
 केवल लोग हों।"

आरव दिल्ली लौट आए।

उन्होंने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी।

सफलता भी नहीं छोड़ी।

लेकिन हर महीने एक सप्ताहांत वे किसी ऐसे स्थान पर जाने लगे जहाँ लोग उनके पद या उपलब्धियों से नहीं...

उनकी उपस्थिति से प्रसन्न होते थे।

डायरी से

1 नवंबर, पाँच वर्ष बाद

"आज फिर नवंबर शुरू हुआ।

कैलेंडर अब भी व्यस्त है।

बैठकें भी हैं।

निर्णय भी हैं।

लेकिन अब मैं जानता हूँ कि जीवन उपलब्धियों से नहीं थकता...

जीवन अर्थहीन व्यस्तता से थकता है।

कभी-कभी एक महीना पूरे जीवन का मार्ग बदल देता है।"



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