मन की जीत
मन की जीत
महाराज कृष्णदेव राय दक्षिण के प्रसिद्ध न्याय प्रिय राजा थे ,दक्षिण के ही एक छोटे से गांव में एक ब्राह्मण परिवार नंदा और उनकी पत्नी रहते थे, दोनों का जीवन आनन्द पूर्वक चल रहा था,
ब्राह्मण नंदा गृहस्थ थे ,तो भी लोभ, काम और क्रोध छू भी पाते थे।
वह दो-तीन घरों में भिक्षाटन करते, - उससे जो दो मुट्ठी चावल और आटा मिल जाता, उससे वे अपना और अपनी धर्मपत्नी सरस्वती देवी का पोषण कर लेते और दिन भर लोकसेवा के कार्यों में जुटे रहते।
एक दिन तेनालीराम ने महाराज कृष्णदेव राय से कहा, "राजन् ! नंदा गृहस्थ होकर भी राजा जनक की तरह विकार-मुक्त हैं, दिन भर बेचारे पिछड़ों को ज्ञान-दान देने, कष्ट-पीड़ितों की सेवा करने में लगे रहते हैं। स्वार्थ की बात उनके मन में ही नहीं आती।"
महाराज कृष्णदेव राय हँसे और बोले, "गृहस्थ में रहकर कौन तो निर्लोभ रहा, कौन काम-वासना से बचा ? यदि गृहस्थ में ऐसा संभव हो जाए, तो संसार के सभी व्यक्ति अपना मनुष्य शरीर सार्थक न कर लें।"
तेनालीराम बोले, "कर सकते हैं" यदि लोग विप्र नंदा और देवी सरस्वती की भाँति निर्लोभ, सेवापरायण व सरल जीवन जीना सीख लें।"
यह सुन कर महाराज कुछ खिन्न से हो गए। बोले, "ऐसा ही है तो आप उनसे कुछ दिन यहीं हमारे यहाँ भिक्षाटन के लिए कह दें।"
तेनाली राम ने नंदा से जाकर आग्रह किया, "आप आगे से राजभवन से भिक्षा ले आया करें।"
ब्राह्मण नंदा ने कहा, "मैं जिन लोगों के बीच रहता हूँ, जिनकी सेवा करता हूँ, उन अपने कुटुंबीजनों से मिल गई भिक्षा ही पर्याप्त है। दो ही पेट तो हैं उसके लिए राजभवन जाकर क्या करूँगा?"
पर तेनाली राम तब तक बराबर जोर डालते रहे, जब तक ब्राह्मण नंदा ने उनका आग्रह स्वीकार नहीं कर लिया।
ब्राह्मण नंदा राजभवन जाने लगे। वहाँ से मिले चावल ही उनके उदर-पोषण के लिए पर्याप्त होते। ब्राह्मण नंदा अपनी सहज प्रसन्नता लिए हुए जाते, उसका अर्थ महाराज कुछ और ही लगाते ।
एक दिन तो उन्होंने तेनाली राम से कह भी दिया, "देख ली आपके नंदा की निस्पृहता। आजकल देखते नहीं कितने प्रसन्न रहते हैं?"
यह सुन तेनाली राम बोले, "आपका तात्पर्य समझा नहीं।"
इस पर महाराज ने कहा, " आप मेरे साथ चलिए, अभी बात स्पष्ट हो जाएगी।"
महाराज तेनाली राम के साथ ब्राह्मण नंदा के घर पहुँचे, देखा उनकी धर्मपत्नी चावल साफ कर रही हैं।
महाराज ने पूछा, "बहन ! यह क्या कर रही हो?"
इस पर वे बोलीं, " 'आजकल न जाने कहाँ से भिक्षा लाते हैं? इन चावलों में कंकड़-पत्थर भरे पड़े हैं।" यह कहकर उन्होंने अब तक बीने कंकड़ उठाए और बाहर की तरफ इन्हें फेंकने चल पड़ीं।
महाराज बोले, "भद्रे ! यह तो हीरे मोती हैं-जिन्हें आप कंकड़-पत्थर कहती हैं।"
सरस्वती देवी हँसीं और बोलीं कि "पहले हम भी यही सोचते थे, पर अब जब से भक्ति और सेवा की संपत्ति मिल गई, इनका मूल्य कंकड़-पत्थर के ही बराबर रह गया। महाराज यह उत्तर सुनकर अवाक् रह गए। वे आगे और कुछ न बोल सके।
जिसने स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर दिया हो उसके लिए हीरे मोती सब बेकार होते हैं।
