STORYMIRROR

Vijay Erry

Classics Fantasy Others

4  

Vijay Erry

Classics Fantasy Others

मेरा अपना गाँव

मेरा अपना गाँव

6 mins
0

मेरा अपना गाँव 

लेखक: विजय शर्मा एरी

प्रस्तावना

कुछ जगहें सिर्फ मिट्टी और ईंटों का नाम नहीं होतीं। वे दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए बस जाती हैं। मेरा गाँव भी वैसा ही था—छोटा-सा, साधारण-सा, पर दिल से बहुत बड़ा। जहाँ सूरज पीपल के पीछे से मुस्कुराता हुआ उगता था, जहाँ हवा में मिट्टी की खुशबू घुली रहती थी, और जहाँ रिश्ते अभी भी शब्दों से नहीं, आँखों से समझे जाते थे।

यह कहानी उस गाँव की है… और उस युवक की, जो शहर की चमक में खो गया था, पर एक दिन वापस लौटा—अपने प्यारे गाँव में।

पहला अध्याय: शहर की भागदौड़

अनिल शर्मा दिल्ली की एक बहुमंजिला इमारत के छोटे से फ्लैट में रहता था। सुबह सात बजे अलार्म, जल्दी-जल्दी चाय, मेट्रो की भीड़, ऑफिस की मीटिंग्स, शाम को ट्रैफिक जाम, और रात को थकी-हारी नींद। ज़िंदगी एक मशीन की तरह चल रही थी।

उसके पिता जी गाँव में अकेले रह गए थे। माँ की मृत्यु के बाद पिता ने कभी शहर आने की जिद नहीं की। “बेटा, यह मिट्टी मेरी साँस है। यहाँ की हवा में ही मेरी जान बसती है,” वे अक्सर फोन पर कहते।

अनिल हर साल दीवाली पर गाँव जाने का वादा करता, पर काम का दबाव, प्रोजेक्ट की डेडलाइन और शहर की चमक उसे रोक लेती। तीन साल हो गए थे, वह गाँव नहीं गया था।

एक शाम, ऑफिस से लौटते हुए फोन पर पिता की आवाज़ सुनाई दी—कमज़ोर, थकी हुई। “बेटा… आज खेत में अकेला पड़ गया था। बारिश आ गई थी। कोई पास नहीं था।”

उस रात अनिल सो नहीं पाया। शहर की नीयन लाइट्स खिड़की से झाँक रही थीं, पर मन में गाँव के दीए जल रहे थे। उसने फैसला किया—कल ही गाँव जाऊँगा।

दूसरा अध्याय: वापसी का सफर

अगली सुबह अनिल ट्रेन पकड़कर अमृतसर की ओर रवाना हो गया। फिर बस से छोटा-सा कस्बा, और वहाँ से पैदल ही तीन किलोमीटर का रास्ता। जैसे-जैसे गाँव नज़दीक आता गया, हवा बदलने लगी। मिट्टी की महक, नीम की छाँव, दूर से आती बैलों की घंटी—सब कुछ परिचित लग रहा था।

गाँव के प्रवेश द्वार पर पुराना पीपल खड़ा था। उसके नीचे बैठे बुज़ुर्ग रामू काका ने उसे पहचान लिया। “अरे अनिल बेटा! तीन साल बाद याद आया गाँव?” आँखों में चमक थी, आवाज़ में हल्की शिकायत भी।

अनिल मुस्कुराया। “काका, शहर ने इतना उलझा रखा था कि रास्ता ही भूल गया।”

घर पहुँचा तो पिता आँगन में बैठे चाय बना रहे थे। बूढ़े हो गए थे। बाल सफ़ेद, कमर झुकी, पर आँखों में वही स्नेह। उन्होंने अनिल को गले लगाया। कोई शब्द नहीं। सिर्फ आँसू।

घर वही पुराना था—मिट्टी की दीवारें, आँगन में तुलसी का पौधा, छत पर रखी पुरानी चारपाई। माँ की तस्वीर दीवार पर टंगी थी। अनिल ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

रात को पिता ने सरल खाना परोसा—दाल, साग, मक्की की रोटी और गाँव का ताज़ा मक्खन। अनिल ने बहुत दिनों बाद इतना स्वादिष्ट खाना खाया। शहर के फास्ट फूड की याद तक नहीं आई।

तीसरा अध्याय: गाँव की सुबह

सुबह पाँच बजे पक्षियों की चहचहाहट से आँख खुली। सूरज अभी पूरा नहीं निकला था, पर गाँव जाग चुका था। महिलाएँ दूध दुह रही थीं, किसान खेतों की ओर जा रहे थे, बच्चे स्कूल की वर्दी पहनकर निकल रहे थे।

अनिल आँगन में खड़ा होकर देखता रहा। यहाँ समय धीरे चलता था। कोई जल्दबाजी नहीं, कोई होड़ नहीं। सिर्फ जीवन का सहज प्रवाह।

वह पिता के साथ खेत गया। गेहूँ की बालियाँ हवा में लहरा रही थीं। पिता ने कहा, “बेटा, यह खेत सिर्फ अन्न नहीं उगाता। यह धैर्य सिखाता है। बीज बोओ, पानी दो, इंतज़ार करो। जल्दबाज़ी में कुछ नहीं मिलता।”

अनिल चुपचाप सुनता रहा। शहर में सब कुछ तुरंत चाहिए होता है—प्रमोशन, पैसा, मान्यता। यहाँ इंतज़ार भी एक कला थी।

दोपहर में गाँव के तालाब के किनारे बैठे। बच्चे नहा रहे थे, बूढ़े धूप सेंक रहे थे। रामू काका आए और कहानी सुनाने लगे—पुरानी फसल की, बाढ़ की, और उस समय की जब पूरा गाँव एक परिवार की तरह रहता था।

“आजकल लोग शहर भाग रहे हैं,” काका ने कहा। “पर शहर में रिश्ते कहाँ? यहाँ तो पड़ोसी भी अपना लगता है।”

चौथा अध्याय: यादों का पिटारा

शाम को अनिल पुराने कमरे में बैठा। दीवार पर लगे लकड़ी के अलमारी में पुरानी किताबें थीं—स्कूल की नोटबुक्स, माँ के लिखे पत्र, और एक छोटी डायरी।

डायरी खोली तो माँ के हस्तलेख में लिखा मिला:

“मेरे अनिल,

जब भी शहर में थक जाओ, याद रखना—गाँव तुम्हारा घर है। यहाँ की मिट्टी तुम्हें शक्ति देगी। यहाँ के लोग तुम्हें अपना बना लेंगे। कभी मत भूलना कि असली खुशी रिश्तों में होती है, चीज़ों में नहीं।”

अनिल की आँखें भर आईं। उसने डायरी बंद की और बाहर निकला।

गाँव की गलियों में घूमता रहा। हर मोड़ पर कोई याद थी—स्कूल का मैदान जहाँ फुटबॉल खेला था, मंदिर जहाँ माँ के साथ आरती की थी, और वह बरगद का पेड़ जहाँ दोस्तों के साथ घंटों बातें की थीं।

रात को गाँव वाले आँगन में इकट्ठे हुए। कोई हारमोनियम बजा रहा था, कोई लोकगीत गा रहा था। अनिल भी बैठ गया। बहुत दिनों बाद दिल हल्का लगा।

पाँचवाँ अध्याय: संघर्ष और बदलाव

अगले कुछ दिनों में अनिल ने देखा कि गाँव में समस्याएँ भी थीं। युवा शहर जा रहे थे। खेतों में पानी की कमी। स्कूल में शिक्षक कम। स्वास्थ्य केंद्र दूर।

एक दिन गाँव के सरपंच से बात हुई। “बेटा, तुम पढ़े-लिखे हो। कुछ करके दिखाओ। सिर्फ याद करने से गाँव नहीं सुधरेगा।”

अनिल सोचने लगा। शहर में उसकी नौकरी अच्छी थी, सैलरी अच्छी थी। पर क्या वह संतुष्ट था? नहीं। हर रात खालीपन महसूस होता था।

उसने पिता से बात की। “पापा, मैं कुछ दिन और रुकना चाहता हूँ। शायद यहाँ कुछ कर सकूँ।”

पिता मुस्कुराए। “जैसी इच्छा बेटा। गाँव तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।”

अनिल ने कुछ युवाओं को इकट्ठा किया। छोटे-छोटे काम शुरू किए—तालाब की सफाई, स्कूल में किताबें दान करना, महिलाओं के लिए सिलाई की छोटी ट्रेनिंग। धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे।

एक बुज़ुर्ग महिला ने कहा, “बेटा, तुम्हारी माँ भी ऐसी ही थीं। सबकी मदद करती थीं। तुमने उनकी विरासत संभाली है।”

छठा अध्याय: शहर बनाम गाँव

एक महीने बाद अनिल का फोन बजा। ऑफिस से कॉल थी—नया प्रोजेक्ट, बड़ा मौका, प्रमोशन का वादा।

उसने रात भर सोचा। शहर की चमक, पैसा, सुविधाएँ… या गाँव की सरलता, रिश्ते, शांति?

सुबह उसने फैसला सुनाया। “मैं कुछ समय के लिए गाँव में रहूँगा। यहाँ काम करना चाहता हूँ।”

ऑफिस वाले हैरान रह गए। दोस्तों ने कहा, “पागल हो गए हो? गाँव में क्या रखा है?”

अनिल ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “यहाँ मेरा दिल रखा है।”

सातवाँ अध्याय: नया अध्याय

अगले कुछ महीनों में गाँव बदलने लगा। अनिल ने छोटे स्तर पर जैविक खेती शुरू करवाई। युवाओं को ट्रेनिंग दी। एक छोटी लाइब्रेरी खोली। बच्चों को कंप्यूटर की बेसिक जानकारी दी।

पिता हर शाम आँगन में बैठकर सब सुनते। आँखों में गर्व था। “तुम्हारी माँ आज होतीं तो कितनी खुश होतीं।”

एक दिन बारिश आई। पूरे गाँव ने मिलकर फसल बचाई। कोई अकेला नहीं था। अनिल ने महसूस किया—यह असली ताकत है। शहर में हर कोई अपने लिए दौड़ता है। यहाँ सब एक-दूसरे के लिए खड़े होते हैं।

रात को छत पर लेटकर तारे देखे। शहर में आसमान कभी इतना साफ नहीं दिखता। यहाँ ब्रह्मांड करीब लगता था।

उपसंहार

आज भी जब अनिल शहर जाता है तो कुछ दिनों बाद लौट आता है। गाँव उसका घर बन गया है। वह कहता है—

“मेरा प्यारा गाँव सिर्फ एक जगह नहीं है।

यह मेरी जड़ें हैं।

यह मेरी पहचान है।

यह वह जगह है जहाँ मैं सच में जीता हूँ।

शहर हमें सफलता सिखाता है,

गाँव हमें जीवन सिखाता है।

अगर कभी थक जाओ,

तो अपने गाँव लौट आओ।

वहाँ मिट्टी तुम्हें गले लगाएगी,

और दिल को सुकून देगी।”

लेखक का संदेश

मेरे प्यारे पाठकों,

हम सब किसी न किसी गाँव या छोटे कस्बे से जुड़े हैं। प्रगति अच्छी है, पर जड़ों को मत भूलो। रिश्ते, सरलता और प्रकृति—ये असली धन हैं।

अपने प्यारे गाँव को याद रखो। कभी-कभी लौट कर आओ। वहाँ की मिट्टी तुम्हें फिर से मनुष्य बनाएगी।

विजय शर्मा एरी

(अजनाला, अमृतसर)



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi story from Classics