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Chandni Purohit

Romance

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Chandni Purohit

Romance

मन की माला

मन की माला

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कहते हैं, कुछ लोग रिश्ते बनाते हैं और कुछ लोग रिश्तों को जीते हैं।

मीरा दूसरी तरह की लड़की थी।

उसके लिए प्रेम कोई ऐसा शब्द नहीं था जिसे आज किसी के लिए कहा और कल परिस्थितियाँ बदलने पर वापस ले लिया। उसने ज़िंदगी में जिसे अपना माना, पूरे मन से माना। दोस्ती की तो निभाई, परिवार से प्रेम किया तो उसके लिए खड़ी रही, अपने साथ काम करने वालों को भी सिर्फ़ सहकर्मी नहीं समझा—उनका हाथ पकड़कर आगे बढ़ाना अपनी जिम्मेदारी समझी।

और जब उसने आरव से प्रेम किया, तो उसमें भी कोई आधा-अधूरापन नहीं था।

उसने आरव से केवल शादी नहीं की थी। उसने उसके साथ एक उम्र की कल्पना की थी।

एक घर।
कुछ छोटी-छोटी लड़ाइयाँ।
फिर मान जाना।
मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का हाथ।
बुढ़ापे तक साथ बैठकर बीते दिनों को याद करना।

उसने प्रेम को हमेशा इसी तरह समझा था।

लेकिन ज़िंदगी अक्सर हमारी परिभाषाओं के अनुसार नहीं चलती।

समय के साथ उनके बीच मतभेद बढ़ने लगे। बातों ने बहस का रूप लिया, बहस ने गुस्से का और कभी-कभी गुस्सा उन सीमाओं से भी आगे निकल गया जहाँ शब्द अपमान बन जाते हैं और व्यवहार हिंसा तक पहुँच जाता है।

मीरा के लिए सबसे मुश्किल यह नहीं था कि आरव उससे नाराज़ था।

मुश्किल यह था कि धीरे-धीरे वे सीमाएँ टूट रही थीं जिन्हें वह रिश्ते में अटूट समझती थी।

उसके कुछ उसूल थे।

कुछ सिद्धांत।

कुछ रिश्ते जिन्हें लेकर उसके भीतर बहुत स्पष्ट सीमाएँ थीं।

उसे लगता था कि नाराज़गी कितनी भी हो, कुछ शब्द नहीं कहे जाते। कुछ रिश्तों को लड़ाई में नहीं घसीटा जाता। किसी के माता-पिता और परिवार का अपमान करके कोई लड़ाई जीती नहीं जाती।

लेकिन एक-एक करके वही सीमाएँ पार होने लगीं।

मीरा को कभी-कभी लगता जैसे उसने अपने मन के सारे एहसासों को एक-एक मोती की तरह पिरोकर एक माला बनाई थी।

विश्वास का एक मोती।
प्रेम का एक।
सम्मान का एक।
साथ का एक।
भविष्य के सपनों का एक।

और अब उस माला का धागा कहीं से खुल गया था।

एक मोती गिरता तो वह दौड़कर उठा लेती।

फिर दूसरा गिरता।

वह उसे भी जोड़ती।

तब तक तीसरा निकल जाता।

काफी समय तक उसने यही किया—समेटती रही, जोड़ती रही, बचाती रही।

फिर एक दिन उसके भीतर से आवाज़ आई—

“कब तक?”

उस दिन उसने माला फेंकी नहीं।

उसने बस उसे जबरदस्ती जोड़ना बंद कर दिया।

---

फिर आई वह दिवाली।

शहर रोशनी में नहाया हुआ था। घरों के बाहर दीये जल रहे थे। लोग महालक्ष्मी का स्वागत कर रहे थे।

लेकिन मीरा के घर के भीतर उस रात रोशनी से ज्यादा बेचैनी थी।

बात बिगड़ चुकी थी।

आरव गुस्से में था।

और फिर उसकी नाराज़गी मीरा से निकलकर उसकी माँ तक पहुँच गई।

शब्द आते गए।

एक के बाद एक।

ऐसे शब्द जिन्हें सुनते हुए मीरा के भीतर कुछ लगातार टूट रहा था।

वह माँ, जिससे उसका अस्तित्व था।

जिस स्त्री ने उसे जन्म दिया, पाला, मजबूत बनाया—उसी के लिए महालक्ष्मी की रात ऐसे शब्द सुनना मीरा के लिए असहनीय था।

वह चाहती तो उसी भाषा में जवाब दे सकती थी।

चिल्ला सकती थी।

रिश्ता उसी रात खत्म घोषित कर सकती थी।

लेकिन उसने कुछ और किया।

वह रात के लगभग तीन बजे तक रोती रही।

और बार-बार सिर्फ़ एक बात कहती रही—

“प्लीज़, एक बार घर आ जाओ।”

उसने हाथ तक जोड़ दिए।

उसके भीतर शायद कोई चीज़ आने वाले वक्त को पहले ही महसूस कर रही थी।

उसने कहा—

“आज वापस आ जाओ। इसके बाद समय बहुत खराब हो जाएगा। बहुत कुछ पीछे छूट जाएगा। शायद फिर हम वैसे नहीं रह पाएँगे जैसे अभी तक थे।”

लेकिन आरव नहीं आया।

और कुछ रातें कैलेंडर पर खत्म हो जाती हैं, मगर इंसान के भीतर कभी पूरी तरह खत्म नहीं होतीं।

दिवाली गुजर गई।

अगली सुबह हुई।

फिर अगला दिन।

ज़िंदगी दोबारा अपनी गति से चलने लगी।

मीरा ऑफिस जाने लगी। लोगों से बात करती। हँसती। अपनी टीम को समझाती। किसी की गलती पर डाँटती और फिर उसी व्यक्ति को बेहतर करने का रास्ता भी बताती।

क्योंकि उसकी एक अजीब आदत थी—

वह नाराज़ हो सकती थी, लेकिन किसी का बुरा नहीं चाह सकती थी।

अपने साथ काम करने वाले किसी व्यक्ति की गलती से उसकी खुद की performance प्रभावित हो जाए, यह उसे स्वीकार था; लेकिन उसकी वजह से किसी का career खराब हो जाए—यह उसे मंजूर नहीं था।

वह सोचती—

“गलती पर रोकना जरूरी है, इंसान को खत्म कर देना नहीं।”

शायद यही सिद्धांत उसके निजी जीवन में भी था।

आरव ने उसके लिए चाहे जितना कहा हो, वह उसके लिए बुरा नहीं माँग पाती थी।

कभी किसी से उसके बारे में कोई कड़वी सच्चाई भी बोल देती तो कुछ देर बाद उसके भीतर डर पैदा होता—

“मेरे शब्दों की वजह से उसका कुछ बुरा न हो जाए।”

और फिर मन ही मन प्रार्थना करती—

“भोले, वो जहाँ रहे खुश रहे। उसका गुस्सा थोड़ा कम कर देना। उसे संयम देना। उसके भीतर थोड़ा प्रेम बढ़ा देना। उसे जिंदगी से लड़ना नहीं, जिंदगी को जीना सिखा देना।”

---

समय बीतता गया।

एक दिन आरव ने उससे कहा—

“तुम्हें तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता। इसलिए तुमने react नहीं किया।”

मीरा कुछ क्षण उसे देखती रही।

उसे समझ नहीं आया कि हँसे या रोए।

वह कहना चाहती थी—

तुम्हें कैसे समझाऊँ कि मुझे कितना फर्क पड़ा था?

क्या हर बार फर्क साबित करने के लिए मुझे रात के तीन बजे तक रोना पड़ेगा?

क्या हर बार तुम्हारे जाने पर मुझे तुम्हारे पीछे भागना पड़ेगा?

क्या सामान्य दिखने का मतलब यह है कि मेरे भीतर कुछ टूटा ही नहीं?

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि अब वह एक बात समझ चुकी थी—

Reaction और feeling एक चीज़ नहीं होते।

कई बार इंसान इसलिए शांत नहीं होता कि उसे फर्क नहीं पड़ता।

वह इसलिए शांत हो जाता है क्योंकि उसे बहुत ज्यादा फर्क पड़ चुका होता है।

---

एक शाम मीरा अकेली बैठी थी।

उसके सामने कोई डायरी नहीं थी।

कभी उसे लिखने का बहुत शौक था। लेकिन अब जब लिखने बैठती तो लगता कि मन में इतनी बातें हैं कि पहली लिखते-लिखते दसवीं भूल जाएगी।

इसलिए उसने बहुत से जज़्बात अपने भीतर ही किसी अनजान कुएँ में दबा दिए थे।

उस शाम उसने खुद से बात करनी शुरू की।

“क्या मुझे regret है कि मैंने उससे प्यार किया?”

अंदर से जवाब आया—

नहीं।

“क्या मुझे regret है कि मैंने उससे शादी की?”

नहीं।

“क्या उसके साथ जिंदगी बिताने का सपना गलत था?”

नहीं।

“क्या आज भी कहीं मेरे भीतर वह सपना है?”

कुछ देर खामोशी रही।

फिर जवाब आया—

हाँ।

उसकी आँखें भर आईं।

लेकिन इस बार वह रोई नहीं।

उसने खुद से अगला सवाल किया—

“तो क्या मुझे हर कीमत पर उसे बचाना है?”

इस बार जवाब अलग था।

नहीं।

और शायद यही वह उत्तर था जिसकी तलाश उसे इतने समय से थी।

---

प्रेम करना और किसी चीज़ को जबरदस्ती पकड़े रखना एक बात नहीं होती।

किसी का हाथ पकड़कर आगे ले जाना खूबसूरत है।

लेकिन तभी तक, जब तक दूसरी तरफ का इंसान अपना हाथ छुड़ाने के लिए लगातार पूरी ताकत न लगा रहा हो।

आप एक बार कोशिश कर सकते हैं।

दस बार।

सौ बार।

आखिरी क्षण तक भी।

लेकिन किसी इंसान को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपनी दिशा में नहीं चला सकते।

और यदि एक दिन वही व्यक्ति आपकी हर कोशिश को आपका अपराध बताने लगे, तब जरूरी नहीं कि आप भी उसके जैसे हो जाएँ।

आप बस रुक सकते हैं।

मीरा ने यही किया।

उसने प्रेम करना बंद नहीं किया।

उसने reaction देना बंद किया।

---

अब कोई उसके बारे में कुछ कहता तो वह हर बार जवाब नहीं देती।

कोई उसके परिवार के लिए कुछ कहता तो उसे दर्द आज भी होता था।

लेकिन उसने अपने भीतर एक नया शब्द बसाना शुरू किया था—

संयम।

उसे भगवान याद आते।

“लोग भगवान को भी कितना कुछ कहते हैं। कहते हैं भगवान हैं ही नहीं, भगवान सुनते नहीं, भगवान होते तो मेरे साथ ऐसा क्यों होता?”

फिर भी मंदिर की मूर्ति का चेहरा नहीं बदलता।

वही शांति।

वही मुस्कान।

मीरा सोचती—

अगर मेरी आस्था इतनी बड़ी है, तो मेरा आचरण इतना छोटा क्यों हो कि किसी के दो शब्द मुझे भी वही बना दें जो मैं कभी थी ही नहीं?

उस दिन उसने तय किया—

सामने वाले के शब्द उसका परिचय होंगे।
मेरा जवाब मेरा परिचय होगा।

---

इसका अर्थ यह नहीं था कि वह गलत को सही मानने लगी थी।

नहीं।

गलत व्यवहार गलत था।

अपमान गलत था।

हिंसा गलत थी।

पर किसी के गलत होने का अर्थ यह नहीं था कि मीरा भी गलत हो जाए।

वह आरव के व्यवहार को स्वीकार किए बिना भी उसके लिए अच्छा चाह सकती थी।

उससे प्रेम करते हुए भी अपनी सीमाएँ रख सकती थी।

और सबसे महत्वपूर्ण—

उसे बचाने की कोशिश करते-करते खुद को खो देना जरूरी नहीं था।

---

उस रात बहुत दिनों बाद मीरा ने अपनी पुरानी डायरी निकाली।

पहले पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा—

“वक्त ने वक्त को वक्त से पलटा है।”

और उसके नीचे—

“समय को बदलने के लिए भी समय देना पड़ता है।”

अब उसे जल्दी नहीं थी।

न रिश्ता खत्म घोषित करने की।

न अगले दिन सब ठीक कर लेने की।

न खुद को निर्दोष साबित करने की।

न आरव को दोषी साबित करने की।

वह सिर्फ़ इतना जानती थी—

उसकी तरफ से प्रेम सच्चा था।

उसकी नीयत साफ़ थी।

जहाँ उससे गलती हुई थी, वह उससे सीखेगी।

लेकिन अपनी गलतियों को लेकर खुद को उम्रभर सजा नहीं देगी।

जो उसके हाथ में था, वह करेगी।

जो उसके हाथ में नहीं था—

उसे ईश्वर और वक्त के हाथों में छोड़ देगी।

---

उसने अपनी टूटी हुई माला की तरफ देखा।

मोतियाँ आज भी जमीन पर बिखरे थे।

पहले उन्हें देखकर बेचैनी होती थी।

आज उसने उन्हें उठाने की कोशिश नहीं की।

बस मुस्कुराकर सोचा—

“अगर यह माला मेरे हिस्से की है, तो शायद एक दिन इसका धागा फिर मिल जाएगा।
और अगर नहीं… तो शायद भोले इन्हीं मोतियों से मेरे लिए कुछ नया बना रहे होंगे।”

फिर उसने डायरी बंद कर दी।

कहानी खत्म नहीं हुई थी।

आरव वापस आएगा या नहीं—उसे नहीं पता था।

उनका रिश्ता पहले जैसा होगा, किसी नए रूप में होगा या दोनों की राहें बदल जाएँगी—इसका उत्तर भी उसके पास नहीं था।

लेकिन पहली बार उसे लगा कि हर कहानी का निष्कर्ष जानना जरूरी नहीं होता।

कभी-कभी इतना जानना पर्याप्त होता है कि अगला पन्ना आने तक आपको कैसा इंसान बने रहना है।

और मीरा ने अपना उत्तर चुन लिया था—

प्रेम रहेगा।
लेकिन प्रेम के नाम पर गलत को सही नहीं कहा जाएगा।

प्रार्थना रहेगी।
लेकिन अपने अस्तित्व को मिटाकर नहीं।

कोशिश रहेगी।
लेकिन जबरदस्ती नहीं।

उम्मीद रहेगी।
लेकिन फैसला वक्त पर छोड़ा जाएगा।

और सबसे बढ़कर—

किसी और के व्यवहार की वजह से
वह अपने संस्कार नहीं बदलेगी।

निष्कर्ष

हर टूटी हुई चीज़ को उसी क्षण जोड़ना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी बिखराव को रोकने की लगातार कोशिश ही हमें सबसे ज्यादा थका देती है।

सच्चा प्रेम किसी को दोषी साबित करने की प्रतियोगिता नहीं है। लेकिन सच्चे प्रेम का अर्थ हिंसा, अपमान या अपनी गरिमा के मिट जाने को स्वीकार करना भी नहीं है।

हम किसी का हाथ पकड़ सकते हैं, उसके लिए प्रार्थना कर सकते हैं, आखिरी सीमा तक उसका साथ देने की इच्छा रख सकते हैं—पर उसके हिस्से का रास्ता उसके लिए चल नहीं सकते।

और शायद परिपक्वता यही है—

जहाँ कोशिश जरूरी हो, वहाँ पूरी कोशिश करो।
जहाँ सीमा जरूरी हो, वहाँ सीमा रखो।
जहाँ जवाब जरूरी न हो, वहाँ शांत रहो।
और जहाँ कुछ भी तुम्हारे हाथ में न हो—
वहाँ समय को समय दो।

शिक्षा

“किसी के गलत व्यवहार को अपने अच्छे आचरण की मृत्यु मत बनने दो।”

प्रेम अगर सच्चा है तो वह मन में रह सकता है।
दूरी हो सकती है, फिर भी शुभकामना रह सकती है।
दर्द हो सकता है, फिर भी बदला जरूरी नहीं।
और उम्मीद हो सकती है, फिर भी आत्मसम्मान छोड़ा नहीं जाता।

क्योंकि अंत में हर इंसान को अपने कर्मों का उत्तर देना है।

और कुछ फैसले हमारे नहीं होते।

कुछ फैसले वक्त करता है।
कुछ ईश्वर।
और हमारा काम सिर्फ़ इतना है—
जब फैसला आए, तब तक खुद को खो न देना।

— Chandni Purohit ✍️


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