LYRICS bhaii लिरिक्स भाई

Drama Romance


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Drama Romance


मेरी प्यारी भानुमती

मेरी प्यारी भानुमती

20 mins 316 20 mins 316

यूं तो कॉलेज के पहले मेरी जो उम्र गुज़री थी, यानि स्कूल वाली लाइफ़ वो भी शाही-अंदाज़ में गुज़री थी, किसी रियासत के कुंवर साहब की तरह, लेकिन कॉलेज में आकर ऐसा लगा जैसे रियासत के बादशाह के रूप में मेरी ताजपोशी हो गई हो। दोस्त-यार सब मेरे सिपहसालार थे, कुछ गहरे मित्र मंत्रीमंडल में शामिल थे। कुछेक इतने ख़ास थे कि अगर मैं बबूल को आम कह देता तो वो भी कहते "हाँ-हाँ बिल्कुल ये आम है, बस थोड़ा काँटें उग आए हैं।" कैंटीन हमारे लिए रंगशाला थी, वहीं हमारा मनोरंजन होता था। शायरी, चुटकुलेबाजी, गाना-बजाना उस कैंटीन की चारदीवारी में ही होता था। वहाँ मौजूद टेबल-कुर्सी भी हमारे मनोरंजन में भरपूर जुगलबंदी करती थीं। फिर भले ही उन्हें अपनी पीठ पे हमारे हाथों की थाप झेलनी पड़े। ऐसा रुतबा ऐसा आराम शायद ज़िन्दगी में फिर कभी नसीब ना हुआ। आते-जाते लड़कियों को देखना, उनके सामने स्टाइल और दिखावटी शानो-शौक़त से पेश आना जैसे हमारी तहजीब बन गई थी। लगता था ये सभी लड़कियाँ हमारे हरम की पटरानियां हैं। इनपे हमारा एकछत्र अधिकार है। सो इनको ताड़ना कोई गुनाह थोड़ी है! जो भी दिखती उसी से प्यार हो जाता, यहां तक कि कई बार तो पढ़ाने वाली मैडम से भी। ये सब अट्रैक्टशन था जिसे मुझ जैसा स्वयंभू बादशाह प्यार समझ बैठता, और उनकी हँसी तक में अपना अधिकार समझ लेता। मसलन अगर ये हँसें तो सिर्फ़ मेरे लिए, फ़िक्र करें तो सिर्फ़ मेरी करें, मैं कहूँ तो नाच दिखाएं और ना जाने क्या-क्या? इतने कुविचार इतनी अलमस्ती थी जिसे सोचने लगूं तो सोच की सीमा खत्म हो जाए लेकिन अलमस्ती की फेहरिस्त नहीं। उस उम्र में सबकुछ अपना ही समझ आता था। घर से पैसे आते थे, सो तंगहाली का ख़ौफ़ रत्ती भर भी नहीं था।पढ़ाई में ठीक था, सो परीक्षा नामक युद्ध भी जीत लेते थे, बाकी सारी चीज़े हमारे मन मुताबिक चल रहीं थीं इसलिए किसी प्रकार की चिंता नहीं सताती थी। मौज-करो, ठाट-बाट से ज़िन्दगी का आनंद लो, प्यार-व्यार का खेल खेलो, घूमो-फिरो, ना कोई रोक ना टोक, सैलाब सा बहते जाओ। थमने की ज़रा भी गुंजाईश नज़र नहीं आती थी, क्योंकि बादशाही का ख़ुमार जो था दिमाग़ में। पढ़ाई के अलावा कॉलेज में कोई और एक्टिविटी है तो उसपे भी अव्वल रहना है, वरना प्रजा के सामने इंम्प्रेशन खराब होगा। सारा मामला इंम्प्रेशन का था, इसीलिए हर जगह एक्टिव रहना आदत में शुमार था। कभी-कभी इंम्प्रेशन झाड़ने के चक्कर में इतना खर्च हो जाता कि राजमाता मतलब मम्मी को फोन करना पड़ता, "हैलो मम्मी कैसी हो आप? अच्छा बताओ कौन से कलर की साड़ी चाहिए, अरे आपको पता है हम कॉलेज की तरफ से राजस्थान जा रहे हैं, वो हमारी एजुकेशनल ट्रिप है न! एक हफ्ते के लिए जा रहे हैं। इसीलिए सोचा आपके लिए राजस्थानी साड़ी ले आऊं, अच्छा मरून कलर आपका फेवरेट है..... है न? नहीं-नहीं, और कोई बात नहीं थी बस कन्फर्म करना था। अरे यार मम्मा; हाँ पैसे हैं थोड़े-बहुत, पर हो जाएगा शायद! ठीक है अब आप बोल रही हो तो पाँच हज़ार भेज दो, लिए रहूँगा, हूंsss....वही तो उतनी दूर जा रहा हूँ, एडवांस में पैसे रखे रहना ज़रूरी है। फिर बचेंगे तो मेरे पास ही रहना है। कौन-सा मैं बेफालतू खर्च कर दूँगा। भेज ही दो मम्मी, कुछ पैसे प्रोजेक्ट के लिए भी जमा करना है। अचानक मैं पैसे-वैसे के मामले में इतना समझदार हो गया जैसे चाणक्य मेरे चेले थे और उन्हें अर्थशास्त्र लिखने को मैनें ही बोला था।

मम्मी सब समझती रही होंगी, लेकिन माँ तो ममता की मूरत होती है, उन्हें अपने औलाद की झूठी बातें भी सच लगती हैं, इसलिए उन्होंने दिमाग़ लगाने की जद्दोजहद नहीं की। माँएं होती ही ऐसी है वो अपनी कोख के अंश के लिए दिल का कहा मानती हैं। आख़िर उनसे बेहतर उनके बच्चों को कौन समझ सकता है? नौ महीने जिसने अपने लहू से सींचा, वो भलीभांति समझ जाएगी कि मेरे फूल से बच्चे को क्या चाहिए। दूसरे दिन पैसे आ गए, फोटोशॉप की टेक्नोलॉजी का भरपूर उपयोग करके आठ-दस फोटो बना ली गई। ऑनलाइन ऑडर करके राजस्थानी साड़ी आ गई। वाकई इस 21वी सदी में दुनिया बहुत छोटी हो गई है। तभी तो इंटरनेट जैसी टेक्नोलॉजी के ज़ोरदार इस्तेमाल से मैंने बैठे बिठाए राजस्थान को अपने पास बुला लिया। ख़ैर ऐसे न जाने कितनी बार कितने बहाने से मैनें पैसे ऐंठे या सच कहूँ तो अपनों के अरमानों को ठगा है, उन अपनों से जो मुझे आँख बंद करके प्यार करते हैं। फिर चाहे मम्मी हो, दीदी हो, भैया हो या पड़ोस वाली लड़की जो शायद पगली ही थी कि मुझे पसंद करती थी, जबकि मैं उसे सिर्फ़ ज़रूरत का हमसफ़र समझता रहा। फिर एक दिन वो विदा हो गई, बिल्कुल पारो टाइप से, मुझ दिखावटी देवदास के घर के ठीक सामने से, लेकिन मजाल है मुझे फर्क पड़े? कैसे पड़ता फर्क, लगाव तो ऊपरी था न! बस यही लगा "अरे यार अब मन कैसे बहलाऊंगा जब घर आऊंगा!

तो चलिए फिर से कॉलेज चलें यानी अपनी रियासत में और सुनाएं एक दिलचस्प राज़ की बात जिसके लिए ये सारी भूमिका गढ़ी गई है, उस दिन कॉलेज बस में एक नया चेहरा दिखा, बिल्कुल प्रीटी जिंटा जैसा... नहीं-नहीं प्रीटी जिंटा का चेहरा इस हसीना जैसा है। मेरे दिमाग़ में यही कशमकश चल रही थी। हम जैसे लट्टू आशिकों का पहला प्रेमभाव यही तो होता है कि मेरे प्रेमिका का चेहरा किसी और से नहीं मिलता! वो एक आइडल पीस है, one and only मॉडल है! जिसकी छायाप्रति दुनिया में हो सकती है, लेकिन ओरिजिनल सिर्फ़ मेरी दिलरुबा ही है। बस इसी ख़ुमारी में मैं ये बात भूल गया- "अरे बाबले मजनूं तूने इस लड़की के पहले प्रीटी जिंटा को टी.व्ही पर 500 दफ़े देखा है, उसकी 8-10 मूवी देख चुका है। आए दिन अखबार के हीरो-हिरोइन वाले पन्ने पर देखता रहता है। खैर जो भी हो, लेकिन उसे देखकर तो मैं खुद को ही भूल चुका था। बाकी क्या याद रहता?

खिड़की के किनारे वाली सीट पर बैठी वो अप्सरा मानों मेरे लिए ही जमीं पे कॉलेज बस में सवार होकर आई हो। जैसे मेरे अन्दर ध्यान-मग्न शिव अपनी सती की आहट पाकर ध्यान-मुक्त हो गए हों और सती को सामने पाकर एकटक देखे जा रहे हो। जैसे मोहन ने मीरा को अपनी सोलह कलाओं का आधार बना लिया हो, जैसे राधा ही मीरा थीं और मीरा ही मोहन, जैसे एक-दूसरे में इनका हिस्सा जज़्ब हो गया हो। और इनके दिल से जो पुकार उठती होगी उसमें एक ही धुन सुनाई देती होगी, "तुझमें मैं… मुझमें तुम। तुझमें मैं...मुझमें तुम" उस पल मुझे मेनका-रंभा-उर्वशी सब काल्पनिक लगने लगीं! इसकी वजह 'बस' में बैठी वो हक़ीक़त वाली अप्सरा थी। मेरे अंदर मीर-ग़ालिब गूंजने लगे, मन में शायरी घुमड़-घुमड़ करने लगी। मन मोर की तरह नाच रहा था, तभी मन के बादल से एक छंद निकला, जो दिल की ज़मीं पे समा गया...वो छंद कुछ ऐसा था " राधा रूपी धारा में, मैं भी आधा बहता हूँ,

बाकी आधे हिस्से में पूरा राधा रहता हूँ,

अधरम्-मधुरम् श्रुतियों से मन जब-जब हर्षित होता है, 

तुम जैसी नहीं...सिर्फ़ तुम ही, बस यही राग दोहराता हूँ!"  

उसे देखकर मुझे सच वाला प्यार हुआ था, सच में एकदम सच्चा। टाइटैनिक टाइप का नहीं, प्योर अध्यात्मिक वाला।

मैं निहारता रहा उसे। उसके गालों के डिंपल में, मेरी सारी चेतना गुम हो गई थी, "मैं क्या हूँ" ये भी याद ना रहा, सिर्फ़ बेपरवाह सा देखे जा रहा था उसे। वो गुमसुम थी, पहला दिन था कॉलेज का। उसे सब अंजान लग रहे थे लेकिन मुझे ऐसा लगा जैसे कई वर्षों से मैं उसे जानता हूँ, और वो मेरे सपनों की सारथी हो। जैसे उसी ने मुझे बताया हो कि 'मैं भी हूँ इस दुनिया-जहान में'...yes I'm exist. दिल चीखने लगा था धक-धक करते हुए। और देखो हक़ीक़त की बिडम्बना मुझे तो उसका नाम भी मालूम नहीं था अभी तक!! मेरी बेचैनी से अच्छी तरह वाकिफ़ मेरा वही दोस्त जो बबूल को आम बना देता था। उसने सारी जानकारी जुटाई और बोला-"नाम है नेहा अवस्थी, इंदौर से आयी है, यहाँ अपनी दीदी के घर पे रहती है। फस्ट इअर, कम्प्यूटर साइंस ब्रांच। बहुत अच्छा गाती है, उसे एक्टिंग का भी शौक़ है, स्कूल टाइम पे स्किट में कई प्राइज़ जीत चुकी है। पढ़ाकू लड़की है। इंट्रोवर्ट है। अपने काम से काम रखती है और...

"और क्या! बता न यार जल्दी।" मैं किसी मासूम बच्चे की तरह पूछा।

'उसके पापा आर्मी में कर्नल हैं।' दोस्त रौब से बोला

बस-बस, आज के लिए इतना ही बहुत है। मैं भीगी बिल्ली की तरह सुकपुकाते हुए उसे बोलने से रोक दिया। मेरे तोते फुर्र हो गये थे। "पापा कर्नल हैं, मतलब बहुत ही स्ट्रिक्ट होगी ये नाज़नी हसीना!" मेरा मन और दिल इसी बात पे debate करने लगे।लेकिन प्यार था तो हिम्मत भी आ गई, फिर कोशिश होने लगी उसकी नज़र में आने की। "लेकिन नज़र में आऊं कैसे? ये नज़र नही आ रहा था!" फिर कुछ दिनों बाद एक गोल्डेन चांस आया। कॉलेज में फ्रेशर्स पार्टी का आयोजन होने वाला था। मौका भी था और दस्तूर भी। फ्रेशर्स पार्टी तो हम सेकंड ईयर वालों को ही देना था, इसलिए इस मौके को दोनों हाथ से लपकना मेरी पहली प्राथमिकता बन गई, तैयारियां युद्ध स्तर पे शुरू हो गईं, मैं किसी साधक की तरह इस साधना में लीन हो गया। मुझे फ्रेशर्स पार्टी को फतह करना था। मुझे रात-दिन सिर्फ़ एक ही धुन सवार थी "इसे अब तक की सबसे बेस्ट फ्रेशर पार्टी बनाऊंगा।" दोस्तों का भरपूर साथ मिला, शालिनी मैडम जो बहुत मानतीं थी मुझे उन्होंने ने पूरी हेल्प की। क्लास टीचर सर ने एक मस्त डांस तैयार करवाया। मैनें घर फोन करके सच बोला, और पापा ने एक्स्ट्रा पैसे भेज दिए। उन्हें बताया पापा कपड़े लेना है, बाकी जो-जो shopping करनी थी, कहाँ क्या खर्च हो रहा है? सबकुछ एकदम सच बताया। शायद उस सच्चे प्यार के लिए मेरी ये सच्ची शुरुआत थी। मैं अपने उस प्यार को "मैं" ही दिखना चाहता था, बिना किसी फरेब के बिना किसी मुखौटे के।

"सत्यार्थ; मैं सोच रही हूँ तुम लोग एक स्किट भी तैयार कर लो, मैं prepare करवा दूंगी, कुछ लोग तुम में से हो जाना, कुछ जूनियर्स को ले लेंगे।" शालिनी मैडम ने बोला और मै उनके लास्ट शब्द के end होने से पहले ही तपाक से बोल दिया, "यस मैम, मैं यही कहने वाला था infact मेरे पास एक स्क्रिप्ट भी है।"

संयोग से वो स्क्रिप्ट मेरे पास थी, जिसे मैनें नेहा को देखने के बाद अपनी कल्पना से लिख लिया था। उसमें दो इंजीनियरिंग प्रोफेशनल का ऑफ्टर मैरिज रिलेशन दिखाया गया था। जो यकीनन मैं और नेहा ही थे। ये हमारी कहानी थी, मेरे नज़रिए से। प्यार की हसरत तो देखिए, अभी एक शब्द बात भी नहीं हुई हमारे बीच, सिर्फ़ आठ बार सामना ही हुआ, वो भी एक दो मिनट के लिए बस्स! और कल्पना में बात शादीशुदा खुशहाल लाइफ तक पहुंच गई। मैनें अपने उसी दोस्त से पहले ही दिन नेहा को हिदायत दिलवा दिया था "नेहा, वो जो सत्यार्थ सर हैं उनको 'विश' मत करना! कभी भी नहीं, ठीक है" इसलिए सामने आने पर भी वो विश नहीं करती थी। तो फिर बाकी बात क्या करते हम, हाँ उसे मेरा नाम ज़रूर मालूम था... सिर्फ़ नाम ही। और मुझे उसके नाम के साथ-साथ बहुत सारी बातें, even उसका फेवरेट कलर भी! आख़िर प्यार था यार, एकदम शुद्ध वाला!! बिल्कुल 24 Karat सोने जैसा ख़रा।

बहरहाल मैडम को स्किट की स्क्रिप्ट बेहद पसंद आई और टाइटल भी उन्होंने ही रखा "मेरी प्यारी भानुमती"

स्किट की नायिका थी 'भानुमति' और मैडम ने नेहा को इसके लिए फाइनल कर लिया, वो उसकी क्लास टीचर थीं इसलिए उसके टैलेंट से वाकिफ़ थीं। अब चाहिए था 'भास्कर' मतलब नायक। जिसके कई दावेदार थे, अब कैसे बताऊं कि भास्कर तो मैं ही हूँ। और मैंने पहले से ही कई परफॉर्मेंस में नाम दे दिया था, जैसे डांस, स्टैनडप कॉमेडी और क्विज़! सबकी तैयारी भी शुरू हो चुकी थी। इसलिए इसमें एक्ट करना वो भी लीड रोल, टेढ़ी खीर लग रहा था। एक्चुअली टाइम मैनेज करना, और अदर स्टूडेंट्स को मौका देने जैसे मसले आड़े हाथ आ रहे थे। हाँ एकात छोटा रोल कर सकता था, ये सहूलियत थी। पर मुझे तो भास्कर ही करना था। क्या करूँ कुछ समझ नहीं आया। तभी रिसेस की घंटी बजी और मैडम ने मुझे और मेरे दोनों दोस्तों से बोला, "चलो ठीक है तुम तीनों एक-एक रोल कर लेना, मैं अभी जाकर मकैनिकल ब्रांच के प्रसून को भी बता दूंगी वो भास्कर कर लेगा। भानुमति तो नेहा हो गई, दो जूनियर और हैं जो इंट्रेस्टेड हैं वो बाकी के दो रोल कर लेंगे। सात कैरेक्टर पूरे हो गये। घर जाने से पहले सब मुझसे स्क्रिप्ट ले लेना, मैं एक्जाम सेक्शन से तब तक Xerox करवा लूंगी। मैडम ये सब बोल के चली गईं और मैं ठगा सा उन्हें देखता रहा, पहली बार लगा जैसे मेरे शरीर में कोई सेंसेशन ही नहीं बचा। कोई आरी से भी काट देता तो इतना दर्द ना होता जितना ये सुन के हुआ कि भास्कर मैं नहीं कोई और करेगा। मैं उसको बांट नहीं सकता, वो मेरी कहानी में मेरी रानी है। मैंने उसके लिए ही तो ये कहानी लिखी है। उसी के फेवरेट पर्पल कलर का शर्ट लिया है मैनें। उसी के लिए तो मैं हकीक़त को समझने लगा हूँ। उसी के लिए तो मैने अपनी सारी पुरानी जाहिलियत वाली हरकतों से किनारा कर लिया। हाँ...हाँ, उसी के लिए।

जिस फ्रेशर पार्टी को मैं अपने प्यार के आगाज़ का हसीन मौसम समझ रहा था। वही अचानक पतझड़ की तरह आंखों के सामने खड़खड़ाने लगा। आखिर क्यों? मेरी आँखें भीग गई थीं, मैं चाह कर भी उन्हे भीगने से रोक नहीं सका। मेरे दोनों दोस्त सब समझ गये थे। मुझे बोले चल भाई कुछ खाकर आते हैं। मेरे ना नुकूर करने के बावजूद मुझे जबदस्ती ले गये। और हम तीनों बाहर आकर, कैंटीन के पीछे बने गार्डन में जा पहुंचे। पहले तो मैं दोनों के गले लगकर फफक के रोया। मानों सदियों से बंधा दरिया एकदम से टूटकर बहने लगा हो। दोनों ने मुुझे खूब समझाया। यार पागल है क्या। ऐसे रोती हुई शकल लेकर जाएगा अपनी भानूमती के पास? चुप हो जा, वो देख वो आ रही है। मैं एकदम से शांत होकर देखने लगा, कहाँ? वो नहीं दिखी। जिगरी यार थे इसलिए येन केन प्रकारेण ढ़ाढस देने का प्रयास कर रहे थे। ये उसी प्रयास का सबसे कारगर सेंटेंस था। "वो देख, वो आ रही है!" हुंहss "अबे तुम लोग भी अब मज़ाक कर लो।" मैं बनावटी गुस्से से बोला। अरे भाई तुझे होश में ला रहा हूँ। मज़े नहीं ले रहा। मेरा वो राज़दार दोस्त बहुत गंभीरता से समझाने लगा। देख सत्यार्थ; 'भास्कर' तो तू ही करेगा, बस मैडम को convince कर ले। 

कैसे?? मैनें असमंजस भरे लहजे में पूछा क्योंकि मेरे समझ में बिल्कुल भी कुछ नहीं आ रहा था।

मि. प्रेमी महाराज, दुनिया का सबसे अचूक हथियार, जो ब्रम्हास्त्र से भी ज़्यादा इफेक्टिव है वो है "इमोशनल बाण"। तू इसका इस्तेमाल कर और जीत ले जंग।

भाई शालिनी मैडम तुझे बहुत मानती है, थोड़ा दयनीय भाव दिखा दे। मान जाएंगी। मै समझ गया था पर एक और प्राब्लम थी, और वो लड़के के भेष में थी। अरे लड़का ही था वो, हाँ वही प्रसून...जो मेरे लिए हमेशा चैलेंज रहा, कभी भी मेरे फेवर में नहीं रहा। मुझसे उसे अजीब सी खुन्नस थी, और मुझे भी उससे चिड़ होती थी। उसमें बहुत सी क्वालिटी थी। कॉलेज टॉपर था वो, एक अजीब सी प्रतिस्पर्धा हमारे बीच थी। who is the best वाली। मैनें मान लिया वो ही बेस्ट है। लेकिन नेहा के लिए तो मेरा ही प्यार best था, ऐसा इसलिए नहीं बोल रहा क्योंकि यही हर प्रेमी को लगता है, बल्कि अपनी ज़िंदगी की कसम मैं उससे सच में सच्चा प्यार करता था। मेरा उसके लिए जो लगाव था वो अट्रैक्शन वाला नहीं था। और वो प्रसून; नेहा पे वैसे ही फ़िदा था जैसे कभी मैं सारी लड़कियों पे हो जाता था। मैं उस मक्कार का साया भी नहीं पड़ने दूंगा नेहा पर....और भानुमति का भास्कर तो सपनें में भी नहीं होने दूंगा, मेरा सपना मैं जिऊंगा। अपनी प्यारी भानुमति के संग।

इसी भीष्म प्रतिज्ञा के साथ हम तीनों उठे और मैं जाकर योजनानुसार शालिनी मैडम को मना लिया,

उधर मेरे दोनो सिपहसालार भी पहुंच गये दुश्मन के किले में, "प्रसून; सुन ना एक मिनट। भाई तू क्विज के लिए क्या तैयारी कर रहा है, मुझे तो तेरे ही चांस लग रहे हैं जीतने के। after all तू डिजर्व करता है। वैसे एंकरिंग कौन कर रहा है? तू ही कर रहा है न!"

फूट डालो और फ़तह कर लो कि युक्ति शुरू कर दी गई। फूट डाली जा रही थी प्रसून के दिल और दिमाग़ के बीच "अरे सोच रहा हूँ स्किट कर लूं, अभी शालिनी मैडम से मिलकर ही आया हूँ। हाँ... स्किट ही फाइनल समझो, बाकी क्विज तो है ही।" वो कुछ टालमटोली से बोला जैसे कुछ ज़्यादा बताना नहीं चाहता।

"ओ हो मतलब कॉलेज का सबसे बेहतरीन वक्ता, जिसके पास गज़ब का सेंस ऑफ ह्यूमर है, वो एंकरिंग नहीं करेगा। फिर तो प्रोग्राम बोरिंग हो जाएगा। वैसे जो एंकरिंग करता है वो सेंटर ऑफ अट्रैक्शन होता है, अगर मेरे पास एंकरिंग वाला टैलेंट होता तो... मैं एंकरिंग को ही प्रायोरिटी देता बिना किसी शंका के।" मेरे दोनों सिपहसालारों ने आपस में दिखावटी खेद व्यक्त किया। फिर छुट्टी हुई और जाते समय स्क्रिप्ट के साथ एक दिलकश खुशी भी मिली, वो खुशी थी कि "भास्कर मैं ही कर रहा हूँ।" 

शालिनी मैम ने फाइनल हो चुके सभी कैरेक्टर्स को कल स्क्रिप्ट याद करके आने का बोला और अगले दिन से रिहर्सल शुरू हुई। मैं आज एक अलग ही दुनिया में था। मेरी और मेरी प्यारी भानुमती वाली दुनिया में। दिन तो नॉर्मल ही था लेकिन मेरे लिए कल्पना से परे था। पहला सीन प्रपोज करने वाला था, पहली बार मैनें उसके हाथों को छुआ, लगा बस ये वक़्त इससे आगे ना बढ़े, किसी तस्वीर की तरह यहीं थम जाए। तभी मैडम बोलीं "ऐसे नहीं नेहा, अच्छे से हाथ पकड़ाओ। रुको!! मैं तुम्हारी जगह करती हूँ, तुम देखो पहले। मैडम ने हाथ बढ़ाया और इस बार मुझसे ठीक से नहीं हुआ। सत्यार्थ अब तू गड़बड़ कर रहा है, अभी बढ़िया कर रहा था।

'मैम, भानुमती के साथ ही करने दीजिए सीन, आपके साथ फीलिंग ही नहीं आ पा रही।' मैंने मस्का लगाने के अंदाज़ में कहा।

'आय-हाय फीलिंग नहीं आ पा रही लड़के को, जा नेहा तू ही कर। वो भानुमती के साथ ही सीन करेगा।'

 मैडम ने चुटकी ली और वहाँ मौजूद सभी ने जोरदार हँसी के साथ पूरे हॉल को खुशियों से भर दिया। नेहा भी झेंप गई, वो शर्माते हुए पलकें झुकाए थी, फिर अचानक हम दोनों की नज़रे मिली। और जैसे हम दोनों की एक दूसरे से बात हो गई। एक ख़ामोशी भरी बात, जिस ख़ामोशी के आगे दुनिया का हर शब्द, ख़ुद को हार चुका था। इस ख़ामोश भाषा से लगा जैसे हम दोनों ने एक दूसरे को स्वीकार कर लिया हो। जैसे मैनें प्रेम-प्रस्ताव रखा और उसने खुशी से मान लिया हो। अचानक 'सर' कहते हुए उसने हाथ बढ़ाया और मैनें हाँ में सिर हिलाया। सीन शुरू हुआ। ताली बजी, शालिनी मैडम खुशी से बोली very good ऐसे ही कांफिडेंस के साथ करो। अच्छा किया नेहा तुमने। और मैडम मैं?? मैंने मज़ाकिया लहजे में बोला। सत्यार्थ मतलब तुम तो क़माल ही कर दिये हो, अच्छा हाँ.. फीलिंग मिल गई तुम्हारी। शालिनी मैम दुगुने मज़ाकिया लहजे से बोली। एक बार फिर पूरा हॉल हँसने लगा। तीन दिन में स्किट तैयार हो गया। बाकी सारे प्रोग्राम भी रेडी थे। प्रसून भाई एंकरिंग की बागडोर संभाले थे, आख़िर उनके 'मन' ने 'दिल' को परास्त कर ही दिया। इस बार कॉलेज वालों ने जूनियर्स के पेरेंट्स को भी इन्वाइट किया था, सब आए ऑडिटोरियम में, प्रोग्राम शुरू हुआ, हमारा स्किट तीसरे नंबर पर था। प्रोग्राम एक के बाद एक होते गए। फिर मिस्टर और मिस फ्रेशर्स का अनाउंसमेंट हुआ। नेहा मिस फ्रेशर्स चुनी गई और फ्रेशर पार्टी का परफॉर्मेंस वाला इवेंट समाप्त हुआ, बहुत अच्छा रहा पूरा इंवेंट। अब सब खाने वाली पार्टी की ओर जा रहे थे। बधाइयां दे रहे थे एक दूसरे को। मैं नेहा के पास जाकर उसे बधाई देना चाहा, लेकिन पांव रुक गये, ये देखकर कि उसके पेरेंट्स के तौर पर आए नौजवान के साथ वो एक ही थाली में खाना खा रही थी, मैं बच के जाने लगा तभी नेहा ने आवाज़ दी, "सर एक मिनट प्लीज, आइए न!" 

अनिरुद्ध; ये हैं सत्यार्थ पांडे, हमारे सीनियर। ब्रीलियंट स्टूडेंट्स मतलब इस कॉलेज की शान हैं ये। वो तारीफ पे तारीफ़ करती जा रही थी लगातार दो मिनट उसने मेरे बारे में बोला और वो भूल गई कि उसके हाथ में गुलाबजामुन है जिसे उसको खाना भी है।"ओ wow.. great मैनें देखा आपका प्रोग्राम, इंम्प्रेसिव।" अनिरुद्ध बोला।

पता है ये स्क्रिप्ट इन्होंने ही लिखा था, ये कहकर उसने वो गुलाब जामुन मुझे थमा दिया। फिर बेहद नम लहजे से बोली "थैंक्यू सो मच सर मुझे भानुमती बनाने के लिए, खाइए न! इसे। सर; ये गुलाब जामुन मुँह मीठा करवाने का शगुन है, क्योंकि बहुत अच्छा रहा प्रोग्राम।

 congratulations..."

हाँ, congratulations.... Many many congratulations to you Neha, 

miss fresher बनने के लिए। मैं उसकी बातों में खो गया था, और फिर एकदम से बोला। हड़बड़ाहट में!! सारे शब्द गुलाब जामुन की चाशनी की तरह चिपचिपाते हुए निगल रहे थे। मैनें ख़ुद को संभाला और फिर नेहा ने अनिरुद्ध का परिचय करवाया कि वो उसके मंगेतर हैं, नेहा की इंजीनियरिंग कंप्लीट हो जाए उसके बाद दोनों शादी कर लेंगे। दोनो की फैमिली भी रज़ामंद थी। ...और शायद नेहा भी!

अनिरुद्ध एयर फोर्स में था। NDA, CDS क्लीयर किया था उसने। 

उस दिन के बाद मेरे और नेहा के बीच ज़्यादा बात नहीं हुई, हाँ..दो-तीन मौके आए जब हमारी बात हुई, और हर बार मुझे लगा जैसै वो कुछ कहना चाहती हो। बात तो हुई लेकिन वो बात नहीं हुई जो उसकी आंखों में थी। बीतते बीतते समय बीत गया। मेरी डिग्री कम्प्लीट हो गई। आज मैं बैंगलोर में इंफोसिस में हूँ, शादी किया नहीं है... आगे कभी करने इरादा भी नहीं है। सब कुछ मौजूद है आज मेरे पास सिर्फ़ एक उसके सिवा।

आज ये कहानी इसलिए सुनाया क्योंकि मुझे सुबह-सुबह एक लेटर मिला। जिसमें लिखा था, "हैलो भास्कर कैसे हो आप, आपके बारे में जानकर अच्छा लगा, आप सेटल्ड हो गए। really मैं आपके लिए बहुत... बहुत...बहुत खुश हूँ। आपका एड्रेस प्रभात सर ने दिया, हांजी आपके सबसे भरोसेमंद सिपहसालार। वो यहीं ऑफिस में मिले! मुझे तब पता चला वो गूगल इंडिया में हैं, और एक महीने के लिए हेड ऑफिस ट्रेनिंग के लिए आए हैं। ये coincidence खुशी के साथ-साथ, बहुत सारे 'काश' दे गया। आपको मैं कई बार फेसबुक पे सर्च करती थी, लेकिन रिक्वेस्ट भेजने की हिम्मत नहीं हुई कभी। आप अभी तक single हैं, ये सुनकर मुझे लगा जैसे मैं ही इसके लिए ज़िम्मेदार हूँ, आपकी लाइफ़ मेरी वजह से स्पॉइल हुई। प्लीज़ भास्कर आप ख़ुद को तकलीफ़ मत दो, मैं आपसे बहुत प्यार करती थी तब भी!

और आज..."

आज?? आज के बाद तीन डॉट बने हैं और बहुत से आंसुओं के सूखे निशान! क्या ये 'आँसू' वही वाली बात है जो तब नेहा की आंखों में रह गई थी और आज आंसू बन के लेटर पर उतर गई!" मैं सोचने लगा!!

" हाँ ये वही बात है सत्यार्थ; तू stupid है, तब अगर समझ जाता तो शायद आज कुछ अलग ही कहानी होती।" मेरा दिल मुझे पूरे हक़ से डाँट रहा था।"

अरे मैं समझा था लेकिन उसकी शादी तय थी और वो भी तो खुश थी, नहीं...नहीं खुश नहीं थी, लेकिन मैं हर moment पे उसकी बात समझ रहा था, मुझ में भी हिम्मत नहीं बची थी, मैं हार चुका था..ख़ुद से ही हार गया था मैं।

काश! काश...काश, O god" 

मैं अपने दिल की अदालत में अपनी बात कह दिया पूरे पछतावे के साथ।

अब मैं लेटर पूरा पढ़ लूं पहले, नेहा ने आगे लिखा है- "जानती हूं आप भी मुझे मुझसे ज़्यादा प्यार करते थे और अब भी करते होंगे... है न!

मैं कभी कह नहीं पाई और कभी सुन भी नहीं पाई। अब मैं यहाँ सेटल हूँ। एक बेटा और एक बेटी है। अनिरूद्ध की तीन साल पहले प्लेन क्रैश में डेथ हो गयी थी। अब मैं शहीद की बेवा हूँ!! ये तमगा मैं ढ़ो नहीं सकी। मेरे कंधे इतने मजबूत नहीं थे। बस फिर मैनें एक कठिन फैसला लिया। हर एक याद से दूर जाने का, पर आज लगता है कि यादों को कोई दीवार नहीं रोक सकती, कोई सरहद नहीं बाँध सकती, वो तो आती रहती हैं अपने हिसाब से। कभी भी... कहीं भी। और कभी-कभी तो हमेशा के लिए हम में बस्ती बना लेती हैं!

ख़ैर उस इंसीडेंट के बाद मैं इंडिया छोड़कर यहां आ गई। गूगल में जॉब है। बच्चे और जॉब में दिन गुज़र रहे हैं। सबकुछ है बस ये नहीं बता सकती कि खुश हूँ या नहीं। इस सवाल को ना तब बता सकती थी जब आप मेरी आँखों से पूछ रहे थे, गुलाब जामुन थामते हुए और ना अब बता सकती।

हाँ उस दिन बहुत खुश थी, वो फ्रेशर पार्टी असली खुशी के मायने बता गई, जिसकी अहमियत अब महसूस होती है। मालूम भास्कर जी ...बहुत ज़्यादा होती है!!

उस दिन खुशियों को समझ सकी थी! उसके बाद कुछ समझ नहीं आया कि खुश हूँ भी या नहीं। आज पूरे दस साल बाद आपके बारे में पता चला। मैं इसी पते पर आपको लेटर लिखती रहूंगी।और उम्मीद करती हूं आप भी जवाब देंगे। बीच-बीच में लेटर के साथ वॉइस रिकार्ड करके pen drive में भेज दिया करूंगी। मैं जी-जान से यही उम्मीद करूंगी कि आप भी अपनी आवाज़ सुनने का मौका देंगें। और रिकॉर्ड करके लेटर के साथ भेंजेंगे। हम कभी मिलेंगे नहीं, ना ही फोन कॉल पे बात करेंगे। इंफैक्ट टेक्नोलॉजी का यूज़ सिर्फ़ पेन ड्राइव तक ही रखेंगे। अपनी दुनिया ऐसी ही रहेगी। भास्कर और भानुमती की एक अलग दुनिया। अनूठे प्रेम से सजी हुई मेरी और आपकी दुनिया। जहाँ प्यार सिर्फ़ महसूस होगा, जिससे प्यार को खोने का डर नहीं लगेगा...

अमर रहेगा ये प्रेम, हम दोनों मे ही अमर रहेगा हमेशा के लिए, और हम दोनों भी इसी प्रेम में अमर रहेंगे कई जन्मों के लिए!

i hope आप ज़रूर समझेंगे। मुझे गलत मत समझना मेरे प्यारे भास्कर। आपके जवाब का इंतज़ार करती। "आपकी प्यारी भानुमती"



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